नियमावलियाँ

उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य -संचालन नियमावली, 1958 (दिनांक दिसंबर, 2014 तक संशोधित)

अध्याय I – संक्षिप्त शीर्षनाम और परिभाषाएं

1- संक्षिप्त शीर्षनाम- यह नियमावली, "उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमावली, १९५८" कहलायेगी।

२- प्रारम्भ- ये नियम उस दिनांक से सप्रभावी होंगे जिस दिन वे उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा अंगीकृत किये जायें ।

3- परिभाषाएं- (1) इस नियमावली में, जब तक प्रसंग से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(अ) "अधिवेशन" का तात्पर्य उन लगातार उपवेशनों से है जिनके अन्त में सभा अनिश्चित काल के लिये अथवा नियम १४ में उल्लिखित अधिवेशनों में से किसी अधिवेशन की प्रथम तिथि के लिये स्थगित हो;

(क) "अध्यक्ष" का तात्पर्य सभा के अध्यक्ष से है;

(ख) "अनुच्छेद" का तात्पर्य संविधान के अनुच्छेद से है;

(ग) "असरकारी सदस्य" का तात्पर्य उस सदस्य से है, जो मंत्री न हो;

(घ) "उपवेशन" का तात्पर्य किसी भी दिन कार्यारम्भ से लेकर उस दिन के लिये सदन के उठने तक सदन के सदस्यों के कार्य सम्पादनार्थ समवेत होने से है;

(ङ) "उपाध्यक्ष" का तात्पर्य सभा के उपाध्यक्ष से है;

(च) "गजट" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश सरकार के गजट से है;

(छ) "पटल" का तात्पर्य सदन के पटल से है;

(ज) "परिषद्" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश विधान परिषद् से है;

(झ) "प्रवर समिति" का तात्पर्य सदस्यों की उस समिति से है, जिसे कोई विधेयक सभा द्वारा विचार तथा प्रतिवेदन के लिये निर्दिष्ट किया जाय;

(ञ) "प्रस्ताव" का तात्पर्य, किसी सदस्य द्वारा सभा के विचारार्थ की गयी प्रस्थापना से है और उसमें संकल्प तथा प्रस्ताव के संशोधन भी सम्मिलित हैं;

(ट) "भार-साधक सदस्य'' का तात्पर्य, जहां तक उसका सम्बन्ध संकल्प अथवा प्रस्ताव से है, उस सदस्य से जिसने ऐसा संकल्प अथवा प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो;

(ठ) ''मंत्री'' का तात्पर्य मंत्रि-परिषद् के किसी सदस्य से है, इसमें राज्य मंत्री, उप मंत्री तथा ऐसे सदस्य भी सम्मिलित हैं जिनको ऐसा मंत्री इन नियमों के अन्तर्गत सौंपे गये किसी कृत्य का प्रत्यायोजन करे;

(ड) "राज्यपाल" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से है;

(ढ) "वित्तीय वर्ष" का तात्पर्य बारह मास की उस कालावधि से है जो पहली अप्रैल से आरम्भ होकर आगामी ३१ मार्च को समाप्त हो;

(ण) "विधान मण्डल" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश विधान मण्डल से है;

(त) ''विभाजन'' का तात्पर्य सदस्यों को सभा-कक्षों में भेजकर या अन्य किसी रीति का अनुसरण करके अभिलिखित मतदान से है;

(थ) "विधेयक भार-साधक सदस्य’’ का तात्पर्य सरकारी विधेयक के सम्बन्ध में किसी मंत्री से और अन्य विधेयकों के सम्बन्ध में उस सदस्य से है जिसने विधेयक पुरःस्थापित किया हो या उस सदस्य से है जो किसी ऐसे सदस्य द्वारा उसकी ओर से कार्य करने के लिये लिखित रूप से प्राधिकृत किया गया हो या यदि विधेयक परिषद् द्वारा भेजा गया हो तो उस मंत्री या सदस्य से है, जिसने यह प्रस्ताव करने के मंतव्य की सूचना दी हो कि विधेयक पर विचार किया जाय;

(द) "शासन" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश के शासन से है;

(ध) "संकल्प" का तात्पर्य उस प्रस्थापना से है जो सामान्य लोक हित के लिये किसी विषय पर चर्चा करने के लिये किया जाय;

(न) "संयुक्त प्रवर समिति" का तात्पर्य परिषद् तथा सभा के सदस्यों की उस समिति से है जिसे कोई विधेयक किसी भी सदन में पुरःस्थापित किये जाने के पश्चात् इन नियमों के अन्तर्गत निर्दिष्ट किया जाय;

(प) "संविधान" का तात्पर्य "भारत का संविधान" से है;

(फ) "प्रमुख सचिव" का तात्पर्य विधान सभा के प्रमुख सचिव से है और इसके अन्तर्गत ऐसे अन्य व्यक्ति का समावेश है, जो प्रमुख सचिव का कार्य करने के लिए अधिकृत हों;

(ब) "सत्र" का तात्पर्य उस कालावधि से है जो अनुच्छेद १७४ (१) के अन्तर्गत राज्यपाल द्वारा आहूत किये जाने पर सभा के प्रथम उपवेशन से उक्त अनुच्छेद खण्ड (२) के अन्तर्गत उसके सत्रावसान या विघटन तक हो;

(भ) "सत्रावसान" का तात्पर्य अनुच्छेद १७४ के खंड (२) के उपखण्ड (क) के अन्तर्गत राज्यपाल के आदेश द्वारा सत्र के समापन से है;

(म) "सदन" का तात्पर्य विधान सभा से है;

(य) "सदन के परिसर" का तात्पर्य मुख्य विधान भवन स्थित विधान सभा मण्डप, उसकी दीर्घायें, दोनों लाबी, अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष के विधान सभा सचिवालय के नियन्त्रण अथवा अध्यासन के सभी कक्ष, विधान पुस्तकालय, विभिन्न राजनीतिक दलों को आवंटित कक्ष, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन हाल, उससे सम्बद्ध जलपान गृह़, उनके सामने के समस्त बरामदे तथा उपर्युक्त कक्षों और बरामदों में जाने वाली सीढियों से है, तथा उन स्थानों से भी है जिन्हें अध्यक्ष समय-समय पर इस हेतु निर्दिष्ट करें;

(र) ’’सदनों’’ का तात्पर्य विधान मण्डल के सदनों से है;

(ल) "सदस्य" का तात्पर्य सभा के सदस्य से है और अनुच्छेद १७७ के प्रयोजनों के लिये उसमें मंत्री तथा राज्य के महाधिवक्ता भी सम्मिलित हैं;

(व) "सदस्य को इंगित करने" का तात्पर्य किसी सदस्य के विरुद्ध कार्यवाही करने के विचार से उसके आचरण की ओर अध्यक्ष द्वारा सदन का ध्यान आकृष्ट किये जाने से है;

(श) "सभा" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश विधान सभा से है;

(ष) ''सभा-कक्ष लाबी'' से तात्पर्य उस कक्ष से है, जो सभा मंडप से संलग्न है और जो सभा मण्डप के साथ ही समाप्त होता है;

(स) ''समिति" का तात्पर्य किसी विशिष्ट या सामान्य प्रयोजन के लिये सदन द्वारा निर्वाचित या निर्मित अथवा अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित ऐसी समिति से है जो अध्यक्ष के निर्देश के अन्तर्गत कार्य करे और अपना प्रतिवेदन सदन या अध्यक्ष को प्रस्तुत करे।

(2) संविधान में प्रयुक्त शब्दों और पदों के, जिनकी परिभाषा यहां नहीं की गयी है, इन नियमों में जब तक प्रसंग से कोई दूसरा अर्थ अपेक्षित न हो, वही अर्थ होंगे जो संविधान में हैं।

अध्याय II – सदस्यों का आह्वान तथा उनके बैठने की व्यवस्था

4­-सभा का आह्वान- (१) समय­-समय पर सभा का आह्वान राज्यपाल द्वारा नियत समय और स्थान पर समवेत् होने के लिये किया जायेगा। अनु0 174(1)

(२) उप नियम (१) के अन्तर्गत सदस्यों को आह्वान­-पत्र इस प्रकार नियत तिथि से साधारणतया चौदह दिन पूर्व प्रमुख सचिव द्वारा निर्गत किये जायेंगे :

परन्तु यदि सत्र अल्पसूचना पर या आपातिक रूप में बुलाया जाय तो प्रत्येक सदस्य को आह्वान-पत्र पृथक-पृथक निर्गत करना आवश्यक न होगा, किन्तु तिथि, समय एंव स्थान का प्रख्यापन गजट तथा समाचार-पत्रों में प्रकाशित कर दिया जायेगा और सदस्यों को तार द्वारा सूचित किया जायेगा।

5­-शपथ अथवा प्रतिज्ञान- सदन के प्रत्येक सदस्य अपना स्थान गृहण करने से पहले राज्यपाल अथवा उनके द्वारा एतदर्थ नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, अनुच्छेद 188 के अधीन उस रूप में जो कि संविधान की तीसरी अनुसूची में एतदर्थ विहित है, शपथ गृहण करेंगे अथवा प्रतिज्ञान करेंगे तथा उस पर एवं एतत् प्रयोजनार्थ रखी गयी पंजी में, हस्ताक्षर करेंगे। अनु0 188

6­-सदस्यों की आसन व्यवस्था- (क) सदस्य साधारणतः अध्यक्ष द्वारा निर्धारित व्यवस्थानुसार बैठेंगे।

(ख) कोई भी अन्य व्यक्ति उस आसन पर नहीं बैठेगा जो सभा मण्डप में सदस्यों के लिये अभिप्रेत है। अनु0 193

7­-अनुच्छेद 193 के उपबन्धों के अधीन दण्ड विधि या विधान­- कोई भी व्यक्ति जिसके संबध में अध्यक्ष यह निश्चित करे कि वह अनुच्छेद १९३ के अधीन दोषी है एतदर्थ उपबन्ध शास्ति का भागी होगा। इस संबंध में अध्यक्ष का निर्णय अन्तिम होगा। अनु0 193

अध्याय III – अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का निर्वाचन तथा अधिष्ठाता मण्डल का नाम-निर्देशन

8-अध्यक्ष का निर्वाचन- (1) अध्यक्ष का निर्वाचन उस तिथि को किया जायेगा जो कि राज्यपाल नियत करें और प्रमुख सचिव उसकी सूचना प्रत्येक सदस्य का भेजेंगेः

परन्तु सभा की अवधि में होने वाली रिक्तता की दशा में इस प्रकार नियत तिथि:- अनु0 178

(क) यदि सभा उस समय उपवेशन में हो तो रिक्तता होने के, तथा

(ख) यदि वह उपवेशन में न हो तो उस दिनांक के, जब सभा तदुपरान्त पहली बार समवेत हो़, पन्द्रह दिनों के भीतर होगी।

(2) इस प्रकार उप नियम (1) के अधीन नियत की गयी तिथि के पूर्व दिन के मध्याह्न से पहले किसी समय कोई सदस्य निर्वाचन के लिए किसी दूसरे सदस्य का नाम-निर्देशन प्रमुख सचिव को एक नाम-निर्देशन-पत्र देकर कर सकेंगे जिस पर प्रस्थापक के रूप में उस सदस्य के हस्ताक्षर तथा समर्थक के रूप में किसी तीसरे सदस्य के हस्ताक्षर हों और जिसमें नाम­-निर्देशित सदस्य के नाम का उल्लेख हो और उसके साथ उस सदस्य का जिसका नाम प्रस्थापित किया गया है, कथन संलग्न होगा कि निर्वाचित होने पर वह सदस्य अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार है।

(3) (क) निर्वाचन की तिथि नियत होने पर, नयी सभा की दशा में राज्यपाल द्वारा नियुक्त सदस्य तथा किसी दूसरी दशा में उपाध्यक्ष या यथास्थिति पीठासीन सदस्य उन सदस्यों के नामों को, जिनका विधिवत नाम­-निर्देशन हुआ है, उनके प्रस्थापकों और समथर्कों के नामों के साथ सभा में पढ़कर सुनायेंगे। निर्वाचन के पूर्व किसी भी समय कोई अभ्यर्थी जो इस प्रकार नाम-निर्देशित हुए हों, पीठासीन अधिकारी को इस विषय में मौखिक या लिखित रूप से सूचना देकर अपना नाम निर्वाचन से वापस ले सकेंगे। यदि वापसी के उपरान्त, अगर कोई हों, एक ही सदस्य का नाम-­निर्देशन शेष रहता है तो वह निर्वाचित घोषित किये जायेंगे और इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव करना आवश्यक न होगा।

(ख) यदि एकाधिक सदस्यों का नाम निर्देशन शेष रहता है तो पीठासीन सदस्य उन सदस्यों को जिनके नाम में प्रस्ताव विद्यमान हों, प्रस्तावों को प्रस्तुत करने के लिए एक-एक करके पुकारेंगे और प्रस्तावक अपने को एतदविषयक कथन तक ही सीमित रखेंगे।

(४) उप नियम (३) के प्रयोजन के लिए किसी सदस्य को विधिवत नाम-निर्देशित नहीं समझा जायेगा,यदि उक्त उप नियम के अन्तर्गत नामों के पढ़े जाने के पूर्व उन्होंने अथवा उनके प्रस्थापक या समथर्कों ने सभा के सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली हो, या प्रतिज्ञान नहीं किया हो।

(५) प्रत्येक प्रस्ताव पर मतदान शलाका द्वारा किया जायेगा। जब दो से अधिक सदस्यों का नाम-निर्देशन हुआ हो और प्रथम शलाका में कोई अभ्यर्थी अन्य अभ्यथिर्यों द्वारा प्राप्त मतों के योग से अधिक मत प्राप्त न कर पाये तब उस अभ्यर्थी को, जिसने न्यूनतम मत प्राप्त किये हों निर्वाचन से अपवर्जित कर दिया जायेगा और पुनः शलाका की जायेगी। प्रत्येक शलाका के अन्त में न्यूनतम मत पाने वाले अभ्यर्थी का नाम अपवर्जित कर दिया जायेगा और ऐसा उस समय तक होता रहेगा जब तक कोई अभ्यर्थी शेष अभ्यर्थी के मतों की, या यथास्थिति शेष अभ्यथिर्यों के मतों के योग की अपेक्षा अधिक मत प्राप्त न कर ले।

(६) जब किसी शलाका में दो या अधिक अभ्यर्थी बराबर संख्या में मत प्राप्त करें तब पर्ची डालकर यह निश्चित किया जायेगा कि उप नियम (५)के अन्तर्गत किस अभ्यर्थी को अपवर्जित किया जाये।

9­-उपाध्यक्ष का निर्वाचन- (१) उपाध्यक्ष का निर्वाचन ऐसी तिथि को होगा जो अथ्यक्ष नियत करे और प्रमुख सचिव प्रत्येक सदस्य को इस तिथि की सूचना भेजेंगे :
परन्तु इस प्रकार नियत तिथि सभा की अवधि में होने वाली रिक्तता की दशा में:-

(क) यदि सभा उस समय उपवेशन में हो तो रिक्तता होने के, तथा

(ख) यदि वह उपवेशन में न हो तो उस दिनांक के, जब सभा तदुपरान्त पहली बार समवेत हो, तीस दिनों के भीतर होगी।

(२) इस प्रकार उप नियम (१) के अधीन नियत की गयी तिथि के पूर्व दिन के मध्याह्न से पहले किसी समय कोई सदस्य निर्वाचन के लिए किसी दूसरे सदस्य का नाम-निर्देशन, प्रमुख सचिव को एक ऐसा नाम-निर्देशन-पत्र देकर कर सकेंगे जिस पर प्रस्थापक के रूप में उस सदस्य के हस्ताक्षर तथा समर्थक के रूप में किसी तीसरे सदस्य के हस्ताक्षर हों और जिसमें नाम-निर्देशित सदस्य के नाम का उल्लेख हो और उसके साथ उस सदस्य का कथन, जिसके नाम को प्रस्थापित किया गया है, संलग्न होगा कि निर्वाचित होने पर वह सदस्य उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार है।

 

(३) उप नियम (२) के प्रयोजनों के लिए किसी सदस्य को विधिवत नाम-निर्देशित नहीं समझा जायेगा, यदि उस उप नियम के अन्तर्गत नामों के पढ़े जाने के पूर्व उन्होने अथवा उनके प्रस्थापक या समर्थक ने सभा सदस्य के रूप में शपथ न ली हो, अथवा प्रतिज्ञान न किया हो।

(४) निर्वाचन के लिए इस प्रकार नियत तिथि को अध्यक्ष उन सदस्यों के नामों को जिनका विधिवित नाम-निर्देशन हुआ है, उनके प्रस्थापकों तथा समथर्कों के नामों के साथ सभा में पढ़कर सुनायेंगे। निर्वाचन के पूर्व किसी भी समय कोई अभ्यर्थी जो इस प्रकार नाम-निर्देशित हुआ है, पीठासीन अधिकारी को इस विषय में मौखिक या लिखित रूप से सूचना देकर अपना नाम निर्वाचन से वापस ले सकेगा, यदि वापसी के उपरान्त अगर कोई हो,एक ही सदस्य का नाम-निर्देशन शेष रहता है तो उनको निर्वाचित घोषित कर दिया जायगा और इस विषय पर औपचारिक प्रस्ताव करना आवश्यक न होगा। यदि एकाधिक सदस्यों का नाम-निर्देशन शेष रहता है तो अध्यक्ष उन सदस्यों को, जिनके नाम में प्रस्ताव विद्यमान हो, प्रस्तावों को प्रस्तुत करने के लिए एक-एक करके पुकारेंगे और प्रस्तावक अपने को एतदविषयक कथन तक ही सीमित रखेंगे।

(५) निर्वाचन की दशा में नियम- ८ (५) और (६) में अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए विहित प्रक्रिया का अनुसरण किया जायेगा।

१0­-अधिष्ठाता मण्डल- (१) प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने पर अध्यक्ष सभा के सदस्यों में से अधिक से अधिक दस सदस्यों का एक मण्डल नाम-निर्देशित करेंगे और उनमें से कोई एक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष या उनकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष के भी अनुपस्थित होने पर पीठासीन सदस्य के कहने पर, सभा में पीठासीन हो सकेंगे। अनु0 180 (2)

(२) उप नियम (१) के अन्तर्गत नाम-निर्देशित अधिष्ठाता तब तक पद धारण करेंगे जब तक कि नया अधिष्ठाता मण्डल नाम-निर्देशित न हो जाय।

११­-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा अधिष्ठाता मण्डल की अनुपस्थिति में सभापति का निर्वाचन- यदि अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों अनुपस्थित हों और सभा की बैठक में पीठासीन होने के लिए अधिष्ठाता मण्डल के कोई सदस्य विधिवत प्राधिकृत न हों, तो गणपूर्ति होने की दशा में निम्नलिखित ढंग से उस बैठक के लिए सभापति निर्वाचित करने के हेतु कार्यवाही की जायेगी­:-

‘’एक सदस्य प्रमुख सचिव को सम्बोधित करके सदन के समक्ष उस समय उपस्थित किसी दूसरे सदस्य का नाम प्रस्तावित करेंगे और यह प्रस्ताव करेंगे कि उक्त सदस्य उस समय तक पीठसीन हों जब तक संविधान अथवा नियमों के अधीन पीठासीन होने के लिए सक्षम व्यक्ति न आ जाय और ऐसे प्रस्ताव का किसी अन्य सदस्य द्वारा समर्थन हो जाने पर प्रमुख सचिव प्रस्ताव या प्रस्तावों को सदन का मत लेने के लिए रखेंगे। इस प्रकार निर्वाचित सदस्य अध्यक्ष-पीठ पर अध्यासीन होंगें।‘’ अनु0 180

(2)१२-उपाध्यक्ष तथा अधिष्ठाता की शक्तियां- उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य की, जो संविधान अथवा इस नियमावली के अन्तर्गत सभा के उपवेशन में पीठासीन होने के लिए सक्षम हों, जब वे पीठासीन हों, वही शक्तियां होंगी जो कि पीठासीन होने पर अध्यक्ष की होती हैं और ऐसी अवस्था में इस नियमावाली में अध्यक्ष से सम्बद्ध सब निर्देश उस पीठासीन व्यक्ति के प्रति निर्देश समझे जायेंगे। अनु0 180(2)

१३-अध्यक्ष द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन- अध्यक्ष किसी भी समय लिखित आज्ञा द्वारा इन नियमों के अधीनस्थ अपनी समस्त शक्तियां या कोई शक्ति उपाध्यक्ष को तथा उनकी अनुपस्थिति में अधिष्ठाता मण्डल के किसी सदस्य को प्रत्यायोजित कर सकेंगे और इसी प्रकार किसी ऐसे प्रत्यायोजन को निरस्त कर सकेंगे।

अध्याय IV – सभा के उपवेशन

१४­-सभा के अधिवेशन- अनुच्छेद-१७४ के अधीन रहते हुए साधाणतया प्रत्येक वर्ष में सभा के ३ अधिवेशन अर्थात् आय-व्ययक अधिवेशन, वर्षाकालीन अधिवेशन व शीतकालीन अधिवेशन और ९० दिन के उपवेशन होंगे जिसमें यथासंभव दो माह के अन्तराल पर कम से कम दस कार्यकारी दिवसों के लिये विधान सभा का सत्र बुलाया जायेगा। अनु0 174

१४­-क सभा के उपवेशन- (१) सत्र के आरम्भ होने के पश्चात् सभा उन दिनों बैठेगी जिनको अध्यक्ष सभा के कार्य की स्थिति को देखकर तथा सदन के नेता के परामर्श से समय-समय पर निश्चित करें।

(२) सदन का उपवेशन तभी विधिवत गठित होगा जबकि उसमें अध्यक्ष अथवा कोई अन्य सदस्य पीठासीन हो जो संविधान या इन नियमों के अन्तर्गत सदन के उपवेशन में पीठासीन होने के लिए सक्षम हों।

१५­-उपवेशन का समय- (१) अध्यक्ष के निर्देश के अधीन रहते हुये सभा का उपवेशन साधारणतया ११ बजे पूर्वाहन से प्रारम्भ होगा और तब तक चलेगा जब तक उस दिन के लिए निर्धारित कार्य समाप्त न हो जायः

परन्तु यदि अध्यक्ष ऐसा करना उचित समझें या ऐसा करना किन्हीं परिस्थितियोंवश आवश्यक हो जाय तो निर्धारित कार्य समाप्त होने से पूर्व भी उपवेशन स्थगित किया जा सकता है।

(२) जब तक कि सदन अन्यथा निश्चय न करे, शनिवार, रविवार तथा अन्य सार्वजनिक छुटि्टयों के दिन कोई उपवेशन नहीं होगा।

१६-गणपूर्ति- सभा के उपवेशन को गठित करने के लिए गणपूर्ति सदन के सब सदस्यों की संख्या का दशमांश होगा। अनु0 189(3)

१७-उपवेशनों का स्थगन- अध्यक्ष स्वयं अथवा सभा के तदविषयक प्रस्ताव पर, सभा के उपवेशन को स्थगित कर सकेंगेः

किन्तु यदि सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो तो सभा के पुनः समवेत होने की तिथि की सूचना सदस्यों को साधारणतया दस दिन पूर्व दी जायेगीः

परन्तु अध्यक्ष सभा के उपवेशन को उस तिथि के पूर्व अथवा उसके बाद की तिथि को बुला सकेंगे जिस तिथि के लिए वह स्थगित हुआ हो।

१८- सत्रावसान का प्रभाव- जब सभा सत्रावसित हो जाय तो-

(क) सभी लम्बित सूचनायें, वक्तव्य और चर्चायें व्यपगत हो जायेंगी और आगामी सत्र के लिए फिर से सूचनायें दी जायेंगीः

परन्तु जो प्रश्न कार्य-सूची में प्रविष्ट हो चुके हों, किन्तु पिछले सत्र की समाप्ति पर स्थागित किये गये हों और उत्तर के लिए लम्बित हों, वे व्यपगत नहीं होंगे;

(ख) सत्रावसान के समय जो विधेयक सदन में लम्बित हों, वह सदन के सत्रावसान के कारण व्यपगत नहीं होगा;

(ग) किसी समिति के समक्ष लम्बित कोई कार्य व्यपगत नहीं होगा;

(घ) ऐसा कोई प्रस्ताव, संकल्प अथवा संशोधन जो उपस्थित किया जा चुका हो और सदन में लम्बित हो, व्यपगत नहीं होगा।

अध्याय V – राज्यपाल का सभा को अभिभाषण तथा सन्देश

१९- विधान मण्डल के दोनों सदनों को राज्यपाल का अभिभाषण और सभा में उस पर चर्चा- (१) सभा के प्रत्येक सामान्य निर्वाचन के उपरान्त प्रथम सत्र के आरम्भ में तथा प्रतिवर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में राज्यपाल विधान मण्डल के एक साथ समवेत हुए दोनों सदनों को अभिभाषित करेंगे तथा विधान मण्डल को आह्वान के कारण बतायेंगेः
परन्तु सदस्यों के विहित शपथ लेने अथवा प्रतिज्ञान करने का कार्य तथा अध्यक्ष का निर्वाचन यदि आवश्यक हो तो राज्यपाल के अभिभाषण के पूर्व किया जा सकेगा। अनु0 176(1)

(२) राज्यपाल के अभिभाषण के उपरान्त सभा के प्रथम उपवेशन में अध्यक्ष सदन को अभिभाषण पढ़कर सुना सकेंगे।

(३) अध्यक्ष, सदन-नेता के परामर्श से, राज्यपाल के अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों की चर्चा के लिए समय नियत करेंगे जो साधारणतया चार दिन होगाः
परन्तु कोई दिन राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के लिए नियत होते हुए भी उस दिन सदन में अभिभाषण पर चर्चा आरम्भ होने या जारी होने के पूर्व अन्य औपचारिक कार्य किया जा सकेगा। व्याख्या-

विधेयक के पुरःस्थापन का प्रस्ताव औपचारिक कार्य है।

(४) इस प्रकार नियत दिन या दिनों में सदन में एक सदस्य द्वारा प्रस्तुत तथा अन्य सदस्य द्वारा समर्थित धन्यवाद के प्रस्ताव पर ऐसे अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों पर चर्चा करने के लिए स्वतंत्र होगा।

(५) ऐसे धन्यवाद के प्रस्ताव में ऐसे रूप में संशोधन प्रस्तुत किये जा सकेंगे जिसे अध्यक्ष उचित समझें।

(६) ऐसे प्रस्ताव की चर्चा sपर संकल्पों के विषय से सम्बद्ध नियम यथोचित परिवर्तनों सहित प्रवृत्त होंगेः
परन्तु ऐसे प्रस्ताव या उस पर संशोधन प्रस्तुत करने के लिए किसी सूचना की आवश्यकता नहीं होगीः
और कोई ऐसे संशोधन प्रस्तुत नहीं किये जा सकेंगे जो मूल प्रस्ताव के अन्त में शब्द जोड़ने के रूप में न हों:

(७) प्रस्ताव, संशोधन सहित अथवा संशोधन रहित स्वीकृत होने पर अध्यक्ष द्वारा राज्यपाल को अर्पित किया जायेगा।

(८) अध्यक्ष प्रस्ताव पर राज्यपाल के उत्तर को सभा में पढ़कर सुनायेंगे।

२०-अनुच्छेद १७५ (१) के अन्तर्गत राज्यपाल का अभिभाषण - अनुच्छेद-१७५(१)के अधीन राज्यपाल द्वारा दिये गये अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों पर चर्चा के लिए अध्यक्ष समय नियत कर सकेंगे। अनु0 175(1)

२१-अनुच्छेद १७५ (२) के अन्तर्गत राज्यपाल का सन्देश- जब अध्यक्ष को सदन के लिए अनुच्छेद १७५(२) के अन्तर्गत राज्यपाल से सन्देश मिले तो वह सदन को सन्देश पढ़कर सुनायेंगे और सन्देश में निर्दिष्ट विषयों पर विचार करने के लिए अनुसरणीय प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक निर्देश देंगे। ऐसे निर्देश देने में अध्यक्ष को उस सीमा तक नियमों को निलम्बित या परिवर्तित करने की शक्ति होगी जिस सीमा तक कि आवश्यक हो। अनु0 175(2)

अध्याय VI – कार्य का क्रम

२२-सदन में लिये जाने वाले कार्य की सूचना- सभा के किसी अधिवेशन के प्रारम्भिक सप्ताह में लिये जाने वाले कार्य की सूचना विधान सभा सचिवालय को अधिवेशन प्रारम्भ होने के कम से कम १५ दिन पूर्व शासन द्वारा दी जायेगी और तदुपरान्त प्रत्येक सप्ताह के अन्तिम कार्य-दिवस पर सदन के नेता अथवा मंत्रि परिषद् के कोई सदस्य प्रश्नों के उपरान्त सदन को आगामी सप्ताह में किये जाने वाले कार्य की सूचना देंगे।

२२­-क­- कार्य­ सूची- (१) प्रमुख सचिव प्रत्येक दिन के कार्य की एक सूची तैयार करेंगे और उसकी एक प्रतिलिपि प्रत्येक सदस्य के प्रयोग के लिये उपलब्ध की जायेगी।

 

(२) जब तक कि इन नियमों में अन्यथा उपबन्ध न हो अध्यक्ष की अनुज्ञा के बिना किसी उपवेशन में कोई ऐसा कार्य न लिया जायेगा जो उस दिन की सूची में सम्मिलित न हो।

 

(३) जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न करें ऐसा कोई कार्य जिसके लिये सूचना की आवश्यकता हो, अपेक्षित सूचना की अवधि पूरी होने से पहले साधारणतया किसी दिन की कार्य-सूची में नहीं रखा जायेगा।

 

२३-असरकारी सदस्यों के कार्य के लिये समय नियतन- (1) प्रत्येक शुक्रवार को दो बजे अपराहन से पांच बजे अपराहन तक असरकारी सदस्यों का कार्य लिया जायेगा और जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें उसको सरकारी कार्य पर अग्रेता प्राप्त होगी।

 

(2) जब अध्यक्ष ने उप नियम (१) के अन्तर्गत पूर्वोक्त रीति से अन्यथा निदेश दिया हो तो वह सदन नेता से परामर्श करके असकारी सदस्यों के कार्य के लिये किसी सप्ताह में कोई अन्य दिन नियत कर सकेंगे।

२४-सरकारी कार्य का क्रम- असरकारी सदस्यों के कार्य के लिए नियत दिनों को छोड़कर अन्य दिनों में अध्यक्ष की सम्मति के बिना सरकारी कार्य के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं लिया जायेगा। प्रमुख सचिव उस कार्य का विन्यास ऐसे क्रम में करेंगे जैसा कि अध्यक्ष सदन नेता के परामर्श से विनिश्चित करेः
परन्तु अध्यक्ष सदन-नेता के परामर्श से कार्य के क्रम में परिवर्तन अथवा संशोधन कर सकेंगे।

२५-दिन के अन्त में असरकारी सदस्यों का अवशिष्ट कार्य- असरकारी सदस्यों का वह कार्य जो उसके लिये नियत किये गये दिन के लिये रखा गया हो और उस दिन न लिया गया हो, किसी आगामी दिन के लिये तब तक नहीं रखा जायेगा जब तक कि दूसरी तत्सम्बन्धी सूचना पर उसे उस दिन के संबंध में की गयी शलाका में प्राथमिकता प्राप्त न हो गयी होः
परन्तु जो कार्य उस दिवस के अन्त में चर्चाधीन हो, वह असरकारी कार्य के लिये नियत आगामी दिन के लिये रखा जायेगा और उसे उस दिन के लिये रखे गये अन्य समस्त कार्यो पर अग्रेता मिलेगी।

अध्याय VII – प्रश्न

२६- प्रश्नों का विषय- प्रश्न प्रशासन के ऐसे विषय से सम्बद्ध होना चाहिए जिसके लिये शासन उत्तरदायी है। उसका प्रयोजन लोक-महत्व के विषय में सूचना प्राप्त करना अथवा कार्यवाही का सुझाव देना होगा।

२७- प्रश्नों का वर्गीकरण- प्रश्नों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से होगाः-

(क) अल्पसूचित प्रश्न,

(ख) तारांकित प्रश्न तथा

(ग) अतारांकित प्रश्न।

व्याख्या (१) अल्पसूचित प्रश्न का तात्पर्य ऐसे प्रश्न से है जो अविलम्बनीय लोक-महत्व के विषय से सम्बन्धित हो। इसका विभेद दो तारांक लगाकर किया जायेगा। दिये हुये उत्तर से उत्पन्न अनुपूरक प्रश्न उसके बारे में अध्यक्ष की अनुज्ञा से किये जा सकेंगे।

व्याख्या (२) ताराकिंत प्रश्न का तात्पर्य ऐसे प्रश्न से है जिस पर दिये हुये उत्तर से उत्पन्न अनुपूरक प्रश्न अध्यक्ष की अनुज्ञा से किये जा सकेंगे। एक तारांक लगाकर उसका विभेद किया जायेगा।

व्याख्या (३) अतारांकित प्रश्न से उस प्रश्न का तात्पर्य है जिसका लिखित उत्तर संबंधित सदस्य को दिया जाये और जिस पर अनुपूरक प्रश्न करने की अनुज्ञा न हो।

२८- प्रश्नों का रूप तथा विषय- कोई ऐसा प्रश्न नहीं पूछा जा सकेगा जो निम्नलिखित शर्तों को पूरा न करता हो अर्थात्:-

(१) उसमें कोई ऐसा नाम या कथन नहीं होगा जो प्रश्न को सुबोध बनाने के लिये सर्वथा आवश्यक न हो,

(२) यदि उसमें सदस्य द्वारा कोई कथन दिया गया हो तो प्रश्नकर्ता सदस्य को उस विवरण की परिशुद्धता के लिये स्वयं उत्तरदायी होना पड़ेगा,

(३) वह अत्यधिक लम्बा न होगा तथा उसमें प्रतर्क, अनुमान, व्यंग्यात्मक या अपेक्षात्मक पद अथवा मान-हानिकारक कथन नहीं होंगे,

(४) वह राय प्रकट करने या विधि सम्बन्धी प्रश्न या किसी काल्पनिक प्रस्थापन के समाधान के लिये नहीं पूछा जायेगा,

(५) उसमें किसी व्यक्ति के सरकारी अथवा सार्वजनिक पद के अतिरिक्त उसके चरित्र या आचरण का उल्लेख नहीं होगा तथा व्यक्तिगत प्रकरणों का निर्देश भी न होगा जब तक कि कोई सिद्धान्त का विषय अन्तर्निहित न हो,

(६) उसमें ऐसे प्रश्नों की तत्वतः पुनरावृत्ति नहीं की जायेगी जिनके उत्तर उसी सत्र में पहले दिये जा चुके हों या जिनका उत्तर देने से इन्कार कर दिया गया हो,

(७) उसमें ऐसी सूचना नहीं मांगी जायेगी जो प्राप्त दस्तावेजों अथवा सामान्य निर्देश ग्रन्थों में उपलब्ध हो,

(८) उसमें किसी ऐसे विषय के संबंध में सूचना नहीं मांगी जायेगी जो भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के विचाराधीन हो,

(९) उसमें किसी न्यायाधीश या न्यायालय के, जिसको भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार हो, आचरण के विषय में किसी ऐसी बात का निर्देश नहीं होगा, जो उसके न्यायिक कृत्यों से सम्बद्ध हो,

(१०) उसमें व्यक्तिगत रूप का दोषारोपण नहीं किया जायेगा और न वह दोषारोपण ध्वनित होगा,

(११) उसमें सीमित महत्व का अस्पष्ट अथवा निरर्थक विषयों पर अथवा बहुत ब्योरे की जानकारी नहीं मांगी जायेगी,

(१२) उसका स्थानीय निकायों अथवा, अन्य अर्ध-स्वायत्त निकायों के दैनिक प्रशासन से कोई संबंध नहीं होगा। किन्तु अध्यक्ष ऐसों प्रश्नों को स्वीकृत कर सकेंगे जो उनके और शासन के संबंध में उत्पन्न होते हों या जो विधि या नियमों के भंग होने से सम्बद्ध हों या सार्वजनिक हित के महत्वपूर्ण विषयों से सम्बन्ध रखते हों,

(१३) उसमें वर्तमान सत्र में हुए वाद-विवाद का निर्देश नहीं होगा,

(१४) वह किसी सदन के विनिश्चयों की आलोचना न करेगा,

(१५) उसमें ऐसे विषयों के संबंध में सूचना नहीं मांगी जायेगी, जो गोपनीय प्रकृति के हों, जैसे मंत्रि-परिषद् के विनिश्चय अथवा कार्यवाहियां,विधि अधिकारियों द्वारा राज्यपाल को दी गयी मंत्रणा तथा अन्य तत्सम विषय,

(१६) वह किसी समिति के समक्ष विषयों से अथवा समिति के सभापति अथवा सदन के प्राधिकारियों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत विषयों से सम्बद्ध नहीं होगा,

(१७) उसका सम्बन्ध किसी असरकारी व्यक्ति अथवा असरकारी निकाय द्वारा दिये गये किसी वक्तव्य से न होगा,

(१८) उसमें उन व्यक्तियों के चरित्र अथवा आचरण पर आक्षेप नहीं होगा जिनके आचरण पर मूल प्रस्ताव के द्वारा ही आपत्ति की जा सकती हो,

(१९) उसमें ऐसी नीति के, जो इतनी विस्तीर्ण हो कि वह प्रश्न के उत्तर की परिधि के भीतर न आ सके, प्रश्न नहीं उठाये जायेंगे,

(२०) उसमें ऐसे विषयों के बारे में नहीं पूछा जायेगा जो कोई न्यायिक या अर्धन्य़ाय़िक कृत्य करने वाले किसी संविहित न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के या किसी विषय की जांच या अनुसंधान करने के लिये नियुक्त किसी आयोग या जांच न्यायालय के सामने विचाराधीन होः
किन्तु यदि उससे न्यायाधिकरण, संविहित प्राधिकारी, आयोग या जांच न्यायालय द्वारा उस विषय के विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका न हो तो उसमें जांच की प्रक्रिया या व्याप्ति या प्रक्रम से संबंधित विषयों की ओर निर्देश किया जा सकेगा।

२९- अल्पसूचित प्रश्न- (१) जब कोई सदस्य अल्पसूचित प्रश्न पूछना चाहें तो वे सत्र आहूत हो जाने के बाद ऐसे प्रश्नों की लिखित सूचना न्यूनतम तीन दिन पूर्व प्रमुख सचिव को देंगे और प्रमुख सचिव साधारणतया प्रश्न को अल्पसूचित प्रश्न के रूप में ग्राह्यता पर उसकी प्राप्ति के यथासंभव 24 घण्टे के भीतर अध्यक्ष की आज्ञा प्राप्त करेंगे।

(२) अध्यक्ष की आज्ञा प्राप्त हो जाने के उपरान्त प्रश्न की एक प्रतिलिपि संबंधित मंत्री को इस निवेदन के साथ भेज दी जायेगी कि वह प्रमुख सचिव को सूचित करें कि क्या वह प्रश्न का उत्तर अल्पसूचित प्रश्न के रूप में देने की स्थिति में है।

 

(३) यदि मंत्री अल्पसूचना पर उत्तर देने के लिये सहमत हों तो वह तत्काल या तदुपरान्त इतने शीध्र कार्य-सूची में रख दिया जायेगा जैसा कि अध्यक्ष निर्देश देः
परन्तु किसी एक दिन की कार्य-सूची में २ से अधिक अल्पसूचित प्रश्न नहीं रखे जायेंगे।

(४) (४) यदि सम्बद्ध मंत्री अल्पसूचना पर उत्तर देने की स्थिति में न हो और अध्यक्ष की यह राय हो कि वह पर्याप्त लोक महत्व का है तो वे निर्देश दे सकेंगे कि उसको उस दिन की प्रश्न सूची में प्राथमिकता देकर पृथक नत्थी के रूप में रखा जाये जिस दिन नियम के अनुसार तारांकित प्रश्न रूप में उत्तर के लिये उसकी बारी हैः-
परन्तु ऐसे प्रथामिकता प्राप्त प्रश्नों की संख्या उस दिन की कार्य सूची में तीन से अधिक न होगी और एक सदस्य का एक से अधिक प्रश्न नहीं रखा जायेगा।

(५) जब दो या दो से अधिक सदस्य एक ही विषय पर अल्पसूचित प्रश्न दें और एक सदस्य का प्रश्न अल्पसूचना पर उत्तर के लिये हो जाये, तो अन्य सदस्यों के नाम भी उस सदस्य के नाम के साथ रख दिये जायेंगे, जिसका प्रश्न उत्तर के लिये ग्राह्य कर लिया गया होः-
परन्तु अध्यक्ष यह निर्देश दे सकेंगे कि सब सूचनाओं को एक ही सूचना में समेकित कर दिया जाय यदि उनकी राय में एक ही स्वयं पूर्ण ऐसा प्रश्न तैयार करना वांछनीय हो, जिनमें सदस्यों द्वारा बताई गयी सब महत्वपूर्ण बातें आ जायें और तब मंत्री उसमें समेकित प्रश्न का उत्तर देंगेः
किन्तु समेकित प्रश्न की अवस्था में सभी संबंधित सदस्यों के नाम साथ-साथ दिये जा सकेंगे और उनकी सूचना की प्राथमिकता के क्रम से प्रश्न के सामने दिखाये जा सकेंगे।

३०-तारांकित तथा अतारांकित प्रश्नों की सूचना- (1) तारांकित और अतारांकित प्रश्नों की लिखित सूचना सदस्य द्वारा प्रमुख सचिव को कम से कम पूरे २० दिन पूर्व दी जायेगी।

(2) ऐसे प्रश्न प्रमुख सचिव द्वारा शासन को साधारणता ५ दिन के भीतर भेज दिये जायेंगेः परन्तु जब तक अध्यक्ष अन्यथा विनिश्चय न करें कोई प्रश्न उत्तर के लिये प्रश्न-सूची में तब तक नहीं रखा जायेगा जब तक कि मंत्री या संबंधित विभाग को ऐसे प्रश्न की सूचना देने के दिनांक से १५ दिन समाप्त न हो जायः परन्तु यह भी कि यदि अध्यक्ष की यह राय हो कि प्रश्न की ग्राह्यता अथवा अग्राह्यता का विनिश्चय करने के लिये अधिक समय की आवश्यकता है तो वह प्रश्न उत्तर के लिये कार्य-सूची में उस दिन के बाद किसी दिन रखा जायेगा जिस दिन वह नियमों के अधीन नियत किया जाता।

(3) नियम २९ के उप नियम (५) के उपबन्ध तारांकित तथा अतारांकित प्रश्नों की सूचनाओं की दशा में भी प्रवृत्त होंगे। ३१-प्रश्नों के लिये समय- जब तक अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें,प्रत्येक उपवेशन का पहला एक घण्टा और बीस मिनट का समय प्रश्नों के पूछने और उनका उत्तर देने के लिये उपलब्ध रहेगा जिसमें:-

(1) सवर्प्रथम अल्पसूचित प्रश्न लिये जायेंगे,

(2) तदुपरान्त नियम २९ (४) के अन्तर्गत प्राथमिकता प्राप्त प्रश्न लिये जायेंगे,

(3) तदुपरान्त तारांकित प्रश्न लिये जायेंगे तथा

(4) अन्त में अतारांकित प्रश्न लिये गये समझे जायेंगे।

३२-उत्तरों की प्रतियां सदस्य को उपलब्ध करना तथा सदन में प्रश्नोत्तर का निस्तारण- (१) प्रश्नों के उत्तर के लिये जो दिन नियत किया गया हो, उस दिन का उपवेशन आरम्भ होने के एक दिन पूर्व प्रश्न के लिखित उत्तरों की प्रति सम्बद्ध सदस्य को उपलब्ध कर दी जायेगी।

(२) अल्पसूचित प्रश्नों और तारांकित प्रश्नों के उत्तर सम्बद्ध मंत्री द्वारा पढ़कर सुनाये जायेंगे तथा कार्य-सूची में सम्मिलित ऐसे समस्त अतारांकित प्रश्नों के, जो स्थगित न किये गये हों, उत्तरों को सभा पटल पर रखा गया समझा जायेगा और ऐसे अतारांकित प्रश्न तथा उनके लिखित उत्तर उस दिन की कार्यवाही के अंश के रूप में प्रकाशित किये जायेंगे।

३३-प्रश्नों की संख्या की परिसीमा- (१) एक सदस्य एक दिन में केवल पांच प्रश्नों की ही सूचना दे सकेगा जिसमें अल्पसूचित तारांकित प्रश्न, तारांकित प्रश्न तथा अतारांकित प्रश्न सम्मिलित हैं। यदि कोई सदस्य पांच प्रश्नों से अधिक सूचना किसी दिन देता है तो उसकी प्रथम पांच सूचनाएं ली जा सकेंगी और शेष सूचना अस्वीकृत समझी जायेंगी।

(२) मौखिक उत्तर के लिये किसी एक दिन की प्रश्न सूची में तारांक लगाकर विभेद किये गये २० से अधिक प्रश्न नहीं रखे जायेंगे तथा एक सदस्य का एक से अधिक तारांकित प्रश्न नहीं रखा जायेगा। सदस्यों के किसी एक दिन के लिए निर्धारित एक से अधिक तारांकित प्रश्न अतारांकित प्रश्नों की सूची में रख दिये जायेंगेः
परन्तु किसी एक दिन के लिए निर्धारित अतारांकित प्रश्नों की कुल संख्या सामान्यतया २०० से अधिक न होगी।

३४- प्रश्नों के मौखिक उत्तरों के लिए दिन नियत करना- प्रश्नों के उत्तर देने के लिए उपलब्ध समय सम्बद्ध मंत्री अथवा मंत्रियों से सम्बद्ध प्रश्नों के उत्तर देने के लिए भिन्न-भिन्न दिनों में चक्रानुक्रम से उस प्रकार नियत किया जायेगा जैसा कि अध्यक्ष समय-समय पर उपबन्धित करें। प्रत्येक ऐसे दिन जब तक अध्यक्ष सम्बद्ध मंत्री की सम्मति से अन्यथा निर्देश न दें, केवल ऐसे मंत्री अथवा मंत्रियों से सम्बद्ध प्रश्न ही, जिनके लिये उस दिन समय नियत किया गया हो, उत्तर के लिए प्रश्न- सूची में रखे जायेंगे। यह नियम अल्पसूचित प्रश्नों के सम्बन्ध में प्रवृत्त न होगा।

३५- मंत्री की अनुपस्थिति के कारण प्रश्न का स्थगन- विशेष अथवा अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण सम्बद्ध मंत्री की अनुपस्थिति की दशा में तदविषयक प्रार्थना किये जाने पर अध्यक्ष प्रश्न को किसी आगामी दिन के लिये स्थगित कर सकेंगे।

३६- प्रश्न पूछने की रीति- प्रश्नों के घंटे में अध्यक्ष उन सदस्यों को जिनके नाम में प्रश्न सूची-बद्ध किये गये हों क्रमानुसार तथा प्रश्नों की प्राथमिकता का यथोचित ध्यान रखते हुए अथवा ऐसी अन्य रीति से पुकारेंगे जिसको अध्यक्ष स्वविवेक से विनिश्चित करें और ऐसे सदस्य पुकारे जाने पर अपनी उपस्थित दर्शाने के लिए अपने स्थान पर खड़े होंगे। यदि वह सदस्य जो पुकारे गये हों अनुपस्थित हों तो अध्यक्ष आगामी प्रश्न को ले लेंगे।

३७- प्रश्नों की सूचना देने की रीति- प्रश्न विभागीय मंत्री को सम्बोधित होंगे और प्रमुख सचिव को उनकी लिखित सूचना दी जायेगी।

व्याख्या- एक दिन प्राप्त हुए प्रश्न उसी दिन के समझे जायेंगे, चाहे प्रश्नकर्ता ने उस पर विभिन्न दिनांक अंकित कर दिये हों।

३८- प्रश्नों के उत्तर देने के ढंग- (१) प्रश्नों के उत्तर प्रश्नों के विषय से सुसंगत होंगे और अध्यक्ष यह विनिश्चित करें तो वे सभा के पटल पर विवरण रखने के रूप में हो सकेंगे।

(२) किसी प्रश्न का उत्तर उस तिथि को दिया जायेगा जिसके लिए वह सूची-बद्ध किया गया हो। यदि सदस्य द्वारा अपेक्षित सूचना उपलब्ध न हो तो मंत्री तदनुसार स्थिति बतायेंगे और अध्यक्ष इतना अधिक समय, जिसे वे परिस्थितियों को देखते हुए उपयुक्त समझें दे सकेंगे तथा उत्तर के लिए कोई तिथि नियत करेंगे।

(३) यदि मंत्री की यह राय हो कि सदस्य द्वारा अपेक्षित सूचना लोक-हित में नहीं दी जा सकती तो वे ऐसा कहेंगे। इस आधार पर मंत्री की सूचना देने से इन्कार करना विशेषाधिकार का विषय नहीं बनाया जा सकता और न इस आधार पर सदन के स्थगन का प्रस्ताव ही लाया जा सकता है।

३९- अनुपस्थित सदस्यों के प्रश्न- जब समस्त प्रश्न जिनका मौखिक उत्तर अभिप्रेत है, पुकारे जा चुके हैं, तब अध्यक्ष, यदि समय हो, किसी प्रश्न को पुनः पुकार सकेंगे जो उस सदस्य की अनुपस्थिति के कारण न पूछा गया हो जिसके नाम में वह प्रश्न हो तथा अध्यक्ष किसी सदस्य को अन्य किसी सदस्य के नाम में रखे हुए प्रश्न को पूछने की अनुज्ञा दे सकेंगे यदि वे उनके द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत किये गये हों या यदि अन्य कोई सदस्य उस प्रश्न में अभिरुचि रखते हों।

४०- प्रश्नों की वापसी अथवा उसका स्थगन- कोई भी सदस्य उस उपवेशन के पूर्व जिसके लिए उनका प्रश्न सूची-बद्ध किया गया हो, सूचना देकर अध्यक्ष की सहमति से किसी भी समय अपने प्रश्न को वापस ले सकेंगे अथवा सूचना में निर्दिष्ट किसी आगामी दिन के लिए उसको स्थगित करने की प्रार्थना कर सकेंगे और नियम ३४ के उपबन्धों के अधीन ऐसे आगामी दिन के लिए रखा गया प्रश्न उस दिन के निर्दिष्ट प्रश्नों की सूची के अन्त में रखा जायेगा।

४१-मौखिक उत्तर न दिये जाने वाले प्रश्नों का लिखित उत्तर- यदि उत्तर के लिए किसी तिथि को निर्धारित कोई अल्पसूचित अथवा तारांकित प्रश्न किसी कारण से उक्त तिथि को सदन में न लिया जा सके तो उसका उत्तर दिया हुआ माना जायेगा और ऐसे समस्त प्रश्नों के लिखित उत्तर उस दिन की कार्यवाही के अंश के रूप में प्रकाशित किये जायेंगे।

४२- अनुपूरक प्रश्न- (१) नियम ३१ के अन्तर्गत प्रश्नों के समय में किसी प्रश्न अथवा उत्तर के संबंध में चर्चा करने की अनुज्ञा नहीं होगी।

(२) अध्यक्ष की अनुज्ञा से सदस्य प्रश्नाधीन विषय संबंधी तथ्यों पर अग्रेतर स्पष्टीकरण हेतु अनुपूरक प्रश्न पूछ सकेंगेः
परन्तु अध्यक्ष कोई ऐसा अनुपूरक प्रश्न अस्वीकार करेंगे, यदि उनकी राय में उससे प्रश्नों संबंधी नियम भंग होते हैं।

४३- अध्यक्ष से प्रश्न- अध्यक्ष से प्रश्न व्यक्तिगत सूचना द्वारा किये जायेंगे। ऐसे प्रश्नों का उत्तर लिखित रूप से अथवा अध्यक्ष के निजी कमरे में दिया जा सकेगा।

४४- असरकारी सदस्यों से प्रश्न- प्रश्न एक सदस्य द्वारा किसी दूसरे असरकारी सदस्य को संबोधित किया जा सकेगा यदि प्रश्न का विषय किसी विधेयक, संकल्प अथवा सदन के कार्य के अन्य विषय से सम्बद्ध हो जिसके लिए वे सदस्य उत्तरदायी हैं और ऐसे प्रश्नों के संबंध में यथा सम्भव उसी प्रक्रिया का, जो किसी मंत्री से पूछे गये प्रश्नों के संबंध में प्रयोग की जाती है,ऐसे परिवर्तनों के साथ अनुसरण किया जायेगा जिन्हें अध्यक्ष आवश्यक अथवा सुविधाजनक समझें।

४५- अध्यक्ष प्रश्नों की ग्राह्यता का विनिश्चय करेंगे- अध्यक्ष प्रश्न की ग्राह्यता का विनिश्चय करेंगे और वे किसी प्रश्न को अथवा उसके किसी भाग को अस्वीकार कर सकेंगे जो उनकी राय में इन नियमों के प्रतिकूल है अथवा प्रश्न पूछने के अधिकार का दुरुपयोग है। अध्यक्ष सम्बद्ध सदस्य को संक्षेप में प्रश्न को अग्राह्य करने के कारणों की सूचना देंगे। वे किसी प्रश्न को नियमानुकूल बनाने के लिए उसमें संशोधन कर सकेंगे अथवा प्रश्न को सुधार के निमित्त वापस कर सकेंगे।

४६- प्रश्न के वर्ग में परिवर्तन करने की अध्यक्ष की शक्ति- अध्यक्ष किसी अल्पसूचित प्रश्न को तारांकित या अतारांकित प्रश्न में तथा किसी तारांकित प्रश्न को अतारांकित प्रश्न में परिवर्तित कर सकेंगेः
परन्तु अध्यक्ष यदि उचित समझें तो तारांकित प्रश्न की सूचना देने वाले सदस्य से अपने प्रश्न को इस वर्ग में रखने का कारण संक्षिप्त रूप से बताने के लिए कह सकेंगे और उस पर विचार करने के उपरान्त अध्यक्ष निर्देश दे सकेंगे कि प्रश्न को उस वर्ग में रखा जाय।

४७- किसी दिन के लिए प्रश्नों की सूची- (१) अध्यक्ष द्वारा ग्राह्य प्रश्नों में से प्राप्ति के क्रमानुसार प्रथम २० सदस्यों के एक-एक तारांकित प्रश्न निर्धारित दिन के प्रश्नों की कार्य-सूची में रखे जायेंगे और उसी क्रम से पुकारे जायेंगे जिस प्रकार वे सूची में दिये हों। उक्त दिन के लिए निर्धारित शेष तारांकित प्रश्न अतारांकित प्रश्नों की सूची में रख दिये जायेंगे।

(२) प्रमुख सचिव प्रत्येक कार्य दिवस के लिए निर्धारित प्रश्नों की एक अस्थायी सूची बनायेंगे तथा उस दिनांक से साधारणतया एक सप्ताह के पूर्व उसकी प्रतिलिपियां सब सदस्यों को भेज देंगे। यदि उस दिन सदन का उपवेशन हो रहा हो तो वह सदस्यों को प्रतिलिपियां भेजने के बदले उन्हें सदस्यों की मेजों पर रखेंगे।

४८-प्रश्नोत्तरों का सभा की कार्यवाहियों में समावेश- प्रश्न जो पूछे जायं तथा जिनके उत्तर दिये जायं उन सबका सभा की कार्यवाही में समावेश होगाः
परन्तु किसी प्रश्न को जो अस्वीकार किया गया हो इस प्रकार समावेश नहीं हो सकेगा।

४९-प्रश्नोत्तरों से उत्पन्न होने वाले विषयों पर चर्चा- (१) अध्यक्ष किसी ऐसे पर्याप्त लोक महत्व के विषय पर जो सदन में हाल में प्रश्ननोत्तर का विषय रहा हो, चर्चा करने के लिए आधे घण्टे का समय नियत कर सकेंगे।

(२) जब तक अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें यह नियतन साधारणतया सदन के उपवेशन के दौरान किसी मंगलवार या बृहस्पतिवार के लिए सामान्य कार्य की समाप्ति के उपरान्त किया जायेगा।

(३) कोई सदस्य जो ऐसा विषय उठाना चाहते हों, उस दिन से, जिस दिन वे उस विषय को उठाना चाहते हों, तीन दिन पूर्व प्रमुख सचिव को उसकी लिखित सूचना भेजेंगे और इस विषय या उन विषयों का, जिनको वे उठाना चाहते हों, संक्षेप में उल्लेख करेंगेः
परन्तु सूचना के साथ व्याख्यात्मक टिप्पणी होगी जिसमें सम्बद्ध विषयों पर चर्चा उठाने के कारण बताये जायेंगेः
किन्तु अध्यक्ष सम्बद्ध मंत्री की सम्मत्ति से सूचना की अवधि संबंधी अपेक्षा को हटा सकेंगे।

(४) यदि आवश्यक हो तो एक ही उपवेशन में दो सूचनायें ली जा सकेंगी। यदि दो से अधिक सूचनायें प्राप्त हुई हों और अध्यक्ष ने उनको स्वीकार कर लिया हो तो अध्यक्ष यह विनिश्चित करेंगे कि उनमें से कौन सी दो ली जायं: परन्तु यदि कोई विषय जो किसी विशेष दिन के लिए चर्चार्थ रखा गया हो यदि उस दिन निस्तीर्ण न हो सके तो वह अन्य किसी दिन तब तक नहीं रखा जायेगा जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें।

(५) सदन के समक्ष कोई औपचारिक प्रस्ताव न होगा और न मत लिए जायेंगे। जिस सदस्य ने सूचना दी हो वह एक संक्षिप्त वक्तव्य द्वारा उस विषय का पुरःस्थापन करेंगे। सम्बद्ध मंत्री संक्षेप में उत्तर देंगे। तत्पश्चात् अध्यक्ष अन्य सदस्यों को किसी तथ्य विषय के अतिरिक्त स्पष्टीकरण के प्रयोजन से प्रश्न पूछने की अनुज्ञा दे सकेंगे। विषय पुरःस्थापित करने वाले सदस्य को उत्तर देने के लिए दूसरी बार बोलने की अनुज्ञा दी जा सकेगी और सम्बद्ध मंत्री के अन्तिम कथन होने पर चर्चा समाप्त हो जायेगी।

५०- प्रश्नों और उत्तरों के पूर्व प्रकाशन का प्रतिषेध- प्रश्न जिनकी सदस्यों ने सूचना दी हो, और उनके उत्तर जो मंत्री सदन में देना चाहते हों, तब तक प्रकाशनार्थ नहीं दिये जायेंगे जब तक कि सदन में प्रश्न न ले लिये जायं और उनके उत्तर न दे दिये जायं या पटल पर न रख दिये जायं।

अध्याय VIII – अविलम्बनीय लोक महत्व के विषयों पर ध्यान दिलाना

५१- अविलम्बनीय लोक महत्व के विषयों पर ध्यान दिलाना- (१) कोई सदस्य अविलम्बनीय लोक महत्व के विषय पर मंत्री का ध्यान आकृष्ट करने की सूचना प्रमुख सचिव को उपवेशन प्रारम्भ होने के एक घण्टा पूर्व दे सकेंगे। ऐसी सूचना द्वि-प्रतिक होगी। प्रमुख सचिव सूचना की एक प्रति सम्बद्ध मंत्री को सूचनार्थ भेज देंगे।

(२) किसी ऐसी सूचना के स्वीकृत हो जाने पर सम्बद्ध मंत्री सूचनांकित विषय पर उसी दिन अपना संक्षिप्त वक्तव्य देंगे या भावी तिथि पर वक्तव्य देने के लिये समय मांग सकेंगे। लिखित वक्तव्य होने की दशा में उसकी एक प्रति सम्बद्ध सदस्य को भी दी जायेगी।

(३) ऐसे वक्तव्य पर कोई वाद-विवाद नहीं होगा परन्तु अध्यक्ष यदि उचित समझें तो सूचनांकित विषय संबंधी तथ्यों के स्पष्टीकरण के लिये प्रश्नों की अनुमति दे सकेंगे।

(४) एक ही उपवेशन में एक से अधिक ऐसे विषय नहीं उठाये जायेंगे।

(५) एक ही दिन के लिए एक से अधिक सूचनायें प्राप्त होने की दशा में उस सूचना को स्वीकार किया जायेगा जिसका विषय अध्यक्ष की राय में सर्वाधिक अविलम्बनीय और महत्वपूर्ण हो।

अध्याय IX – अविलम्बनीय लोक महत्व के विषयों पर थोड़े समय के लिये चर्चा

५२- चर्चा उठाने की सूचना- अविलम्बनीय लोक महत्व के विषय पर चर्चा उठाने के इच्छुक कोई सदस्य उठाये जाने वाले विषय का स्पष्टतया तथा सुतथ्यतया उल्लेख कर प्रमुख सचिव को लिखित रूप में सूचना दे सकेंगेः
परन्तु सूचना के साथ एक व्याख्यात्मक टिप्पणी संलग्न होगी जिसमें विषय की चर्चा उठाने के कारण दिये जायेंगेः
और सूचना का समर्थन कम से कम दो अन्य सदस्यों के हस्ताक्षर से होगा।

५३- अध्यक्ष ग्राह्यता का विनिश्चय करेंगे- यदि अध्यक्ष का सूचना देने वाले सदस्य से और मंत्री से ऐसी जानकारी के मांगने के बाद जिसे वे आवश्यक समझें, समाधान हो जाये कि विषय अविलम्बनीय है तथा इतने महत्व का है कि सदन में किसी दिन शीघ्र ही उठाया जाना चाहिये तो वे सूचना गृहण कर सकेंगे और सदन नेता के परामर्श से उस विषय को चर्चार्थ लेने के लिये तिथि व समय निश्चित कर देंगे। वह तिथि को तथा सूचना के विषय को सदन में घोषित करेंगे और चर्चा के लिये उतने समय की अनुमति दें सकेंगे जितना कि परिस्थितियों में उचित समझें और जो ढाई घंटे से अधिक न होः
परन्तु ऐसे विषय पर चर्चा के लिये इससे पूर्व कोई अवसर अन्यथा उपलब्ध हो तो अध्यक्ष सूचना गृह ण करने से इन्कार कर सकेंगे।

५४-औपचारिक प्रस्ताव नहीं रखा जायेगा- सदन के सामने न तो कोई औपचारिक प्रस्ताव होगा और न मतदान होगा। जिस सदस्य ने सूचना दी हो वे संक्षिप्त वक्तव्य दे सकेंगे और मंत्री संक्षेप में उत्तर देंगे। किसी अन्य सदस्य को भी चर्चा में भाग लेने की अनुमति दी जा सकेगी। विषय पुरःस्थापित करने वाले सदस्य को उत्तर देने के लिये दूसरी बार बोलने की अनुज्ञा दी जा सकेगी और सम्बद्ध मंत्री का अंतिम कथन होने पर चर्चा समाप्त हो जायेगी।

५५- भाषणों के लिये समय-सीमा- अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें भाषणों के लिये समय-सीमा विहित कर सकेंगे।

अध्याय X – अविलम्बनीय लोक महत्व के विषय पर कार्य-स्थगन प्रस्ताव

५६- सूचना देने की रीति- जिस दिन कार्ये-स्थगन प्रस्ताव प्रस्तुत करना हो उस दिन का उपवेशन आरम्भ होने के कम से कम एक घंटे पूर्व उसकी द्वि-प्रतिक सूचना प्रमुख सचिव को दी जायेगी। प्रमुख सचिव सूचना की एक प्रति को सम्बद्ध मंत्री के पास भेज देंगे।

५७- प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिये अध्यक्ष की सम्मत्ति की आवश्यकता- इन नियमों के उपबन्धों के अधीन किसी लोक महत्व के निश्चित अविलम्बनीय विषय पर चर्चा करने के उददेश्य से सदन के कार्य-स्थगन का प्रस्ताव अध्यक्ष की सम्मति से प्रस्तुत किया जा सकेगा।

५८- प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अधिकार पर निर्बन्धन- कार्य-स्थगन प्रस्ताव निम्नलिखित निर्बन्धनों के अधीन ग्राह्य होगा-

(१) एक ही उपवेशन में एक से अधिक प्रस्ताव नहीं किये जायेंगे,

(२) एक ही प्रस्ताव द्वारा एक से अधिक विषय पर चर्चा नहीं होगी,

(३) प्रस्ताव हाल में ही घटित किसी निर्दिष्ट विषय तक निर्बद्ध रहेगा,

(४) प्रस्ताव द्वारा विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं उठाया जायेगा,

(५) प्रस्ताव द्वारा किसी ऐसे विषय पर पुनः चर्चा नहीं हो सकेगी जिस पर उसी सत्र में चर्चा हो चुकी हो,

(६) प्रस्ताव में कोई ऐसा विषय नहीं लाया जा सकेगा जो पहले से सदन के विचारार्थ निर्धारित किया जा चुका हो, किन्तु इस आधार पर प्रस्ताव को अग्राह्य करने के संवंध में अध्यक्ष इस बात को ध्यान में रखेंगे कि प्रत्याशित विषय पर चर्चा उचित समय के भीतर सदन के समक्ष आने की सम्भावना है, तथा

(७) प्रस्ताव का विषय ऐसा नहीं होगा कि जिस पर कोई संकल्प प्रस्तुत न किया जा सके।

५९-न्यायाधिकरण, आयोग आदि के विचाराधीन विषय पर चर्चा के लिये प्रस्ताव- ऐसे प्रस्तावों को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा नहीं दी जायेगी जो किसी ऐसे विषय पर चर्चा उठाने के लिये हो जो किसी न्यायिक या अर्ध-न्य़ाय़िक कृत्य करने वाले किसी संविहित न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के या किसी विषय की जांच या अनुसंधान करने के लिये नियुक्त किसी आयोग या जांच न्यायालय के सामने लम्बित हो;
परन्तु यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाय कि इससे न्यायाधिकरण, संविहित प्रधिकारी, आयोग या जांच न्यायालय, द्वारा उस विषय के विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आंशका नहीं है तो अध्यक्ष स्वविवेक से ऐसे विषय को सदन में उठाने की अनुमति दे सकेंगे जो जांच की प्रक्रिया या व्याप्ति या प्रक्रम से संबंधित हो।

६०-कार्य-स्थगन प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिये अनुज्ञा मांगने की रीति- (१) यदि अध्यक्ष इस विचार के हों कि प्रस्थापित विषय नियमानुकूल है और नियम ५७ के अन्तर्गत वे अपनी सम्मति दें तो वे सम्बद्ध सदस्य को पुकारेंगे जो अपने स्थान पर खड़े होकर सदन के स्थगित करने का प्रस्ताव उपस्थित करने की अनुज्ञा मांगेंगे।

(२) यदि अनुज्ञा देने पर आपत्ति की जाय तो अध्यक्ष उन सदस्यों से जो अनुज्ञा प्रदान करने के पक्ष में हों अपने स्थानों पर खड़े होने की प्रार्थना करेंगे और यदि तदनुसार कम से कम तात्कालिक सदन के कुल सदस्यों के द्वाद्शांश सदस्य खड़े हो जायें तो अध्यक्ष सूचित करेंगे कि अनुज्ञा प्रदान की गयी। यदि अपेक्षित संख्या से कम सदस्य खड़े हों तो अध्यक्ष सदस्य को सूचित कर देंगे कि उन्हें सदन की अनुज्ञा प्राप्त नहीं है।

 

६१-प्रस्ताव को लेने का समय- यदि ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुज्ञा प्राप्त हो जाय तो दिन का कार्य समाप्त होने के लिये साधारणतया नियत समय से एक घंटा पूर्व या यदि अध्यक्ष ऐसा निर्देश दें तो ऐसे पूर्व समय पर जबकि दिन का कार्य समाप्त हो जाय उस प्रस्ताव को लिया जायेगा।

६२- चर्चा के समय की परिसीमा- (१) अविलम्बनीय लोक महत्व के निश्चित विषय पर विचार करने के प्रस्ताव पर चर्चा यदि पहले समाप्त न हो जाय आरम्भ होने से दो घंटे पूरे होने पर आप से आप समाप्त हो जायेगी और उसके पश्चात् कोई प्रश्न नहीं रखा जायेगा।

(२) अध्यक्ष भाषणों के समय को निर्धारित करेंगे।
परन्तु कोई भाषण १५ मिनट से अधिक अवधि का नहीं होगा।

अध्याय XI – विशेषाधिकार की अवहेलना तथा अवमान के प्रश्

६३- विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान के प्रश्न का उठाया जाना- किसी सदस्य के, अथवा सदन के, अथवा उसकी किसी समिति के विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान के प्रश्न को अध्यक्ष की सम्मति से-

(१) किसी सदस्य की ओर से शिकायत द्वारा,

(२) प्रमुख सचिव की ओर से प्रतिवेदन द्वारा,

(३) याचिका द्वारा, अथवा

(4) समिति के प्रतिवेदन द्वारा उठाया जा सकेगाः
परन्तु यदि विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान सदन के प्रत्यक्ष ही हुआ हो तो सदन अध्यक्ष की सम्मति से, बिना किसी शिकायत के ही कार्यवाही कर सकेगा।

६४-सदस्य द्वारा शिकायत- जो सदस्य ऐसा प्रश्न उठाना चाहें वे प्रमुख सचिव को लिखित सूचना देंगे। यदि शिकायत का आधार कोई लेख्य हो तो मूल लेख्य या उसकी प्रतिलिपि सूचना के साथ संलग्न की जायेगी।
यदि शिकायत सदन के किसी सदस्य के विरूद्ध हो तो ऐसी सूचना द्वि-प्रतिक होगी जिसकी एक प्रति सम्बन्धित सदस्य को भेज दी जायेगी।

६५-ग्राह्यता की शर्तें- (१) ऐसे प्रश्न की ग्राह्यता निम्नलिखित शर्तो से नियंत्रित होगी-

(क) प्रश्न किसी हाल ही में घटित निश्चित विषय तक निर्बद्ध हो,

(ख) सूचना के विषय से विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान का प्रश्न प्राग्दर्शन से विदित हो, तथा

(ग) ऐसे मामले में सदन का हस्तक्षेप आवश्यक होः
परन्तु यदि शिकायत किसी सदस्य के विरूद्ध हो तो अध्यक्ष, अपनी सम्मति तथा ग्राह्यता सम्बन्धी अपनी स्वीकृति देने के पूर्व सदस्य को, सम्बद्ध लेख्यों, यदि कोई हो, के निरीक्षण का अवसर देकर सुनेंगे और आवश्यकता होने पर शिकायतकर्ता को भी सुन सकेंगे ।

(२) एक उपवेशन में एक से अधिक प्रश्न नहीं उठाये जायेंगे।

६६-शिकायत का प्रस्तुत किया जाना- यदि इन नियमों के अन्तर्गत अध्यक्ष के मत में विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान की सूचना सम्मति योग्य तथा ग्राह्य हो तो वे उस मामले को विशेषाधिकार समिति को जांच, अनुसंधान तथा प्रतिवेदन के निमित्त निर्दिष्ट कर सकेंगे और उसकी सूचना सदन को देंगे। अध्यक्ष के मत में सूचना अग्राह्य हो तो वे अस्वीकृत की सूचना सदन को देंगे:
किन्तु यदि अध्यक्ष आवश्यक समझें तो अपना निर्णय देने के पूर्व सम्बन्धित सदस्य तथा अन्य सदस्यों को सुन सकेंगे।

६७-विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान के प्रश्न पर सदन द्वारा विचार-

यदि अध्यक्ष इस मत के हों कि सूचना का विषय ऐसा है जो बिना विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट किये ही सदन में निस्तीर्ण किया जा सकता है तो यह प्रस्ताव किया जा सकेगा कि प्रश्न पर तत्काल या किसी आगामी तिथि पर विचार किया जाय:
परन्तु यदि सूचना प्रमुख सचिव या समिति के प्रतिवेदन द्वारा अथवा याचिका द्वारा प्राप्त हुई है तो सदन में विषय पर विचार आरम्भ होने के पूर्व यदि अध्यक्ष आवश्यक समझें, तो प्रतिवेदन अथवा याचिका की प्रतियां छपवा कर सदस्यों में वितरित की जायेंगी।

 

६८- सदन के समक्ष शिकायत का निस्तारण- (१) यदि सदस्य के विरूद्ध शिकायत का सदन में निस्तारणार्थ लिया जाना निश्चित हो जाय तो उक्त सदस्य को सूचना दी जायेगी और उनको स्पष्टीकरण तथा निर्दोशिता सिद्धि के संबंध में अपना पक्ष प्रस्तुत करने का तथा तत्संबंधी लेख्य या लेख्यों के निरीक्षण करने तथा प्रस्तुत करने का अवसर दिया जायेगा।

(२) वे सदस्य जिनके विरूद्ध शिकायत की गयी है, इस प्रकार नियत दिन पर सदन में उपस्थित होंगे और यदि उपस्थित होने में असमर्थ हों तो वे अध्यक्ष को अनुपस्थिति के कारण की सूचना देंगे और सदन, दिये गये कारण को देखते हुए उस विषय पर विचार स्थगित कर सकेगा। किन्तु यदि सदन की राय में अनुपस्थिति का समुचित कारण नहीं है या वह सदस्य जान-बूझकर अनुपस्थित रहे तो सदन उनकी अनुपस्थिति में ही उस विषय पर विचार प्रारम्भ कर सकेगा। यदि कोई सदस्य अनुपस्थित हो और अपरिहार्य परिस्थितिवश वे अपनी अनुपस्थिति के कारणों की सूचना न दे सके हों तो सदन उनकी प्रार्थना पर प्रश्न को पुनः विचारार्थ ले सकेगा।

(३) वे सदस्य जिनके विरूद्ध शिकायत की गयी हो सदन में उपस्थित होकर अपना स्पष्टीकरण देने के बाद सदन से बाहर चले जायेंगे और वे तब तक सदन में प्रवेश नहीं करेंगे जब तक कि वह विषय सदन के विचाराधीन रहे किन्तु सदन उन्हें कार्यवाही सुनने की अनुमति दे सकेगा और अतिरिक्त स्पष्टीकरण के लिये या क्षमा याचना के लिये उन्हें पुनः बुला सकेगा।

(४) इस नियम में उपबद्ध प्रक्रिया उन व्यक्तियों के संबंध में भी, जो सदस्य न हों, यथोचित परिवर्तनों सहित प्रवृत्त होगी।

६९- प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के उपरान्त प्रस्ताव- प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के उपरान्त विशेषाधिकार समिति के सभापति अथवा उसके कोई सदस्य या सदन के कोई सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि समिति के प्रतिवेदन पर तुरन्त ही या किसी भावी समय में विचार किया जाय जिसके भीतर प्रतिवेदन मुद्रित कराकर उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को दी जा सकें।

७०- मूल प्रस्ताव- जब सदन इस प्रस्ताव से- (१) कि विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान, जो सदन के प्रत्यक्ष ही किया गया हो, के प्रश्न पर विचार किया जाय, या

(२) कि नियम ६७ के अन्तर्गत विषय पर तत्काल विचार किया जाय, या

(३) कि नियम ६९ के अन्तर्गत विशेषाधिकार समिति का प्रतिवेदन विचारार्थ लिया जाय, सहमत हो जाय तो कोई सदस्य मूल प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकेंगे जिसमें यथास्थिति विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान अथवा प्रतिवेदन को अभिपुष्ट करते हुए सुझाव होगा कि सदन को उस पर क्या कार्यवाही करनी चाहिये तथा कोई अन्य सदस्य प्रस्ताव में संशोधन प्रस्तुत कर सकेंगे।

७१- दोषारोपित व्यक्ति के लिये अवसर- उस दशा को छोड़कर जबकि विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान सदन के प्रत्यक्ष किया गया हो सदन दण्ड आदेश देने के पूर्व दोषारोपित व्यक्ति को उस पर लगाये गये दोष के स्पष्टीकरण या निर्दोशिता-सिद्धि के संबंध में अपना पक्ष उपस्थित करने का अवसर देगा
परन्तु यदि वह विषय विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट किया जा चुका है और दोषारोपित व्यक्ति समिति के समक्ष अपना पक्ष उपस्थित कर चुका है तो जब तक सदन अन्यथा निर्देश न दे, उस व्यक्ति के लिये सदन द्वारा ऐसा अवसर दिया जाना आवश्यक न होगा।

७२- दोषारोपित पक्ष का आह्वान- अध्यक्ष दोषारोपित व्यक्ति को सूचना अथवा बंदीकरण की अधिपत्र द्वारा कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर सदन के सम्मुख उपस्थित होने के लिये आहूत कर सकेंगे।

७३- दण्ड- (१) सदन स्वयं अथवा विशेषाधिकार समिति की सिफारिश पर निम्नलिखित दण्ड दे सकता है:-

(१) भर्त्सना,

(२) शास्ति,

(३) सदस्य का निलम्बन,

(४) जुर्माना,

(५) सदस्य का निष्कासन,

(६) कारावास, जिसकी अवधि सदन के प्रस्ताव पर निर्भर है परन्तु सत्रावसान या विघटन के उपरान्त आगे नहीं बढ़ सकती है, और

(७) अन्य कोई दण्ड जिसे सदन अनुच्छेद १९४ के उपबन्धों के अन्तर्गत उचित और ठीक समझे।

(२) सदन की सेवा से निलम्बित सदस्य सदन के परिसर में प्रवेश करने से और सदन तथा समितियों की कार्यवाही, में भाग लेने से वर्जित रहेंगे, परन्तु अध्यक्ष किसी निलम्बित सदस्य को तदर्थ प्रार्थना किये जाने पर सदन के परिसर में किसी विशेष प्रयोजन से आने की अनुमति दे सकेंगे।

(३) सदन प्रस्ताव किये जाने पर यह आदेश कर सकेगा कि निलम्बन का दिया हुआ दण्ड या उसका असमाप्त भाग निरस्त किया जाय ।

(४) यदि नियम ७३(१) के खण्ड (४) के अनुसार किसी व्यक्ति को जुर्माना का दण्ड दिया जाता है तो जुर्माने की धनराशि की वसूली राज्य सरकार को देय ऋण के रूप में भूराजस्व के बकाये की भांति की जायेगी और वसूली का प्रमाण-पत्र सम्बन्धित जिलाधिकारी को प्रमुख सचिव के हस्ताक्षर से जारी किया जा सकेगा। अनु0 १९४

७४- निराधार शिकायत- ऐसी अवस्था में जबकि सदन को यह पता चले कि विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान का आरोप निराधार है तो वह आदेश दे सकेगा कि शिकायत करने वाला उस पक्ष को जिसके विरूद्ध शिकायत की गयी हो, वाद-व्यय के रूप में ऐसी धनराशि दे जो ५०० रूपये से अधिक न होगी ।

७५- सदन के आदेश का निष्पादन- अध्यक्ष या उनके द्वारा इस प्रयोजन के लिये प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति को यह शक्ति होगी कि सदन द्वारा दिये गये आदेशों और दण्ड का निष्पादन कर सके।

७६- वाद-विवाद की संक्षिप्तता- विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान विषयक प्रश्नों पर सभी प्रक्रमों में वाद-विवाद संक्षिप्त होगा।

७७- प्रक्रिया का विनियमन- समिति में अथवा सदन में विशेषाधिकार अथवा अवमान के प्रश्न पर विचार से सम्बद्ध विषयों की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिये अध्यक्ष ऐसे निर्देश दे सकेंगे, जो आवश्यक हों ।

७८- विशेषाधिकार अथवा अवमान के प्रश्न को समिति को निर्दिष्ट करने की अध्यक्ष की शक्ति- इन नियमों में किसी बात के रहते हुए भी अध्यक्ष विशेषाधिकार अथवा अवमान के किसी प्रश्न को परीक्षा, जांच या प्रतिवेदन के लिये विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट कर सकेंगे और उससे सदन को अवगत करायेंगे।

७९- एक सदन के सदस्य, अधिकारी अथवा सेवक द्वारा किसी दूसरे सदन के विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान पर कार्यवाही की प्रक्रिया- यदि दूसरे सदन या भारत में किसी अन्य विधान मण्डल के सदस्य, अधिकारी या सेवक इस सदन के अवमान या अभिकथित विशेषाधिकार की अवहेलना के मामले में अन्तर्ग्रस्त हो तो अध्यक्ष उस विषय को उस सदन के अधिष्ठाता अधिकारी को निर्दिष्ट कर देंगे परन्तु यदि प्रश्न उठाने वाले सदस्य को सुनने के उपरान्त अथवा जहां शिकायत किसी लेख्य पर आधारित हो वहां लेख्य का अवलोकन करने के उपरान्त अध्यक्ष को यह समाधान हो जाय कि विशेषाधिकार की कोई अवहेलना नहीं हुई है अथवा मामला इतना तुच्छ है कि उस पर ध्यान देना उचित नहीं है तो उस दशा में वे विशेषाधिकार की अवहेलना के प्रश्न को अग्राह्यकर सकेंगे। जब दूसरे सदन या भारत के किसी अन्य विधान मण्डल के अवमान अथवा विशेषाधिकार की अभिकथित अवहेलना का मामला जिसमें इस सदन के कोई सदस्य, अधिकारी या सेवक अन्तर्ग्रस्त हो, इस सदन को अवमानित सदन के अधिष्ठाता अधिकारी द्वारा निर्दिष्ट किया जाय तो अध्यक्ष उस मामले में उसी प्रकार कार्यवाही करेंगे जैसे कि यह सदन के विशेषाधिकार की अवहेलना का मामला हो और प्राप्त हुए मामले में की गयी जांच तथा कार्यवाही का प्रतिवेदन उस अधिष्ठाता अधिकारी को जिसने मामला निर्दिष्ट किया हो, भेज देंगे। सदस्यों के बन्दीकरण, निरोध आदि और रिहाई की अध्यक्ष को सूचना

८०- दण्डाधिकारी द्वारा सदस्यों के बन्दीकरण, निरोध आदि की अध्यक्ष को सूचना- जब कोई सदस्य किसी दोषारोपण या किसी दण्ड्य अपराध के लिये बन्दी किये जायं या उन्हें किसी न्यायालय द्वारा कारावास का दण्डादेश दिया जाय या किसी कार्यपालिका के आदेश के अन्तर्गत निरूद्ध किया जाय, तो यथास्थिति न्यायाधीश या दण्डाधिकारी या कार्यपालिका प्राधिकारी अनुसूची में दिये गये समुचित प्रपत्र में यथास्थिति, बन्दीकरण, निरोध या दोष-सिद्धि के कारण तथा सदस्य के निरोध या कारावास का स्थान भी दर्शाते हुए ऐसे तथ्य की सूचना शीध्रता के साथ अध्यक्ष को देगा।

८१- सदस्य की रिहाई पर अध्यक्ष को सूचना- जब कोई सदस्य बन्दी किये जायं और दोषसिद्धि के बाद अपील लम्बित होने तक जमानत पर रिहा किये जायं या अन्यथा रिहा किये जायं तो ऐसे तथ्य की सूचना भी संबंधित प्राधिकारी द्वारा अनुसूची में दिये गये समुचित प्रपत्र में अध्यक्ष को दी जायेगी।

८२- दण्डाधिकारी से प्राप्त सूचना पर कार्यवाही- नियम ८० या ८१ में निर्दिष्ट संसूचना, जो वायरलेस संदेश, टेलीप्रिन्टर अथवा तार द्वारा भी भेजी जा सकेगी प्राप्त होने के बाद यथा संभव शीध्र अध्यक्ष उसे सदन में पढ़कर उसे सुनायेंगे, यदि वह उपवेशन में हो या यदि सदन उपवेशन में न हो तो निर्देश देंगे कि सदस्यों को उसकी सूचना दे दी जाय:
परन्तु यदि किसी ऐसे सदस्य के जमानत पर या अन्यथा प्रमुक्त होने की सूचना सदन को मूल कारावास की सूचना दिये जाने से पहले ही प्राप्त हो जाय तो उसके बन्दीकरण या कारावासित होने तथा बाद में प्रमुक्त होने के तथ्य को अध्यक्ष चाहें तो सदन को सूचित न करें।

सदन के परिसर के भीतर विधि सम्बन्धी आदेशिका की तामीली तथा गिरफ्तारी से संबंधित प्रक्रिया

८३- सदन के परिसर के भीतर बन्दीकरण- सदन के परिसर के भीतर अध्यक्ष की अनुज्ञा प्राप्त किये बिना कोई गिरफ्तारी नहीं की जायेगी।

८४- विधि संबंधी आदेशिका की तामीली- दीवानी या फौजदारी विधि संबंधी आदेशिका सदन के परिसर के भीतर अध्यक्ष की अनुज्ञा प्राप्त किये बिना तामील नहीं की जायेगी।

अध्याय XII – संकल्प

८५- असरकारी सदस्यों द्वारा संकल्पों की सूचना- जो असरकारी सदस्य कोई संकल्प प्रस्तुत करना चाहें तो वे प्रमुख सचिव को अपने इस मन्तव्य की लिखित सूचना कम से कम १५ दिन पहले देंगे और सूचना के साथ उस संकल्प की एक प्रति भेजेंगे जिसे वे प्रस्तुत करना चाहते हैं।

८६- शासन द्वारा संकल्प की सूचना- यदि मंत्री कोई संकल्प उपस्थित करना चाहें तो वे सात दिन की सूचना देंगें और उसके साथ संकल्प की एक प्रति प्रमुख सचिव को भेजेंगे जो साधारणतया उसकी प्राप्ति के अड़तालिस घंटों के भीतर उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को भिजवायेंगेः
परन्तु अध्यक्ष इससे कम समय की सूचना स्वीकार कर सकेंगे।

८७- संकल्प का वाद विषय- इन नियमों के उपबन्धों के अधीन कोई सदस्य अथवा मंत्री सामान्य लोक हित के किसी विषय के संबंध में संकल्प प्रस्तुत कर सकेंगे।

८८- संकल्प का रूप- संकल्प राय की घोषणा अथवा सिफारिश के रूप में हो सकेगा या ऐसे रूप में हो सकेगा जिससे कि शासन के किसी कार्य अथवा नीति का सदन द्वारा अनुमोदन या अननुमोदन अभिलिखित किया जाय या कोई संदेश दिया जाय या किसी कार्यवाही के लिए संस्तवन, अनुरोध अथवा प्रार्थना की जाय या किसी विषय अथवा स्थिति पर शासन के विचारार्थ ध्यान आकृष्ट किया जाय या किसी ऐसे अन्य रूप में हो सकेगा जो अध्यक्ष उचित समझें।

८९- संकल्प की ग्राह्यता की शर्ते- किसी संकल्प के ग्राह्य होने के लिए यह आवश्यक है कि वह निम्नलिखित शर्तों को पूरा करे, अर्थात्-

(१) वह स्पष्टतया और सुतथ्यतः व्यक्त किया जायेगा,

(२) उससे सारतः एक ही निश्चित वाद-विषय उठाया जायेगा,

(३) उसमें प्रतर्क, अनुमान, व्यंग्यात्मक पद, लांछन या मान-हानिकारक कथन नहीं होंगे,

(४) उसमें व्यक्तियों की सरकारी या सार्वजनिक हैसियत के अतिरिक्त उनके आचरण या चरित्र का निर्देश नहीं होगा, तथा

(५) उसका किसी ऐसे विषय से संबंध नहीं होगा जो भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के न्यायनिर्णयन के अन्तर्गत हो।

९०- न्यायाधिकरण अथवा संविहित प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित विषय पर चर्चा उठाना- ऐसे संकल्प को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा नहीं दी जायेगी जो किसी ऐसे विषय पर चर्चा उठाने के लिए हो जो किसी न्यायिक या अर्द्ध न्यायिक कृत्य करने वाले किसी संविहित न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के या किसी विषय की जांच या अनुसंधान करने के लिए नियुक्त किसी आयोग या जांच न्यायालय के सामने लम्बित हों:
परन्तु यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाय कि इससे न्यायाधिकरण, आयोग या जांच न्यायालय द्वारा उस विषय के बारे में विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है तो अध्यक्ष, स्वविवेक से ऐसे विषय को सदन में उठाने की अनुमति दे सकेंगे, जो जांच की प्रक्रिया या व्याप्ति या प्रक्रम से संबंधित हों।

९१- संकल्पों की ग्राह्यता- अध्यक्ष, संकल्प की ग्राह्यता के बारे में विनिश्चय करेंगे और संकल्प को नियमानुकूल बनाने के लिये स्वविवेक से उसके रूप में परिवर्तन कर सकेंगे। वे किसी संकल्प या उसके किसी भाग को अस्वीकृत कर सकेंगे जो नियमानुकूल न हो अथवा संकल्प प्रस्तुत करने के अधिकार का दुरूपयोग हो अथवा किसी अन्य प्रकार से सदन की प्रक्रिया में बाधा या उस पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए आयोजित हो।

९२- असरकारी सदस्य के संकल्प की प्रतिलिपि शासन को भेजा जाना- असरकारी सदस्य का संकल्प यदि शलाका में स्थान प्राप्त कर ले और अध्यक्ष द्वारा ग्रहीत हो जाय तो उस पर चर्चा के लिए नियत दिनांक से साधारणतया १२ दिन पूर्व उसकी एक प्रतिलिपि शासन को भेजी जायेगी।

९३- संकल्पों का प्रस्तवन तथा वापसी- (१) कार्य-सूची में जिन सदस्यों के नाम में संकल्प हो वे अथवा कोई दूसरे सदस्य, जिनको उन्होंने अपनी ओर से कार्य करने के लिए प्राधिकृत किया हो, पुकारे जाने पर संकल्प को प्रस्तुत करेंगे और उस दशा में कार्य-सूची में दिए हुए शब्दों में औपचारिक प्रस्ताव के साथ अपना भाषण देंगे अथवा यदि वे संकल्प प्रस्तुत न करना चाहें तो उस दशा में वे अपना कथन उस बात तक ही सीमित रखेंगे:
परन्तु अध्यक्ष स्वविवेक से उस सदस्य को संक्षेप में यह वक्तव्य देने की अनुज्ञा दे सकेंगे कि वे संकल्प को क्यों प्रस्तुत करना नहीं चाहते ।

(२) यदि सदस्य पुकारे जाने के समय अनुपस्थित हों तो और उप नियम (१) के अन्तर्गत किसी दूसरे सदस्य को उनकी ओर से कार्य करने के लिए नियमित रूप से प्राधिकृत न किया गया हो तो उनके नाम में अंकित संकल्प व्यपगत हो जायेगा।

९४- संशोधन- जब कोई संकल्प चर्चाधीन हो तो कोई सदस्य संकल्पों से संबंधित नियमों के अधीन रहते हुए उस संकल्प पर संशोधन प्रस्तुत कर सकेंगे।

९५- संशोधनों की सूचना- (१) यदि संशोधन की एक प्रति संकल्प पर चर्चा के लिए निश्चित दिन के छत्तीस घंटे पूर्व प्रमुख सचिव को न दी जा चुकी हो तो कोई़ सदस्य उस संशोधन के प्रस्तावित किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे और यह आपत्ति अभिभावी होगी जब तक कि अध्यक्ष संशोधन को प्रस्तावित करने की अनुज्ञा न दे दें।

(२) जिन संशोधनों की सूचना दी गयी हो उनकी सूचियां प्रमुख सचिव, यदि समय हो, तो सदस्यों के लिए समय-समय पर उपलब्ध करेंगे।

९६- भाषणों की समय-सीमा- किसी भाषण की अवधि अध्यक्ष की अनुज्ञा के बिना पंद्रह मिनट से अधिक नहीं होगीः
परन्तु संकल्प का प्रस्तावक उसे प्रस्तुत करते समय और सम्बद्ध विभाग का भार-साधक मंत्री, जब वे उस पर पहली बार बोलें,२५ मिनट तक या इससे इतने और अधिक समय तक जिसकी अध्यक्ष अनुज्ञा दें, बोल सकेंगे

९७- संकल्प की वापसी- (१) कोई सदस्य, जिन्होंने संकल्प या किसी संकल्प पर संशोधन प्रस्तुत किया हो, सदन की अनुज्ञा के बिना उसे वापस नहीं लेंगे।

(२) वापस लेने की अनुज्ञा मांगने के प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति नहीं दी जायेगी।

९८- संकल्प जिन पर चर्चा नहीं हुई- यदि किसी संकल्प पर, जिसकी सूचना दी जा चुकी हो और जो कार्य-सूची में प्रविष्ट किया जा चुका हों, उस उपवेशन में चर्चा न हुई हो तो उसको व्यपगत हुआ समझा जायेगा।

९९ -संकल्प का विभाजन- जब किसी संकल्प पर, जिसमें कई प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हों, चर्चा हो चुकी हो, तब अध्यक्ष उस संकल्प को स्व विवेक से विभाजित कर सकेंगे और उसके प्रत्येक या किसी अंश को, जैसा भी वे उचित समझें, पृथक मत के लिए रख सकेंगे।

१००- संकल्प की पुनरावृत्ति- अन्यथा उपबन्धित अवस्था को छोड़कर यदि कोई संकल्प लम्बित हो अथवा निस्तीर्ण किया जा चुका हो तो यथास्थिति संकल्प के लम्बनकाल में अथवा उसके निस्तारण की तिथि से ६ महीने के भीतर कोई ऐसा संकल्प या संशोधन प्रस्तुत नहीं किया जायेगा जिसमें सारतः वही वाद विषय या प्रश्न उठाया जाय जो पूर्व संकल्प में अन्तर्निहित था।

१०१- मंत्री के पास पारित संकल्प की प्रति भेजना- प्रत्येक संकल्प की, जिसे सदन ने पारित किया हो, एक प्रति सम्बद्ध मंत्री के पास भेजी जायेगी।

१०२- असरकारी सदस्यों के संकल्पों की अग्रेता- (१) संकल्पों की सूचनाओं की, जो असरकारी सदस्यों ने प्रस्तुत की हो, सापेक्ष अग्रेता का निर्णय अध्यक्ष द्वारा दिये गये निर्देशों के अनुसार की जाने वाली शलाका द्वारा उस दिवस को होगा जो अध्यक्ष नियत करें।

(२) जब तक अध्यक्ष अन्यथा निर्देशे न दें, असरकारी सदस्यों के संकल्पों के निस्तारण के निमित्त किसी दिन की कार्य-सूची में (नियम २५ के परन्तुक के अन्तर्गत अवशिष्ट किसी संकल्प के अतिरिक्त) पांच से अधिक संकल्प नहीं रखे जायेंगे।

अध्याय XIII – प्रस्ताव

१०३- लोक हित के किसी विषय पर प्रस्ताव द्वारा चर्चा- संविधान या इन नियमों में अन्यथा उपबन्धित अवस्था को छोड़कर अध्यक्ष की सम्मति से किये गये प्रस्ताव के बिना सामान्य लोक-हित के विषय पर कोई चर्चा नहीं होगी।

१०४- प्रस्ताव की सूचना- नियम ११० में उपबन्धित अवस्था को छोड़कर प्रस्ताव की सूचना लिखित रूप में दी जायेगी और प्रमुख सचिव को सम्बोधित होगी।

१०५- प्रस्ताव की ग्राह्यता की शर्तें- कोई प्रस्ताव ग्राह्य हो सके तो इसके लिए वह निम्न शर्तें पूरी करेगा, अर्थात् कि-

(१) उसमें सारवान रूप से एक ही निश्चित् प्रश्न उठाया जायेगा,

(२) उसमें प्रतर्क, अनुमान, व्यंगात्मक पद, अभ्यारोप या मान- हानिकारक कथन नहीं होंगे,

(३) उसमें व्यक्तियों की सार्वजनिक हैसियत के अतिरिक्त उनके आचरण या चरित्र के निर्देश नहीं होंगे,

(४) उसमें विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं उठाया जायेगा,

(५) उसमें ऐसे विषय पर फिर से चर्चा नहीं उठायी जायेगी जिस पर उसी सत्र में अथवा पिछले ६ मास के भीतर, जो भी समय पहले पड़ता हो, चर्चा हो चुकी हो,

(६) उसमें ऐसे विषय की पूर्वाशा नहीं की जायेगी जिस पर उसी सत्र में चर्चा होने की संभावना हो,

(७) वह किसी ऐसे विषय से संबंधित नहीं होगा जो भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के न्याय निर्णयन के अन्तर्गत हो।

१०६- अध्यक्ष प्रस्ताव की ग्राह्यता का विनिश्चय करेंगे- अध्यक्ष विनिश्चय करेंगे कि कोई प्रस्ताव या उसका कोई भाग इन नियमों के अन्तर्गत ग्राह्य़ है अथवा नहीं और वे कोई प्रस्ताव या उसका कोई भाग अस्वीकृत कर सकेंगे जो उनकी राय में प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अधिकार का दुरूपयोग हो या सदन की प्रक्रिया में बाधा डालने या उस पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिये आयोजित हो या इन नियमों का उल्लंघन करता हो।

१०७- न्यायाधिकरण, आयोग आदि के समक्ष विषयों पर चर्चा उठाने के लिये प्रस्ताव- ऐसे प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुज्ञा नहीं दी जायेगी जो किसी ऐसे विषय पर चर्चा उठाने के लिये हो जो किसी न्यायिक या अर्ध-न्य़ाय़िक कृत्य करने वाले किसी संविहित न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के या किसी विषय की जांच या अनुसंधान करने के लिये नियुक्त किसी आयोग या जांच न्यायालय के सामने लम्बित हो।
परन्तु यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाय कि इससे न्यायाधिकरण, संविहित अधिकारी, आयोग या जांच न्यायालय द्वारा उस विषय के विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है तो, अध्यक्ष, स्वविवेक से ऐसे विषय को सदन में उठाने की अनुमति दे सकेंगे जो जांच की प्रक्रिया या व्याप्ति या प्रक्रम से संबंधित हो।

१०८- समय-नियतन और प्रस्तावों पर चर्चा- अध्यक्ष, सदन के कार्य की स्थिति पर विचार करने के बाद ऐसे किसी प्रस्ताव पर चर्चा के लिये कोई एक दिन या अधिक दिन या किसी दिन का भाग नियत कर सकेंगे।

१०९- भाषणों के लिये समय-सीमा- अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें भाषणों के लिये समय-सीमा विहित कर सकेंगे।

११०- बिना सूचना के प्रस्ताव- निम्नलिखित प्रस्ताव यदि अध्यक्ष अनुज्ञा दें, बिना सूचना के किये जा सकेंगे-

(१) संवेदना या बधाई प्रस्ताव,

(२) उपवेशन स्थगित करने का प्रस्ताव,

(३) अजनबियों को हटाने का प्रस्ताव,

(४) समितियों के लिये सदस्यों के निर्वाचन का प्रस्ताव,

(५) किसी विधेयक या संकल्प या प्रस्ताव या उस पर संशोधन को वापस लेने का प्रस्ताव,

(६) किसी कार्य को स्थगित करने का प्रस्ताव,

(७) वाद-विवाद को समाप्त करने का प्रस्ताव,

(८) किसी नियम के निलम्बन का प्रस्ताव,

(९) किसी उपवेशन की कालावधि बढ़ाने का प्रस्ताव,

(१०) राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद का प्रस्ताव।

१११- प्रस्ताव की पुनरावृत्ति- अन्यथा उपबन्धित अवस्था को छोड़कर यदि कोई प्रस्ताव लम्बित हो अथवा निस्तीर्ण किया जा चुका हो तो यथास्थिति प्रस्ताव के लम्बनकाल में अथवा उसके निस्तारण की तिथि से ६ महीने के भीतर कोई ऐसा प्रस्ताव या संशोधन प्रस्तुत नहीं किया जायेगा जिसमें सारत: वही वाद-विषय या प्रश्न उठाया जाय जो पूर्व प्रस्ताव में अन्तर्निहित था:
परन्तु जब तक अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें, यहां कही गयी किसी बात से निम्नलिखित प्रस्तावों में से किसी प्रस्ताव के प्रस्तुत किये जाने को रोका गया नहीं समझा जायेगा, अर्थात्-

(क) किसी विधेयक को विचारार्थ लेने या प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट करने का प्रस्ताव जब उसी प्रकार के पिछले प्रस्ताव पर इस आशय का कोई संशोधन कि उस पर राय जानने के लिये विधेयक को घुमाया जाय या पुनः घुमाया जाय, स्वीकृत हो गया हो;

(ख) सभा के पुनर्विचार के लिये राज्यपाल द्वारा विधेयक का प्रत्यावर्तन किये जाने के उपरान्त किया गया कोई प्रस्ताव, जो ऐसे संशोधन के लिये किया जाय तो पुनर्विचारार्थ निर्दिष्ट विषय या विषयों से सुसंगत हो;

(ग) किसी विधेयक के संशोधन का प्रस्ताव जो किसी अन्य संशोधन को, जो स्वीकार हो चुका हो, आनुषंगिक हो या केवल उसका प्रारूपण बदलने के लिये आयोजित हो।

११२- कार्य-स्थगित करने के लिये प्रस्ताव- (१) अनुच्छेद २०४ के अन्तर्गत विनियोग विधेयक के अतिरिक्त किसी अन्य विधेयक पर, जो पुरःस्थापित किया जा चुका हो अथवा कार्य-स्थगन प्रस्ताव के अतिरिक्त किसी अन्य प्रस्ताव पर अथवा संकल्प पर विचार को उसी सत्र में ऐसे कार्य के लिये उपलब्ध किसी भावी दिन अथवा भावी सत्र में अनिश्चित काल के लिये स्थगित करने का प्रस्ताव किसी भी सदस्य द्वारा किसी समय प्रस्तुत किया जा सकेगा और ऐसे प्रस्ताव को तत्समय सभा के सम्मुख अन्य प्रस्तावों पर अग्रेता होगी। अध्यक्ष, प्रस्तावक को तथा यदि प्रस्ताव का विरोध किया जाय तो विरोध करने वाले सदस्य को संक्षिप्त व्याख्यात्मक वक्तव्य देने का अवसर देने के बाद और आगे वाद-विवाद के बिना उस पर प्रश्न उपस्थित कर सकेंगे।

(२) असरकारी सदस्यों के कार्य को किसी निर्धारित दिन के लिये स्थगित करने का प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय तो स्थगित कार्य को उस दिन के लिये नियत सरकारी सदस्यों के कार्य पर प्राथमिकता मिलेगी।

(३) अध्यक्ष कार्य स्थगित करने के ऐसे प्रस्ताव को अस्वीकृत कर सकेंगे यदि उनकी राय में प्रस्ताव सभा के कार्य में बाधा डालने या उपवेशन को स्थगित कराने के प्रयोजन से किया गया है। अनु0 204

११३- विवादान्त- (१) किसी प्रस्ताव के किये जाने के उपरान्त किसी समय भी कोई सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि "अब प्रश्न उपस्थित किया जाय" और जब तक कि अध्यक्ष को यह प्रतीत न हो कि प्रस्ताव इन नियमों का दुरूपयोग है या युक्ति-युक्त वाद-विवाद के अधिकार का उल्लंघन करता है, अध्यक्ष प्रस्ताव रखेंगे कि "अब प्रश्न उपस्थित किया जाय"।

(२) जब उप नियम (१) के अन्तर्गत प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय तो उसके आनुषंगिक प्रश्न या प्रश्नों को और आगे वाद-विवाद के बिना तत्काल प्रस्तुत कर दिया जायगा:
परन्तु अध्यक्ष किसी सदस्य के उत्तर देने के अधिकार को अनुज्ञापित करेंगे जो उसे इन नियमों के अन्तर्गत प्राप्त हो

अध्याय XIV – विधान निर्माण

(क) विधेयकों का पुरःस्थापन तथा प्रकाशन

११४- विधेयकों को पुरः स्थापित करने से पूर्व प्रकाशित करने की अध्यक्ष की शक्ति- अध्यक्ष से इस विषय की प्रार्थना की जाने पर वे किसी सरकारी विधेयक (उद्देश्यों और कारणों के विवरण एवं विधायिनी शक्ति के प्रत्यायोजन तथा वित्तीय आभारों से संबंधित ज्ञापनों सहित यदि कोई हों और यदि आवश्यक हो तो राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी या राज्यपाल की सिफारिश सहित) गजट में प्रकाशन का आदेश दे सकेंगे यद्यपि विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा के लिये कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया हो। उस दशा में विधेयक को पुरः स्थापित करने की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव करना आवश्यक नहीं होगा और यदि विधेयक बाद में पुरःस्थापित किया जाय तो उसको पुनः प्रकाशित करने की आवश्यकता नहीं होगी:
परन्तु साधारणतया विधेयक को इस प्रकार गजट में प्रकाशित करना आवश्यक नहीं होगा यदि सदन सत्र में हो ।

११५- असरकारी सदस्य द्वारा विधेयक के पुर:स्थापन की अनुज्ञा मांगने के लिए प्रस्ताव की सूचना- (१) असरकारी सदस्य जो किसी विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव करना चाहते हों अपने इस अभिप्राय की सूचना देंगे और सूचना के साथ विधेयक की एक प्रति तथा उद्देश्यों और कारणों का एक विवरण जिसमें प्रतर्क नहीं होंगे, भेजेंगे:
परन्तु अध्यक्ष यदि ठीक समझें, उददेश्यों और कारणों के विवरण को पुनरीक्षित कर सकेंगे।

(२) यदि किसी ऐसे विधेयक को पुर:स्थापित करने की सूचना दी जाय जो अध्यक्ष की राय में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश के बिना पुर:स्थापित नहीं किया जा सकता, तो अध्यक्ष सूचना की प्राप्ति के उपरान्त यथाशीध्र उस विधेयक को, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल को निर्दिष्ट करेंगे।

(३) इस नियम के अन्तर्गत विधेयक को पुर:स्थापित करने की अनुज्ञा के लिये प्रस्ताव की सूचना की कालावधि पन्द्रह दिन होगी, यदि अध्यक्ष इससे कम समय की सूचना पर प्रस्ताव किये जाने की अनुज्ञा न दे दें।

११६- सदन में लम्बित किसी अन्य विधेयक पर निर्भर विधेयक का पुरःस्थापन-
कोई विधेयक जो सदन में किसी अन्य लम्बित विधेयक पर पूर्णतः या अंशतः निर्भर है उस विधेयक के पारित हो जाने की प्रत्याशा में, जिस पर कि वह निर्भर है, सदन में पुर:स्थापित किया जा सकेगा:
परन्तु ऐसा विधेयक सदन में विचार किये जाने तथा पारित किये जाने के लिए तभी लिया जायेगा जबकि लम्बित विधेयक दोनो सदनों द्वारा पारित किया जा चुका हो, और यथास्थिति, राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल द्वारा उस पर अनुमति दी जा चुकी हो।

११७- तत्सम विधेयक की सूचना- जब कोई विधेयक सदन में लम्बित हो तो किसी तत्सम विधेयक की सूचना को चाहे वह लम्बित विधेयक के पुरःस्थापन से पहले प्राप्त हुई हो या बाद में, जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें, यथास्थिति लम्बित सूचनाओं की सूची से निकाल दिया जायेगा या उसमें प्रविष्ट नहीं किया जायगा।

११८- विधेयकों का वित्तीय ज्ञापन और विधेयकों में धन खण्ड- (१) जिस विधेयक में व्यय अन्तर्ग्रस्त हो, उसके साथ एक वित्तीय ज्ञापन होगा जिसमें व्यय अन्तर्ग्रस्त होने वाले खण्डों की ओर विशेषतया ध्यान दिलाया जायगा और उसमें उस आवर्तक तथा अनावर्तक व्यय का भी प्राक्कलन दिया जायेगा जो विधेयक के विधि रूप में पारित होने की अवस्था में अन्तर्ग्रस्त हो।

(२) विधेयकों के जिन खण्डों या उपबन्धों में लोकनिधियों में से व्यय अन्तर्ग्रस्त हो वे अपेक्षाकृत मोटे अक्षरों या वक्राक्षरों में छापे जायेंगे:
परन्तु जहां किसी विधेयक में कोई खण्ड जिसमें व्यय अन्तर्ग्रस्त हो, मोटे टाइप या वक्राक्षरों में न छापा जाय तो अध्यक्ष, विधेयक के भार-साधक सदस्य को ऐसे खण्डों को सभा की जानकारी में लाने की अनुज्ञा दे सकेंगे।

११९- विधायिनी शक्ति प्रत्यायोजित करने वाले विधेयकों का व्याख्यात्मक ज्ञापन- जिस विधेयक में विधायिनी शक्ति के प्रत्यायोजन के साथ प्रस्थापनायें अन्तर्ग्रस्त हों उसके साथ एक ज्ञापन होगा जिसमें ऐसी प्रस्थापनाओं की व्याप्ति की व्याख्या होगी।

१२०- अध्यादेशों के सम्बन्ध में विवरण- (१) जब कभी कोई अध्यादेश प्रख्यापित किया जाय तो उसके प्रख्यापन के बाद, यथास्थिति, अनुगामी सत्र अथवा उपवेशन के प्रारम्भ में अध्यादेश की प्रतिलिपि सहित ऐसा विवरण पटल पर रखा जायेगा जिसमें उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया गया हो जिनके कारण अध्यादेश द्वारा तुरन्त विधान बनाना आवश्यक हो गया था ।

(२) तदुपरान्त कोई भी सदस्य तीन दिन की सूचना देकर अध्यादेश का अननुमोदन करने का संकल्प प्रस्तुत कर सकेगा और यदि ऐसा संकल्प स्वीकृत हो जाय तो वह परिषद् के पास उसकी सहमति के लिए भेज दिया जायगा।

(३) जब कभी कोई विधेयक जो किसी अध्यादेश को रूपभेद सहित प्रतिस्थापित करता हों, सदन में पुरःस्थापित किया जाय तो सदन के समक्ष विधेयक के साथ एक विवरण भी रखा जायगा जिसमें उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया गया हो जिनके कारण ऐसा रूपभेद करना आवश्यक हो गया था।

१२१- असरकारी सदस्यों के विधेयकों में अग्रेता- (१) विधेयकों की सूचनाओं की, जो असरकारी सदस्यों ने प्रस्तुत की हो, सापेक्ष अग्रेता का निर्णय शलाका द्वारा होगा, जो अध्यक्ष द्वारा दिये गये उन निदेशों के अनुसार उस दिवस को होगा जो अध्यक्ष नियत करें और जो ऐसे दिवस से कम से कम पन्द्रह दिन पूर्व होगा जिसके लिये शलाका की जाय ।

(२) असरकारी सदस्यों के विधेयकों की सापेक्ष अग्रेता, जो सदन में लम्बित हों, निम्न क्रम में निर्धारित की जायेगी:-

(क) वे विधेयक जो राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद २०० और २०१ के अन्तर्गत और संदेश सहित वापस किये गये हों;

(ख) वे विधेयक जिनके सम्बन्ध में उनके पारित किये जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा चुका हो;

(ग) वे विधेयक जो सभा द्वारा पारित तथा परिषद् द्वारा संशोधन सहित लौटाये गये हों ;

(घ) वे विधेयक जो परिषद् द्वारा पारित तथा सभा को पंहुचाये गये हों;

(ङ) वे विधेयक जिनके सम्बन्ध में वह प्रस्ताव स्वीकृत हो चुका है कि विधेयक पर विचार किया जाय;

(च) वे विधेयक जिनके सम्बन्ध में प्रवर समिति का प्रतिवेदन उपस्थित किया जा चुका हों;

(छ) वे विधेयक जो राय जानने के लिये परिचालित किये गये हों;

(ज) वे विधेयक जिनका पुर:स्थापन हो चुका हो और जिनके सम्बन्ध में कोई और प्रस्ताव उपस्थित या स्वीकृत न किया गया हो;

(झ) अन्य विधेयक।

(३) उप नियम (२) के किसी एक खण्ड के अन्तर्गत आने वाले विधेयकों की सापेक्ष अग्रेता शलाका द्वारा ऐसे समय पर और ऐसे ढंग से, जैसा कि अध्यक्ष निर्देश दें, निर्धारित की जायेगी ।

(४) अध्यक्ष विशेष आदेश द्वारा जो सभा में विघोषित किया जायेगा उप नियम (२) में दिये गये विधेयकों की सापेक्ष अग्रेता में ऐसे परिवर्तन कर सकेंगे जो वे आवश्यक या सुविधाजनक समझें। अनु0 200 और 201

१२२- मंत्री को असरकारी सदस्य के विधेयक की प्रतिलिपि भेजना- जब कभी सभा का कोई असरकारी सदस्य किसी विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा मांगने के लिये प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अभिप्राय की सूचना दे और यदि उसे शलाका में स्थान प्राप्त हो जाय तो प्रमुख सचिव यथाशीध्र उसकी एक प्रतिलिपि उद्देश्यों और कारणों के विवरण सहित सम्बन्धित मंत्री को भेज देंगे ।

१२३- पुरःस्थापन की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव- (१) नियम ११४ के अधीन रहते हुए किसी भी विधेयक की पुरःस्थापना के पूर्व सदन में तदर्थ प्रस्ताव द्वारा अनुज्ञा प्राप्त की जायेगी, परन्तु अध्यक्ष के अधीन रहते हुए उस समय तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं किया जायेगा जब तक कि विधेयक की प्रतिलिपियां प्रस्ताव करने के दिन से पूर्व दिनांक को सदस्यों को उपलब्ध न करा दी गयी हों।

(२) यदि ऐसे प्रस्ताव का विरोध किया जाय तो अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें, प्रस्ताव करने वाले सदस्य और प्रस्ताव का विरोध करने वाले सदस्य द्वारा संक्षिप्त व्याख्यात्मक वक्तव्य दिये जाने की अनुज्ञा देने के पश्चात् और बिना वाद-विवाद के प्रश्न रख सकेंगे:
परन्तु जब प्रस्ताव का इस आधार पर विरोध किया जाय कि वह विधेयक ऐसे विधान का सूत्रपात करता है जो सभा की विधायिनी क्षमता से परे है, तो अध्यक्ष उस पर पूर्णरूपेण चर्चा की अनुज्ञा दे सकेंगे।

१२४- विधेयक का पुरःस्थापन- नियम ११४ अथवा नियम १२३, जैसी भी स्थिति हो, वर्णित प्रक्रिया के उपरान्त विधेयक "भार साधक सदस्य" द्वारा पुरःस्थापित किया जायगा।

१२५- विधेयक से सम्बद्ध पत्र मांगने की शक्ति- विधेयक के पुरःस्थापन के उपरान्त कोई भी सदस्य यह मांग कर सकेंगे कि ऐसे पत्रों की प्रतिलिपियां, यदि कोई हों, जिन पर विधेयक आधारित हों और गोपनीय न हो सदन के पटल पर रख दी जायं।

१२६- विधेयकों का प्रकाशन- विधेयक के पुरःस्थापन किये जाने के पश्चात् विधेयक, यदि वह पहले ही प्रकाशित नहीं किया जा चुका हो, यथाशीध्र गजट में प्रकाशित किया जायेगा।

१२७- राज्यपाल तथा राष्ट्रपति को विधेयक की प्रतिलिपि भेजना- सभा में पुरःस्थापन के पश्चात् प्रत्येक पुरःस्थापित विधेयक की प्रतिलिपि प्रमुख सचिव द्वारा तुरन्त ही राज्यपाल तथा राष्ट्रपति को सूचनार्थ भेज दी जायेगी।

(ख) पुरःस्थापन के उपरान्त प्रस्ताव

१२८- पुरःस्थापन के उपरान्त प्रस्ताव- किसी विधेयक के पुरःस्थापन के उपरान्त या किसी अनुवर्ती अवसर पर विधेयक भार-साधक सदस्य निम्नलिखित प्रस्तावों में कोई एक प्रस्ताव कर सकेंगे, अर्थात्-

(क) उसे सभा द्वारा तत्काल ही या भविष्य में किसी ऐसे दिन, जिसे उसी समय निर्धारित किया जायेगा, विचारार्थ ले लिया जाय; या

(ख) उसे ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं, सदन की प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय; या

(ग) उसे ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं, संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय; या

(घ) उस पर राय जानने के प्रयोजन से परिचालित किया जायः
परन्तु उप नियम (ग) के अन्तर्गत निर्देश का प्रस्ताव ऐसे विधेयक के सम्बन्ध में नहीं किया जायेगा जिसमें अनुच्छेद १९९ के खण्ड (१) के उपखण्ड (क) से (च) में उल्लिखित विषयों में से किसी के लिए उपबन्ध हो; किन्तु उस समय तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं किया जायेगा जब तक कि विधेयक की प्रतिलिपियां प्रस्ताव करने के दिन से तीन दिन पूर्व सदस्यों को उपलब्ध न करा दी गयी हों, और सदस्यों द्वारा की गयी आपत्ति अभिभावी होगी जब तक कि अध्यक्ष प्रस्ताव करने की अनुज्ञा न दे दें। अनु0 199

१२९- विधेयकों के सिद्धान्तों पर चर्चा- (१) उस दिन जब नियम १२८ में निर्दिष्ट कोई प्रस्ताव किया जाय या किसी अनुवर्ती दिन जिसके लिये चर्चा, स्थगित की जाय, विधेयक के सिद्धान्तों और उसके उपबन्धों पर सामान्य चर्चा की जा सकेगी, किन्तु विधेयक के ब्यौरे पर उससे अधिक चर्चा नहीं होगी जितनी कि उसके सिद्धान्तों की व्याख्या के लिये आवश्यक हो ।

(२) इस प्रक्रम पर विधेयक में संशोधन प्रस्तुत नहीं किये जा सकेंगे किन्तु यदि विधेयक भार-साधक सदस्य यह प्रस्ताव करें कि विधेयक-

(क) विचारार्थ लिया जाय, तो कोई सदस्य संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय या उस पर राय जानने के लिये उस तिथि तक जो उस प्रस्ताव में दी गयी हो, परिचालित किया जाय, अथवा

(ख) एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय तो कोई सदस्य संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक को ऐसे अनुदेशों के सहित जो कि आवश्यक समझे जायं, यथास्थिति एक संयुक्त प्रवर समिति या प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय या विधेयक को राय प्राप्त करने के लिये उस तिथि तक जो उस प्रस्ताव में दी गयी हो, परिचालित किया जाय।

(३) (क) जब पूर्वगामी नियमों के अन्तर्गत किसी विधेयक को राय जानने के लिये परिचालित किये जाने पर रायें प्राप्त हो गयी हों तो राय प्राप्त होने की अन्तिम तिथि के उपरान्त यथासम्भव शीध्र प्रमुख सचिव द्वारा एक ऐसा विवरण पटल पर रखा जायेगा जिसमें रायों का सारांश दिया हो।

(ख) तदुपरान्त विधेयक भार-साधक सदस्य यदि वे अपने विधेयक पर इसके आगे कार्यवाही करना चाहते हों, प्रस्ताव करेंगे कि विधेयक एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय, यदि अध्यक्ष यह प्रस्ताव करने की अनुज्ञा न दे दें कि विधेयक पर तत्काल या किसी भावी तिथि को विचार किया जाय:
परन्तु इस नियम के अन्तर्गत संयुक्त प्रवर समिति की नियुक्ति के लिये कोई संशोधन या प्रस्ताव किसी ऐसे विधेयक के सम्बन्ध में नहीं किया जायेगा जिसमें अनुच्छेद १९९ के खण्ड (१) के उपखण्ड (क) से (च) में उल्लिखित विषयों में से किसी के लिए उपबन्ध हो। अनु0 199

१३०- प्रवर समिति को गठित करने का प्रस्ताव- जब सभा किसी विधेयक को प्रवर समिति को निर्दिष्ट करना निश्चित करे तो प्रवर समिति नियमानुसार गठित करने का प्रस्ताव किया जायेगा ।

१३१-व्यक्ति जो विधेयकों के सम्बन्ध में प्रस्ताव कर सकेंगे- विधेयक के भार-साधक सदस्य के अतिरिक्त किसी अन्य सदस्य द्वारा यह प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा कि विधेयक पर विचार किया जाय या विधेयक को पारित किया जाय और विधेयक के भार-साधक सदस्य के अतिरिक्त किसी अन्य सदस्य द्वारा विधेयक के भार-साधक सदस्य द्वारा किये गये प्रस्ताव पर संशोधन के रूप के अतिरिक्त यह प्रस्ताव नहीं किया जायेगा कि विधेयक को प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जाय या उस पर राय जानने के लिए उसे परिचालित किया जाय या पुनः परिचालित किया जाय:
परन्तु यदि विधेयक के भार-साधक सदस्य अपने विधेयक के सम्बन्ध में पुरःस्थापन के उपरान्त किसी अनुवर्ती प्रक्रम पर अगला प्रस्ताव प्रस्तुत करने में ऐसे कारणों से असमर्थ हों, जिन्हें अध्यक्ष पर्याप्त समझें तो वे किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष के अनुमोदन से उस विशेष प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिये प्राधिकृत कर सकेंगे ।
व्याख्या-परन्तुक में दिये गये उपबन्धों के रहते हुए भी विधेयक भार-साधक सदस्य वही रहेंगे, जिन्होंने विधेयक पुरःस्थापित किया है।

(ग) प्रवर समिति के प्रतिवेदन के उपस्थान के उपरान्त प्रक्रिया

१३२- प्रवर/संयुक्त प्रवर समिति के प्रतिवेदन के उपस्थान के उपरान्त प्रस्तुत किये जाने वाले प्रस्ताव- (१) यथास्थिति किसी विधेयक पर सदन की प्रवर समिति अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति के अन्तिम प्रतिवेदन के उपस्थान के उपरान्त भार-साधक सदस्य प्रस्ताव कर सकेंगे कि-

(क) यथास्थिति सदन की प्रवर समिति द्वारा अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय : परन्तु यदि प्रतिवेदन की प्रतिलिपि सदस्यों के उपयोग के लिए प्रस्ताव किये जाने के दिन से तीन दिन पहले उपलब्ध न कर दी गई हो तो कोई सदस्य इस तरह विचार किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे, यदि अध्यक्ष प्रतिवेदन पर विचार किये जाने की अनुमति न दें, तो ऐसी आपत्ति अभिभावी होगी, या

(ख) यथास्थिति सदन की प्रवर समिति द्वारा अथवा सदन की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक उसी प्रवर समिति या एक नई प्रवर समिति या उसी संयुक्त प्रवर समिति या एक नई संयुक्त प्रवर समिति को, या तो:

१- परिसीमा के बिना; अथवा

२- केवल विशेष खण्डों या संशोधनों के संबंध में हो; अथवा

३- समिति को विधेयक में कोई विशेष या कोई अतिरिक्त उपबन्ध करने के अनुदेशों के साथ; या

(ग) यथास्थिति सदन की प्रवर समिति अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक यथास्थिति उस पर राय या अतिरिक्त राय जानने के प्रयोजन के लिये परिचालित या पुनः परिचालित किया जाय।

(२) यदि विधेयक भार-साधक सदस्य यह प्रस्ताव करें कि यथास्थिति सदन की प्रवर समिति द्वारा अथवा सदनों की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय तो कोई सदस्य संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक समिति को पुनः सौंपा जाय या उस पर राय या अतिरिक्त राय जानने के प्रयोजन के लिए परिचालित या पुनः परिचालित किया जाय।

१३३- वाद-विवाद की व्याप्ति- इस प्रस्ताव पर कि प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय,वाद-विवाद प्रवर समिति के प्रतिवेदन के विचार तक और उस प्रतिवेदन में निर्दिष्ट विषयों तक या विधेयक के सिद्धान्त से सुसंगत किन्ही वैकल्पिक सुझावों तक सीमित रहेगा।

(घ) संयुक्त प्रवर समिति

१३४- संयुक्त प्रवर समिति के लिये प्रस्ताव- (१) यदि कोई प्रस्ताव किसी विधेयक को दोनो सदनों की एक संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट करने के लिए स्वीकृत हो जाय, तो प्रमुख सचिव इस निवेदन के साथ परिषद् को संदेश भेजेंगे कि परिषद् उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रकट करे, और यदि उसकी सहमति हो तो संयुक्त प्रवर समिति में कार्य करने के लिये अपेक्षित संख्या में अपने सदस्यों की नियुक्ति कर दें।

(२) यदि इस तात्पर्य का सन्देश सभा में प्राप्त हो कि परिषद् सहमत नही है तो संयुक्त प्रवर समिति को कोई निर्देशन नही होगा।

१३५- संयुक्त प्रवर समिति के निर्देशन के लिये परिषद् द्वारा प्रस्ताव- (१) यदि परिषद् में कोई प्रस्ताव किसी विधेयक की दोनों सदनों की संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट करने के लिये स्वीकृत हो और उसका संदेश प्रमुख सचिव को प्राप्त हो तो प्रमुख सचिव ऐसे संदेश की सूचना सदन को देंगे।

(२) परिषद् से ऐसे संदेश के प्राप्त होने के पश्चात् किसी भी समय सरकारी विधेयक की दशा में कोई मंत्री और असरकारी सदस्य के विधेयक की दशा में कोई सदस्य प्रस्ताव कर सकेंगे कि परिषद् द्वारा स्वीकार प्रस्ताव स्वीकार किया जाय।

(३) यदि सभा सहमत हो तो संयुक्त प्रवर समिति के लिये सभा के प्रतिनिधियों की अपेक्षित संख्या का निर्वाचन नियम २६१ के उपबन्धों के अनुसार करने के लिये प्रस्ताव किया जायगा। तदन्तर परिषद् को एक संदेश भेज दिया जायगा जिसमें परिषद् द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव पर सभा की सहमति तथा संयुक्त प्रवर समिति के लिए सभा द्वारा निर्वाचित सदस्यों के नामों की सूचना दी जायेगी।

(४) यदि सभा परिषद् द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव से सहमत न हो तो परिषद् के पास असहमति की सूचना भेज दी जायेगी।

(ङ) खण्डों आदि में संशोधन तथा विधेयकों पर विचार

१३६- विधेयकों का खंडशः प्रस्तुत किया जाना- (१) जब यह प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय कि विधेयक विचारार्थ लिया जाय तो विधेयक के प्रत्येक खण्ड के सम्बन्ध में यह प्रस्ताव किया हुआ समझा जायगा कि वह खण्ड विधेयक का अंश माना जाय। इन नियमों में किसी बात के होते हुए भी अध्यक्ष के स्वविवेक में होगा कि विधेयक या विधेयक के किसी भाग को खण्ड प्रतिखण्ड सभा के समक्ष रखें। अध्यक्ष प्रत्येक खण्ड को पृथक-पृथक लेंगे और जब उसमें सम्बद्व संशोधन का निस्तारण अनुवर्ती नियमों के उपबन्धों के अनुसार हो जाय तब यह प्रश्न उपस्थित करेंगे कि यह खण्ड या यथास्थिति यह संशोधित खण्ड विधेयक का अंश माना जाय।

(२) अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें ऐसे खण्डों के समूह को एक प्रश्न के रूप में रख सकेंगे जिन पर कोई संशोधन प्रस्तुत नही किये गये हों:
परन्तु यदि कोई सदस्य प्रार्थना करे कि कोई खण्ड अलग से रखा जाय तो अध्यक्ष उस खण्ड को अलग से रखेंगे ।

१३७- किसी खण्ड का स्थगन- अध्यक्ष, यदि ठीक समझें तो किसी खण्ड पर विचार स्थगित कर सकेंगे।

१३८- अनुसूची पर विचार- अनुसूची या अनुसूचियों पर यदि कोई हों, खण्डों पर विचार होने के बाद विचार किया जायगा। अनुसूचियां अध्यक्ष पीठ से रखी जायेंगी और वे उस रीति से संशोधित की जा सकेंगी जैसे कि खण्ड और नयी अनुसूचियों पर विचार मूल अनुसूचियों के विचार के बाद किया जायेगा। तब यह प्रश्न रखा जायगा "कि यह अनुसूची या यथास्थिति, यह संशोधित अनुसूची, विधेयक का अंश मानी जाय":
परन्तु अध्यक्ष अनुसूची या अनुसूचियों पर, यदि कोई हों, खण्डों के निस्तीर्ण किये जाने के पहले या किसी खण्ड के साथ या अन्यथा जैसे कि वे ठीक समझें विचार किये जाने की अनुज्ञा दे सकेंगे।

१३९- संशोधन की सूचना- (१) यदि विधेयक के किसी खण्ड या अनुसूची में किसी संशोधन की सूचना उस दिन से छत्तीस घण्टे पूर्व न दी गई हो जिस दिन कि विधेयक पर विचार किया जाना हो, तो कोई भी सदस्य संशोधन के प्रस्तुत किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे, और यदि अध्यक्ष संशोधन के प्रस्तुत किये जाने की अनुमति न दे दें तो ऐसी आपत्ति अभिभावी होगी:
परन्तु किसी सरकारी विधेयक की अवस्था में ऐसा संशोधन, जिसकी सूचना विधेयक भार-साधक सदस्य से मिली हो, इस कारण व्यपगत नहीं होगा कि विधेयक भार-साधक सदस्य, मंत्री या सदस्य नहीं रहे हैं और ऐसा संशोधन विधेयक के नये विधेयक भार-साधक सदस्य के नाम में छापा जायगा:
किन्तु ऐसे संशोधनों के लिये जो पूणर्तया शाब्दिक हों, या ऐसे संशोधनों पर, जो आनुषंगिक हों या उनके संबंध में हों जो स्वीकृत किये जा चुके हों, पूर्व सूचना की आश्यकता नहीं होगी।

(२) यदि समय हो तो प्रमुख सचिव सदस्यों को, समय-समय पर, उन संशोधनों की सूचियां उपलब्ध करेंगे, जिनकी सूचनाएं प्राप्त हो चुकी हों।

१४०- संशोधनों की ग्राह्यता की शर्तें- किसी विधेयक के खण्डों या अनुसूचियों में संशोधनों की ग्राह्यता निम्नलिखित शर्तों के अधीन होंगी:-

(१) संशोधन विधेयक की व्याप्ति के भीतर होगा और जिस खण्ड से उसका संबंध हो उसके विषय से सुसंगत होगा।

(२) संशोधन सभा के उसी प्रश्न पर किसी पूर्व विनिश्चय से असंगत नहीं होगा।

(३) संशोधन ऐसा नहीं होगा कि जिससे वह खण्ड जिसे संशोधित करने की उसमें प्रस्थापना हो, दुर्बोध या व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हो जाय।

(४) यदि संशोधन में बाद के किसी संशोधन या अनुसूची की ओर निर्देश किया जाय या उसके बिना वह बोधगम्य न हो तो प्रथम संशोधन का प्रस्ताव करने से पहले बाद के संशोधन या अनुसूची की सूचना दी जायेगी, जिससे कि संशोधन माला पूर्णरूप में बोधगम्य हो जाय।

(५) अध्यक्ष वह क्रम निर्धारित करेंगे जिसमें संशोधन प्रस्तुत किये जायेंगे।

(६) अध्यक्ष ऐसे संशोधन की अनुज्ञा देने से इंकार कर सकेंगे जो उनकी राय में तुच्छ या अर्थहीन हों।

(७) जिस संशोधन की अध्यक्ष पहले अनुज्ञा दे चुके हों उसमें संशोधन प्रस्तुत किया जा सकेगा।

१४१- संशोधन की सूचना के साथ राष्ट्रपति की मंजूरी या राज्यपाल की सिफारिश का संलग्न किया जाना- (१) यदि शासन कोई ऐसा संशोधन प्रस्तावित करना चाहे जो संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता हो तो वह आवश्यक सूचना के साथ ऐसी मंजूरी या सिफारिश की एक प्रति संलग्न करेगा और सूचना तब तक वैध नहीं होगी जब तक कि वह आवश्यकता पूरी न हो जाय।

(२) यदि कोई असरकारी सदस्य किसी ऐसे, संशोधन की सूचना दे जो अध्यक्ष की राय में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश के बिना प्रस्तावित नहीं किया जा सकता हो, तो अध्यक्ष सूचना की प्राप्ति के उपरान्त यथासंभव शीध्र उस संशोधन को राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल को यथास्थिति, निर्दिष्ट कर देंगे। अनु0 207 व 304

१४२- संशोधनों का क्रम- (१) संशोधनों पर विधेयक के खण्डों के क्रम के अनुसार जिनसे क्रमशः उनका संबंध हो, साधारणतया विचार किया जायगा परन्तु अध्यक्ष को अभिसूचित संशोधनों के प्रवरण की शक्ति होगी।

(२) अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें किसी खण्ड के एक से संशोधनों को एक प्रश्न के रूप में रख सकेंगे :
परन्तु यदि कोई सदस्य प्रार्थना करे कि कोई संशोधन अलग से रखा जाय तो अध्यक्ष उस संशोधन का अलग से रखेंगे:
किन्तु समय और पुनरावृति बचाने के अभिप्राय से परस्पर निर्भर संशोधनों के समूह पर केवल एक चर्चा की अनुमति दी जा सकेगी ।

१४३- संशोधनों की वापसी- प्रस्तुत किया गया कोई संशोधन प्रस्तुत करने वाले सदस्य की प्रार्थना पर सदन की अनुमति से वापस लिया जा सकेगा किन्तु अन्यथा नहीं। यदि किसी संशोधन में संशोधन प्रस्थापित किया गया हो तो मूल संशोधन तब तक वापस नही लिया जायेगा जब तक उसमें प्रस्थापित संशोधन निस्तीर्ण न कर दिया जाय।

१४४- विधेयक का प्रथम खण्ड, प्रस्तावना और शीषर्क- विधेयक का प्रथम खण्ड, प्रस्तावना यदि कोई हो और शीर्षक तब तक स्थगित रहेंगे जब तक कि अन्य खण्डों और अनुसूचियों (नये खण्डों और नयी अनुसूचियों सहित) का निस्तारण न हो जाय और तदुपरान्त अध्यक्ष यह प्रश्न उपस्थित करेंगे "कि प्रथम खण्ड या प्रस्तावना या शीषर्क (अथवा यथास्थिति संशोधित प्रथम खण्ड, प्रस्तावना या शीर्षक) को विधेयक का अंश माना जाय"।

(च) विधेयकों का पारण तथा प्रमाणीकरण

१४५- विधेयकों का पारण- (१) जब यह प्रस्ताव कि विधेयक पर विचार किया जाय स्वीकार हो गया हो और विधेयक में कोई संशोधन न हुआ हो तब विधेयक के भार-साधक सदस्य तुरन्त ही यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक पारित किया जाय ।

(२) यदि विधेयक में कोई संशोधन किया जाय तो कोई भी सदस्य ऐसे किसी प्रस्ताव के उसी दिन किये जाने पर आपत्ति कर सकेंगे कि विधेयक को पारित किया जाय और यदि अध्यक्ष इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा न दे दें तो ऐसी आपत्ति अभिभावी होगी।

(३) ऐसे प्रस्ताव पर कोई संशोधन प्रस्तुत नहीं किया जायेगा।

१४६- वाद-विवाद की व्याप्ति- इस प्रस्ताव पर कि विधेयक पारित किया जाय चर्चा विधेयक के समर्थन या उसकी अस्वीकृति के प्रतर्कों तक सीमित होगी।

१४७- विधेयकों में औपचारिक संशोधन- जब कोई विधेयक सभा द्वारा पारित हो जाय तब प्रमुख सचिव खण्डों को पुनरांकित करेंगे उनकी उपांतिक टिप्पणियों को पुनरीक्षित एवं पूर्ण करेंगे, उनमें केवल ऐसे औपचारिक, शाब्दिक अथवा आनुषांगिक संशोधन करेंगे, जो आवश्यक हों और ऐसी त्रुटियों का शोधन करेंगे जो उनको असावधानता के कारण रह गई प्रतीत हों।

१४८- विधेयकों का परिषद् को पहुंचाया जाना- (१) प्रमुख सचिव विधेयक की चार प्रतियां अध्यक्ष को प्रस्तुत करेंगे और अध्यक्ष और उनकी अनुपस्थिति में अविलम्वनीय अवस्था में प्रमुख सचिव, अध्यक्ष के कृते, उन्हें निम्न रूप में प्रमाणित करेंगे:-
"इस विधेयक को उत्तर प्रदेश विधान सभा ने...........................20.............................को पारित किया।
दिनांक...................................................
अध्यक्ष।’’
परन्तु यदि अनुच्छेद 199 के अर्थ में वह एक धन विधेयक हो तो विधेयक के अन्त में अध्यक्ष का प्रमाण-पत्र निम्न प्रकार से अंकित होगा:-
’’मैं एतद्द्वारा प्रमाणित करता हूं कि यह विधेयक भारत के संविधान के अनुच्छेद 199 के अर्थ के अन्तर्गत एक धन विधेयक है।
दिनांक .................................... अध्यक्ष।’’

(2) उक्त प्रतियों में से तीन प्रतियां परिषद् को उसके विचारार्थ भेजी जायेंगी। अनु0 197, 198, 199 (4)

(छ) धन विधेयकों के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के परिषद् से प्रत्यावर्तित होने पर प्रक्रिया

१४९- संशोधन के बिना पारित विधेयकों के बारे में परिषद् से संदेश- यदि धन विधेयक के अतिरिक्त सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया कोई विधेयक परिषद् द्वारा बिना किसी संशोधन के पारित कर दिया जाये तो परिषद् से प्राप्त तत्संबंधी संदेश प्रमुख सचिव द्वारा सदन को, यदि उसका उपवेशन हो रहा हो तो तुरन्त, अन्यथा आगामी उपवेशन में प्रतिवेदित किया जायेगा ।

१५०- परिषद् से विधेयक का प्रत्यावर्तन- (१) जब धन विधेयक के अतिरिक्त कोई विधेयक जो सभा में आरंम्भ हुआ हो परिषद् द्वारा अस्वीकृत हो जाय या उस तिथि से जब विधेयक परिषद् के समक्ष रखा गया था परिषद् द्वारा बिना उसके पारित हुए तीन माह से अधिक व्यतीत हो जाय, तो प्रमुख सचिव उपर्युक्त तथ्यों की सूचना सदन को देंगे और तब सभा पूर्वगामी नियमों में विधेयक के तृतीय पठन के लिये विहित प्रक्रिया के अनुसार विधेयक को पुनः पारित करने के लिये कार्यवाही करेगी।

(२) यदि विधेयक परिषद् द्वारा संशोधन सहित पारित किया जाय तो संशोधनों सहित विधेयक यथाशीध्र पटल पर रखा जायेगा और संशोधनों सहित विधेयक की प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त सरकारी विधेयक की अवस्था में कोई मंत्री अथवा किसी और अवस्था में कोई सदस्य दो दिन की सूचना के पश्चात् या अध्यक्ष की सम्मति से बिना सूचना पर भी प्रस्ताव कर सकेंगे कि परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों पर विचार किया जाये । अनु0 197

१५१- संशोधनों पर विचार करने की प्रक्रिया- (१) यदि यह प्रस्ताव कि परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों पर विचार किया जाये, स्वीकृत हो जाय, तो अध्यक्ष संशोधनों को इस प्रकार सदन के समक्ष विचारार्थ रखेंगे जिसे वे सुविधाजनक समझें।

(२) इस प्रक्रम पर केवल ऐसे संशोधन प्रस्तुत किये जा सकेंगे जो परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों के विषय से सुसंगत हों अथवा उनके आनुषंगिक या वैकल्पिक हों।

(३) यदि सदन परिषद् द्वारा किये गये संशोधनों से सहमत हो तो वह परिषद् को तत्संबंधी संदेश भेजेगा किन्तु यदि वह असहमत हो या विधेयक में कोई अग्रेतर संशोधन स्वीकार करें तो सदन, यथास्थिति, विधेयक को या अग्रेतर संशोधित विधेयक को पुनः पारित करके तत्संबंधी संदेश सहित परिषद् को लौटायेगा। अनु0 197

१५२- संशोधनों के विचार की प्रक्रिया- (१) यदि विधेयक परिषद् द्वारा सभा को पुनः इस संदेश के साथ लौटाया जाय कि परिषद् उस संशोधन या उन संशोधनों पर आगृह, करती है जिनसे सदन पहले असहमत हो चुका है तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जायेगा जिसमें कि वह सभा द्वारा दूसरी बार पारित हुआ था।

(२) यदि नियम १५० (१) के अधीन प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय कि विधेयक, जैसा मूलतः पारित हुआ है, पारित किया जाय, तो विधेयक पुनः परिषद् को पहुंचाया जायगा और यदि-

(क) परिषद् द्वारा विधेयक अस्वीकार कर दिया जाता है, अथवा

(ख) परिषद् के समक्ष विधेयक रखे जाने की तिथि से, उससे विधेयक पारित हुए बिना एक मास से अधिक समय व्यतीत हो जाता है, अथवा

(ग) परिषद् द्वारा विधेयक संशोधनों सहित पारित होता है, तो उप नियम (क) और (ख) की दशा में विधेयक सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जायेगा जिसमें कि वह सभा द्वारा दूसरी बार पारित किया गया था। उप नियम (२)

(ग) की दशा में सभा की सहमति या असहमति नियम १५१ में विहित प्रक्रिया के अनुसार प्राप्त की जायेगी।

अनु0 197

 

(ज) धन विधेयक

१५३- धन विधेयकों पर परिषद् की सिफारिश- यदि सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया कोई धन विधेयक सभा को बिना सिफारिश के लौटा दिया जाय या परिषद् में उसकी प्राप्ति के दिनांक से १४ दिन की अवधि समाप्त हो जाय तो तत्संबंधी सूचना प्रमुख सचिव द्वारा सदन को उपवेशन होने की दशा में तुरन्त, अन्यथा सदस्यों को पत्र द्वारा दी जायेगी। अनु0 198

१५४- परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों पर विचार- (१) यदि सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया कोई धन विधेयक परिषद् द्वारा सिफारिश किये गये संशोधनों सहित सदन को लौटाया जाय तो वह प्राप्त होने पर पटल पर रखा जायेगा।

(२) यदि विधेयक परिषद् द्वारा सिफारिशों सहित लौटाया जाय तो सिफारिशों सहित विधेयक यथाशीघ्र पटल पर रखा जायेगा और सिफारिश सहित विधेयक की प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त सरकारी विधेयक की अवस्था में कोई मंत्री अथवा किसी अन्य अवस्था में कोई सदस्य दो दिन की सूचना के पश्चात् या अध्यक्ष की सम्मति से बिना सूचना पर भी प्रस्ताव कर सकेंगे कि परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों पर विचार किया जाय। अनु0 198

१५५- परिषद् द्वारा सिफारिश किये गये संशोधन पर विचार करने की प्रक्रिया- (१) यदि यह प्रस्ताव कि परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों पर विचार किया जाय, स्वीकृत हो जाय, तो अध्यक्ष परिषद् द्वारा की गयी ऐसी सिफारिशों को सदन के सामने ऐसी रीति से रखेंगे, जिसे वे ठीक समझें।

(२) यदि सदन परिषद् द्वारा की गयी सिफारिशों को स्वीकार कर ले तो विधेयक परिषद् द्वारा की गयी ऐसी सिफारिशों सहित जो सदन द्वारा स्वीकृत हैं दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया समझा जायेगा।

१५६- सदनों के मध्य असहमति- यदि सदन परिषद् की किसी सिफारिश को स्वीकार न करे,तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जायेगा जिसमें कि वह सभा द्वारा परिषद् की किसी सिफारिश के बिना पारित हुआ था। अनु0 198

१५७- सभा के विनिश्चयों का परिषद् को संचार- परिषद् की सिफारिशों पर सभा के विचार के परिणाम की सूचना देते हुए एक संदेश परिषद् को भेजा जायेगा।

(झ) सामान्य

१५८- विधेयक के वर्ष को अनुमति के वर्ष के अनुरूप करने की अध्यक्ष की शक्ति- पूर्वगामी वर्ष में पुरःस्थापित किन्तु अनुवर्ती वर्ष में पारित विधेयकों की दशा में अथवा ऐसे विधेयकों की दशा में जो उसी वर्ष पारित हों किन्तु जिनके लिये अनुवर्ती वर्ष में अनुमति दिये जाने की संभावना हो, अध्यक्ष विधेयक के वर्ष को परिवर्तित कर देंगे जिससे कि वह पारण के वर्ष के अनुरूप या उस वर्ष के अनुरूप हो जाय जिसमें कि यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा अनुमति मिलने की संभावना हो।

१५९- विधेयक पर अनुमति- जब सभा में पुरःस्थापित विधेयक, संविधान के उपबन्धों के अनुसार दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाय, तब प्रमुख सचिव उसमें शाब्दिक और आनुषंगिक संशोधन, यदि कोई हों, करेंगे तथा उस पर अध्यक्ष के हस्ताक्षर और यदि वह धन विधेयक हो तो अनुच्छेद १९९(४) के अन्तर्गत आवश्यक प्रमाण भी अंकित हो जाने के उपरान्त वह विधेयक तीन प्रतियों में राज्यपाल की अनुमति के लिये प्रस्तुत किया जायेगा। अनु0 199(4) तथा 200

१६०- शाब्दिक संशोधनों का विवरण- नियम-१५९ के अधीन हस्ताक्षरित प्रति के साथ राज्यपाल को एक विवरण भी प्रस्तुत किया जायेगा जिसमें विधेयक में किये गये ऐसे शाब्दिक और आनुषंगिक संशोधन या त्रुटियों का शोधन दर्शाय़ा जायेगा जो नियम १४७ और १५९ के अन्तर्गत किये गये हैं। विधेयक में किये गये इन परिवर्तनों की प्रतिलिपि राज्यपाल की अनुमति की घोषणा से पूर्व प्रमुख सचिव द्वारा पटल पर रखी जायेगी।

(ञ) परिषद् में पुरःस्थापित विधेयकों के सम्बन्ध में प्रक्रिया

१६१- विधेयक जिनको परिषद् ने पारित किया है- जब कोई विधेयक परिषद् में पुर:स्थापित तथा पारित हुआ हो और सभा में प्राप्त हो तो विधेयक प्रमुख सचिव द्वारा यथाशीघ्र पटल पर रखा जायगा।

१६२- विचार करने के लिये प्रस्ताव की सूचना- नियम १६१ के अन्तर्गत विधेयक के पटल पर रखे जाने तथा उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त किसी सरकारी विधेयक की दशा में कोई मंत्री या किसी अन्य दशा में कोई सदस्य इस प्रस्ताव की सूचना दे सकेंगे कि विधेयक विचारार्थ लिया जाय।

१६३- विचार करने के लिये प्रस्ताव- जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निदेश न दें, नियम १६२ में उल्लिखित प्रस्ताव सूचना प्राप्त होने के दिनांक से दो दिन के उपरान्त किसी दिन कार्य-सूची में सम्मिलित एवं सदन में प्रस्तुत किया जा सकेगा।

१६४- चर्चा- उस दिन जब ऐसा प्रस्ताव किया जाय या किसी अनुवर्ती दिन जिसके लिये चर्चा स्थगित की जाय विधेयक के सिद्वान्त और उसके सामान्य उपबन्धों पर चर्चा हो सकेगी, किन्तु विधेयक के सविस्तार विवरणों पर उससे अधिक चर्चा नहीं होगी जितनी कि उसके सिद्वान्तों की व्याख्या के लिये आवश्यक हो।

१६५- प्रवर समिति को निर्देशन- कोई भी सदस्य (यदि विधेयक पहले ही संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट न कर दिया गया हो) संशोधन के रूप में यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक एक प्रवर समिति को निर्दिष्ट कर दिया जाय और यदि ऐसा प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय तो विधेयक तदनुसार निर्दिष्ट कर दिया जायेगा और तब सभा में प्रारम्भ होने वाली विधेयकों की प्रवर समिति से सम्बद्व नियम प्रवृत्त होंगे।

१६६- विधेयकों पर विचार एवं उनका पारण- यदि प्रस्ताव कि विधेयक पर विचार किया जाय, स्वीकृत हो जाय, तो विधेयक विचारार्थ ले लिया जायेगा और तब विधेयकों के संशोधनों पर विचार से सम्बद्ध नियमों के उपबन्धों तथा विधेयकों के पारण से सम्बद्व अनुवर्ती प्रक्रिया लागू होगी।

१६७- संशोधन रहित पारित विधेयक- यदि विधेयक संशोधन के बिना पारित हो जाय तो विधेयक एतदविषयक संदेश के साथ परिषद् को भेजा जायेगा कि सभा विधेयक से बिना किसी संशोधन के सहमत है।

१६८- संशोधनों सहित पारित विधेयक- (१) यदि विधेयक संशोधनों सहित पारित हो जाय तो विधेयक इस संदेश के साथ लौटाया जायेगा कि परिषद् संशोधनों को स्वीकार कर ले:-

(क) यदि परिषद् सभा द्वारा किये गये संशोधनों या उनमें से किसी संशोधन से असहमत हो या सभा द्वारा किये गये संशोधनों मे से किसी संशोधन को अग्रेतर संशोधनों के साथ स्वीकार करे या सभा द्वारा किये गये संशोधनों के स्थान में अन्य संशोधन प्रस्थापित करे, तो यथास्थिति असहमति की सूचना या संशोधन, यदि कोई हो, प्रमुख सचिव द्वारा प्राप्त होने पर विधेयक के साथ पटल पर रखे जायेंगे।

(ख) विधेयक के इस प्रकार पटल पर रखे जाने पर तथा संशोधनों या असहमति की सूचना सहित उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को वितरित किये जाने के उपरान्त सरकारी विधेयक की अवस्था में कोई मंत्री अथवा किसी अन्य अवस्था में कोई सदस्य दो दिन की सूचना के पश्चात् या अध्यक्ष की सम्मति से बिना सूचना के प्रस्ताव कर सकेंगे कि उस पर परिषद् द्वारा सुझाये या स्वीकार किये गये संशोधनों सहित या बिना, विचार किया जाये।

(ग) तदुपरान्त नियम १५१ में संशोधनों पर विचार के लिये विहित प्रक्रिय़ा लागू होगी।

(घ) इस प्रकार के विचार के उपरान्त विधेयक इस संदेश के साथ लौटाया जायेगा कि सभा विधेयक को ऐसे संशोधनों सहित या ऐसे संशोधनो के बिना, यदि कोई हो, जो किये गये हो, या जिनका सुझाव दिया गया हो, या जिनसे परिषद् सहमत हो, पारित करती है, अथवा यह मूलतः प्रस्थापित संशोधनों पर आग्रह करती है। ऐसी अवस्था में परिषद् सभा द्वारा पारित विधेयक पर विचार कर सकेगी, किन्तु यदि परिषद् सभा द्वारा पारित विधेयक से फिर भी असहमत हो तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित हुआ समझा जायगा।

(2) परिषद् को इस तरह लौटाया गया विधेयक अध्यक्ष द्वारा निम्न प्रकार से प्रमाणित किया जायेगा: ’’यह विधेयक........................20...........................को सभा द्वारा संशोधित रूप में पारित किया गया है।
दिनांक................................20.............................
अध्यक्ष।’’

(ट) संविधान के अनुच्छेद २०० और २०१ के अन्तर्गत लौटाये गये विधेयकों पर पुनर्विचार

१६९- राज्यपाल का सन्देश- (१) जब सभा द्वारा पारित कोई विधेयक सभा को राज्यपाल द्वारा एक सन्देश के साथ लौटाया जाय जिसमें यह कहा गया हो कि सभा विधेयक पर अथवा उसके किन्ही उल्लिखित उपबन्धों पर अथवा किन्ही संशोधनों पर जिनकी संदेश में सिफारिश की गई हो, पुनर्विचार करें तो अध्यक्ष राज्यपाल के संदेश को सभा में, यदि वह सत्र में हो, पढ़कर सुनायेंगे अथवा यदि सभा, सत्र में न हो तो यह निर्देश देंगे कि उसकी सूचना सदस्यों को पत्र द्वारा दी जाय।

(२) उसके पश्चात् विधेयक को सभा द्वारा पारित और राज्यपाल द्वारा पुनर्विचार के लिये लौटाये गये रूप में प्रमुख सचिव द्वारा पटल पर रखा जायेगा।

१६९-क-संशोधनों पर विचार के प्रस्ताव की सूचना- विधेयक के इस प्रकार पटल पर रखे जाने के पश्चात् किसी सरकारी विधेयक की दशा में कोई मंत्री या किसी अन्य दशा कोई सदस्य यह प्रस्ताव रखने के अभिप्राय की सूचना दे सकेंगे कि सन्देश में दिये निदेशों के परिप्रेक्ष्य में विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय।

१६९-ख-पुनर्विचार करने का प्रस्ताव पुनर्विचार का प्रस्ताव- कार्य-सूची में जिस दिन रखा गया हो और वह दिन जब तक अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें सूचना प्राप्ति के दो दिन से पहले नहीं होगा, उस दिन सूचना देने वाले सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि सन्देश में दिये गये निदेशों के या संशोधनों के परिप्रेक्ष्य में विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय।

१६९-ग-वाद-विवाद की व्याप्ति- ऐसे प्रस्ताव पर वाद-विवाद राज्यपाल के सन्देश में निर्दिष्ट विषयों तक या राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये गये किसी संशोधन के विषय मे संगत किसी सुझाव तक ही सीमित रहेगा।

१६९-घ-संशोधनों पर विचार- (१) यदि यह प्रस्ताव कि सन्देश में दिये गये निदेशों या संशोधनों के परिप्रेक्ष्य में विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय, पारित हो जाय तो कोई सदस्य अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर विधेयक में संशोधन प्रस्तुत कर सकेगा जिसकी उसने पहले से सूचना दी हो।

(२) जब राज्यपाल द्वारा विशेष संशोधनों की सिफारिश की जाय तो राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये गये संशोधनों के विषय से सुसंगत संशोधन प्रस्तुत किये जा सकते हैं, किन्तु विधेयक में कोई अन्य संशोधन नहीं किये जा सकते जब तक कि वे राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये गये संशोधन के आनुषंगिक,प्रासंगिक या वैकल्पिक संशोधन न हों।

(३) यदि राज्यपाल द्वारा किसी विशेष संशोधन की सिफारिश न की जाय तो किसी ऐसे संशोधन को प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा जो विधेयक के पुनर्विचार की सिफारिश करने वाले सन्देश की व्याप्ति में न हो।

(४) राज्यपाल द्वारा सिफारिश किये संशोधनों, यदि कोई हों, और ऐसे अन्य संशोधनों, जो पुनर्विचार किये जाने के लिये राज्यपाल के संदेश की व्याप्ति में हों, पर अध्यक्ष द्वारा प्रश्न उपस्थित किया जायेगा।

१६९-ङ -विधेयकों का पुनः पारण- जब सभी संशोधन निपटाये जा चुके हों, तो नियम १६९-क के अधीन प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि विधेयक को, यथास्थिति, सभा द्वारा मूलतः पारित रूप में अथवा संशोधित रूप में पुनःपारित किया जाय।

१६९-च-संदेश से सभा की असहमति- यदि यह प्रस्ताव पारित न हो कि सन्देश में अन्तर्निहित निदेशों के प्रकाश में राज्यपाल द्वारा लौटाये गये विधेयक पर पुनर्विचार किया जाय तो नियम १६९-क के अधीन प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य तत्काल यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि सभा द्वारा मूलरूप में पारित विधेयक को पुनः किसी संशोधन के बिना पारित किया जाय।

१६९-छ-संविधान के अनुच्छेद-२०१ के परन्तुक के अन्तर्गत सन्देश सहित लौटाये गये विधेयकों पर पुनर्विचार- जब कोई विधेयक जो सभा द्वारा पारित हो चुका हो, सभा को संविधान के अनुच्छेद २०१ के परन्तुक के उपबन्धों के अनुसार पुनर्विचार करने के सन्देश सहित लौटाया जाय तो उसके संबंध में उस प्रक्रिया का अनुसरण किया जायेगा, जो सभा द्वारा पारित उन विधेयकों के संबंध में अनुसरित की जाती है जो संविधान के अनुच्छेद २०० के परन्तुक के अन्तर्गत पुनर्विचार के लिये लौटाये जाते है और उपर्युक्त नियमों के उपबन्धों एवं अनुकूलनों के अधीन रहते हुए प्रवृत होंगे, जो रूपभेद, परिवर्धन या लोप के रूप में हो सकते हैं, जिन्हें अध्यक्ष आवश्यक या इष्टकर समझें।

(ट ट) सभा द्वारा पुनः पारित विधेयक का प्रमाणीकरण

१६९-ज-सभा द्वारा पुनः पारित विधेयक का प्रमाणीकरण- जब कोई विधेयक सभा द्वारा पुनः पारित किया जाय तथा वह सभा के कब्जे में हो तब विधेयक पर अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षर किये जायेंगे और उसे राज्यपाल के समक्ष निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जायगा:
"उक्त विधेयक संविधान के अनुच्छेद २०० के प्रथम परन्तुक/२०१ के परन्तुक के अनुसरण में सभा द्वारा बिना संशोधन के मूल रूप में/निम्नलिखित संशोधनों सहित पुनः पारित किया गया है।"

(ठ) विधेयकों का स्थगन और वापसी तथा अपास्त विधेयक

१७०- विधेयक पर वाद-विवाद का स्थगन- सदन में चर्चाधीन विधेयक के किसी प्रक्रम पर अध्यक्ष की सम्मति से यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकेगा कि विधेयक पर वाद-विवाद स्थगित किया जाये।

१७१- विधेयक की वापसी- विधेयक के भार-साधक सदस्य विधेयक के किसी प्रक्रम पर विधेयक को इस आधार पर वापस लेने की अनुमति का प्रस्ताव वापस कर सकेंगे कि:-

(क) विधेयक में अन्तर्विष्ट विधायिनी प्रस्थापना समाप्त की जानी है, या

(ख) बाद में उस विधेयक के स्थान में एक नया विधेयक लाया जाना है जिससे उसमें अन्तर्विष्ट उपबन्धों में सारतः रूपान्तर हो जायगा; या

(ग) बाद में उस विधेयक के स्थान पर एक नया विधेयक लाया जाना है जिसमें अन्य उपबन्धों के अतिरिक्त उसके सभी या कुछ उपबन्ध सम्मिलित होंगे,
और यदि ऐसी अनुमति दी जाय तो विधेयक के संबंध में अग्रेतर प्रस्ताव नहीं किया जायेगा और वह स्वतः वापस किया हुआ समझा जायगा:
परन्तु जब कोई विधेयक परिषद् में आरम्भ हुआ हो और सदन के समक्ष लम्बित हो तो विधेयक भार-साधक सदस्य सदन में यह प्रस्ताव करेंगे कि यदि परिषद् विधेयक को सदन द्वारा वापस किये जाने की अनुमति से सहमत हो तो विधेयक को वापस लेने की अनुमति दी जाय और यदि सदन इस प्रस्ताव को अंगीकार कर ले और परिषद् इस प्रस्ताव से सहमत हो जाय तो उसकी सूचना प्रमुख सचिव द्वारा सदन को दी जायगी और यह समझा जायेगा कि विधेयक वापस किया गया।

१७२- विधेयक की वापसी का प्रस्ताव या उसका विरोध करने वाले सदस्य द्वारा व्याख्यात्मक वक्तव्य- यदि किसी विधेयक को वापस लेने की अनुज्ञा के प्रस्ताव का विरोध किया जाय तो अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें, प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले सदस्य को तथा प्रस्ताव का विरोध करने वाले सदस्य को संक्षिप्त व्याख्यात्मक वक्तव्य देने की अनुज्ञा दे सकेंगे और उसके बाद और अधिक वाद-विवाद के बिना, प्रश्न रख सकेंगे।

१७3- विधेयकों की पंजी से किसी विधेयक को हटाना- (१) जब सदन विधेयक भार-साधक सदस्य द्वारा किये गये निम्नलिखित प्रस्तावों में से किसी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दे तो उस विधेयक के संबंध में कोई अन्य प्रस्ताव नहीं किया जायेगा, और ऐसा विधेयक उस सत्र के लिए सदन में लम्बित विधेयकों की पंजी में से निकाल दिया जायेगा-

१- कि विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा दी जाय,

२- कि विधेयक एक प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति को सौंपा जाय या उस पर राय जानने के प्रयोजन से उसे परिचालित किया जाय,

३- कि विधेयक पर विचार किया जाय,

४- कि प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर विचार किया जाय, और

५- कि विधेयक (या यथास्थिति, संशोधित रूप में विधेयक) पारित किया जाय।

(२) सदन के सामने लम्बित विधेयक सदन द्वारा सारत: समान विधेयक पारित हो चुकने की या नियम १७१ के अधीन विधेयक के वापस हो जाने की अवस्था में सदन में लम्बित विधेयकों को पंजी में से निकाल दिया जायेगा।

व्याख्या- सदन के सामने लम्बित विधेयक में ये सम्मिलित होंगे-

(१) सदन में पुरःस्थापित विधेयक जो इस नियम या नियम- १७४ में उल्लिखित विधेयकों के वर्गों के अन्दर नहीं आता,

(२) यथास्थिति, परिषद् को पहुँचाया गया तथा परिषद् द्वारा संशोधन, या सिफारिश सहित, लौटाया गया और नियम-१५४ के अन्तर्गत पटल पर रखा गया विधेयक,

(३) परिषद् में आरम्भ और सदन को पहुंचाया गया और नियम- १६१ या १६८ (१) (क) के अन्तर्गत पटल पर रखा गया विधेयक, तथा

(४) यथास्थिति, संविधान के अनुच्छेद २०० या २०१ के अन्तर्गत राज्यपाल के या राष्ट्रपति के संदेश के साथ लौटाया गया विधेयक।

१७४- विधेयकों की पंजी से असरकारी सदस्य का विधेयक हटाने के लिये विशेष उपबन्ध- सदन के सामने लम्बित किसी असरकारी सदस्य का विधेयक सदन में लम्बित विधेयकों की पंजी में से हटा दिया जायेगा, यदि-

(क) विधेयक भार-साधक सदस्य सदन के सदस्य न रहें;

(ख) विधेयक भार-साधक सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं।

१७५- अपास्त विधेयक- विधेयक, जिसके संबंध में दो वर्ष तक सभा में कोई प्रस्ताव प्रस्तुत न हुआ हो, अपास्त समझा जायेगा और अध्यक्ष के आदेश से विधेयकों की पंजी में से हटा दिया जायगा।

(ड) सदन के सामने रखे गये संविहित विनियम, नियम आदि

१७६- विनियम, नियम आदि का सदन के पटल पर रखा जाना- (१) जब संविधान, संसद या विधान मण्डल द्वारा किसी प्राधिकारी को प्रत्यायोजित विधायी कृत्यों के अनुसरण में बनाये गये विनियम, नियम, उप नियम, उप विधि आदि सदन के सामने रखे जायं तो तत्संगत विधि में उल्लिखित कालावधि जिसके लिये उसके रखे जाने की अपेक्षा हो सभा के सत्रावसान होने के पहले पूरी की जायेगी जब तक कि तत्संगत विधि में अन्यथा उपबन्धित न हो।

(२) जब उल्लिखित कालावधि इस तरह पूरी न हो तो विनियम, नियम, उप नियम, उप विधि आदि अनुवर्ती सत्र या सत्रों में पुनः रखे जायेंगे जब तक कि कथित कालावधि एक सत्र में पूरी न हो जाय।

१७७- संशोधन पर चर्चा के लिये समय का नियतन- (१) पटल पर रखे गये विनियम, नियम, उप नियम, उप विधि आदि के संबंध में सदस्यों द्वारा संशोधन उस अवधि के भीतर प्रस्तुत किये जा सकेंगे जो अधिनियम में उनके पटल पर रखे जाने के लिये विहित हों तथा इन संशोधनों पर विचार व विनिश्चय के लिये वे नियम यथोचित परिवर्तनों सहित लागू होंगे जो विधेयक के खण्डों के संशोधनों के लिये विहित हैं।

(२) अध्यक्ष, सदन नेता के परामर्श से इन संशोधनों पर विचार तथा विनिश्चय करने के लिये तिथि निश्चित करेंगे।

१७८- संशोधन का परिषद् को पहुंचाना- संशोधन सभा द्वारा पारित किये जाने के बाद परिषद् को उसकी सहमति के लिये पहुंचाया जायगा और परिषद् से संशोधन की स्वीकृति का सन्देश प्राप्त होने पर प्रमुख सचिव द्वारा शासन को भेजा जायगा किन्तु यदि तत्संगत अधिनियम के अधीन परिषद् की सहमति अपेक्षित न हो तो प्रमुख सचिव सभा द्वारा पारित संशोधनों की सूचना तुरन्त शासन को भेज देंगे।

१७९- परिषद् द्वारा लौटाया गया संशोधन- यदि परिषद् सदन द्वारा पारित संशोधन से असहमत हो या उसे उसके अग्रेतर संशोधन के अधीन स्वीकार करे या उसके स्थान में अन्य संशोधन प्रस्थापित करे, तो सदन या तो संशोधन को अपास्त कर सकेगा या प्रस्थापित संशोधन में परिषद् से सहमत हो सकेगा या सदन द्वारा पारित मूल संशोधन पर आगृह कर सकेगा। प्रत्येक दशा में परिषद् को सन्देश भेजा जायेगा। यदि सदन परिषद् द्वारा अग्रेतर संशोधित संशोधन या परिषद् द्वारा प्रस्थापित अन्य संशोधन से सहमत हो तो संशोधन जिससे सदन इस प्रकार सहमत हो प्रमुख सचिव द्वारा शासन को भेजा जायेगा।

१८०- सदनों के बीच असहमति- यदि परिषद् सदन द्वारा पारित मूल संशोधन से सहमत हो जाये तो वह प्रमुख सचिव द्वारा शासन को भेजा जायेगा, किन्तु यदि परिषद् असहमत हो तो या ऐसे संशोधन पर आगृह करे जिससे सदन सहमत न हुआ हो तो यह समझा जायेगा कि सदन अन्तिम रूप से सहमत हो गये हैं और उस पर सब अग्रेतर कार्यवाही अपास्त कर दी जायेगी।

१८१- सदन को सूचना- प्रत्येक दशा में संशोधन के संबंध में परिषद् की सहमति या असहमति की सूचना प्रमुख सचिव द्वारा सदन को दी जायेगी।

(ढ) संविधान में संशोधनों के अनुसमर्थन की प्रक्रिया

१८२ संविधान में संशोधन का अनुसमर्थन - (१) संविधान में संशोधन के अनुसमर्थन के संचार या संदेश के प्राप्ति होने पर उसको विधेयक एवं तदविषयक वाद-विवाद की प्रतिलिपि सहित प्रमुख सचिव द्वारा सदन के पटल पर रखा जायेगा।

(२) अध्यक्ष सदन-नेता के परामर्श से संविधान में संशोधन के अनुसमर्थन के संकल्प पर चर्चा के लिये दिन नियत करेंगे।

(३) संकल्पों से संबंधित नियम एवं आदेश उक्त चर्चा पर यथोचित परिवर्तनों सहित प्रयुक्त होंगे।

(४) सभा द्वारा पारित हो जाने पर संकल्प की प्रतिलिपि प्रमुख सचिव द्वारा शासन तथा संसद को भेजी जायेगी। संकल्प के पारित न होने की दशा में तदविषयक सूचना भेज दी जायेगी।

अध्याय XV – वित्तीय विषयों के सम्बन्ध में प्रक्रिया

(ख) विनियोग विधेयक

१८७- साधारण चर्चा- (१) आय-व्ययक प्रस्तुत किये जाने के कम से कम दो दिन बाद अध्यक्ष द्वारा नियत दिनों पर आय-व्ययक पर या उसमें अन्तर्ग्रस्त सिद्वान्तों के किसी प्रश्न पर साधारण चर्चा सामान्यतया ५ दिन होगी, किन्तु इस प्रक्रम पर कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा और न ही आय-व्ययक सदन में मतदान के लिये रखा जायेगा।

(२) वित्त मंत्री को चर्चा के अन्त में उत्तर देने का सामान्य अधिकार होगा ।

(३) यदि अध्यक्ष उपयुक्त समझें तो वे भाषणों की समय-सीमा विहित कर सकेंगे।

१८८- मांगों पर मतदान- (१) अध्यक्ष, सदन-नेता के परामर्श से अनुदान की मांगों पर विचार और मतदान के लिये २४ दिनों से अनधिक के दिन नियत करेंगे।

(२) उप नियम (१) के अधीन रहते हुए अनुदान की मांग ऐसे क्रम में उपस्थित की जायेगी जैसा कि सदन-नेता विरोधी दल के नेता से परामर्श करके निश्चित करें।

(३) उप नियम (१) के अन्तर्गत नियत दिनों में प्रश्नों के अतिरिक्त अध्यक्ष की सम्मति के बिना कोई कार्य नहीं किया जायेगा।

(४) इस प्रक्रम में किसी अनुदान की मांग को कम करने या उसकी किसी मद को निकाल देने के प्रस्ताव किये जा सकेंगे, किन्तु अनुदान की मांग में वृद्वि या उसके लक्ष्य में परिवर्तन करने के प्रस्ताव नहीं किये जा सकेंगे ।

(५) किसी अनुदान की मांग को कम करने के प्रस्ताव पर संशोधन करने की अनुज्ञा न होगी ।

(६) जब एक ही मांग से सम्बद्व अनेक प्रस्ताव प्रस्तुत किये जायं तो जिस क्रम में उनसे सम्बद्व शीषर्क आय-व्ययक में दिये हों उसी क्रम में उन पर चर्चा की जायगी ।

(७) उप नियम (१) के अन्तर्गत नियत दिनों के अन्तिम दिन उपवेशन की साधारण समाप्ति के लगभग आधा घंटा पूर्व अध्यक्ष, अनुदानों के लिये मांगों के सम्बन्ध में अवशिष्ट विषयों के निस्तारण के निमित्त प्रत्येक आवश्यक प्रश्न तुरन्त रखेंगे, और इस प्रक्रिया में कार्यवाही को स्थगित करने का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा, न किसी प्रकार की बाधा डाली जायेगी और न उसके सम्बन्ध में कोई विलम्बकारी प्रस्ताव ही किया जायगा ।

१८९- कटौती प्रस्ताव- किसी मांग की राशि कम करने के लिये निम्नलिखित में से किसी भी ढंग से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकेगा-

(क) "कि मांग की राशि घटाकर एक रूपया कर दी जाय"-मांग में अन्तर्निहित नीति से अननुमोदन प्रकट करने के लिये ऐसा प्रस्ताव "नीति अननुमोदन कटौती" कहा जायगा, ऐसे प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य उस नीति का ब्यौरा सुतथ्यतया दर्शाय़ेंगे जिस पर वे चर्चा करना चाहते हों। चर्चा सूचना में उल्लिखित विशिष्ट बात या बातों तक सीमित रहेगी और सदस्य वैकल्पिक नीति का सुझाव दे सकेंगे;

(ख) "कि मांग की राशि में उल्लिखित राशि की कमी की जाय"-जो की जा सकने वाली "मितव्ययता" को प्रदर्शित करे। ऐसी उल्लिखित राशि या तो मांग में से एकमुश्त घटाई जाने वाली राशि हो सकेगी या मांग की किसी मद का विलोपन अथवा उसमें घटाई जाने वाली राशि हो सकेगी। ऐसा प्रस्ताव "मितव्ययता कटौती" कहा जायेगा। सूचना में संक्षेप में और सुतथ्यतया वह विशेष विषय दर्शाय़ा जायेगा, जिस पर चर्चा के उठानी हो और भाषण, और इस बात की चर्चा के लिये ही सीमित होंगे कि मितव्ययता कैसे की जा सकती है;

(ग) "कि मांग की राशि में १०० रू० की कमी की जाय"-ऐसी विशिष्ट शिकायत को प्रकट करने के लिये जो शासन के उत्तरदायित्व के क्षेत्र में हो। ऐसा प्रस्ताव "प्रतीक कटौती" कहा जायगा और उस पर चर्चा प्रस्ताव में उल्लिखित विशिष्ट शिकायत तक ही सीमित होगी।

१९०- कटौती प्रस्तावों की ग्राह्यता की शतें- (१) मांग की राशि कम करने की सूचना ग्राह्य हो सके, इसके लिये वह निम्नलिखित शर्ते पूरी करेगी, अर्थात्:-

(क) उसका सम्बन्ध केवल एक मांग से होगा;

(ख) वह स्पष्टतया व्यक्त की जायेगी और उसमें प्रतर्क, अनुमान, व्यंग्यात्मक पद, अभ्यारोप, विशेषण या मानहानिकारक कथन नहीं होंगे।

(ग) वह एक ही विशिष्ट विषय तक सीमित रखी जायगी़, जिसका वर्णन सुतथ्य शब्दों में किया जायगा;

(घ) उसमें किसी ऐसी व्यक्ति के चरित्र या आचरण पर अभ्युक्ति नहीं की जायेगी, जिसके आचरण पर मूल प्रस्ताव के द्वारा ही आपत्ति की जा सकती हों;

(ङ) उसमें वर्तमान विधियों का संशोधन या निरसन करने के लिये सुझाव नहीं दिये जायेंगे;

(च) वह उस विषय का निर्देश नहीं करेगी जो मुख्यतया शासन का विषय न हो;

(छ) उसका किसी ऐसे व्यय से सम्बन्ध नहीं होगा जो कि उत्तर प्रदेश राज्य की संचित निधि पर भारित हो;

(ज) उसका भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के न्याय-निर्णयन के अन्तर्गत किसी विषय से सम्बन्ध नहीं होगा;

(झ) उसमें विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं उठाया जायगा;

(ञ) उसमें ऐसा विषय नहीं उठाया जायेगा जिस पर उसी सत्र में चर्चा की जा चुकी हो और जिस पर विनिश्चय किया जा चुका हो;

(ट) उसमें उस विषय की पूर्वाशा नहीं की जायेगी, जो उसी सत्र में विचार के लिये पहले ही नियत किया जा चुका हो;

(ठ) उसमें ऐसा विषय नहीं उठाया जायगा जो कोई न्यायिक या अर्धन्य़ायिक कृत्य करने वाले किसी न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के, किसी विषय की जाँच या अनुसंधान करने के लिये नियुक्त किसी आयोग या जाँच न्यायालय के सामने विचाराधीन हो:
परन्तु अध्यक्ष स्वविवेक से ऐसे विषय को सदन मे उठाने की अनुमति दे सकेंगे, जो जाँच की प्रक्रिया अथवा व्याप्ति या प्रक्रम से सम्बन्धित हो, यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाये कि इससे न्यायाधिकरण, संविहित प्राधिकारी, आयोग या जाँच न्यायालय द्वारा उस विषय के विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना नहीं है; और

(ड) उसका सम्बन्ध तुच्छ विषय से नहीं होगा।

(२) अध्यक्ष ऐसे कटौती के प्रस्ताव को अस्वीकृत कर सकेंगे जिसके द्वारा उनकी राय में प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अधिकार का दुरूपयोग या जिसके द्वारा इन नियमों का उल्लंघन होता हो।

१९१- कटौती के प्रस्ताव की सूचना- कटौती के प्रस्ताव की सूचना,उस अनुदान पर विचार करने के नियत दिन से कम से कम २ दिन पूर्व दी जायेगी जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें।

१९२- प्रत्यानुदान तथा अपवादानुदान- (१) पूवर्गामी नियमों में किसी बात के होते हुए भी अनुच्छेद २०६ के अन्तर्गत अप्रत्याशित एवं अपवाद अनुदानों के लिये प्राक्कलित व्यय के सम्बन्ध में अग्रिम अनुदानों के प्रस्ताव उपस्थित किये जा सकेंगे।

(२) ऐसी मांगों पर सभा में उसी प्रकार कार्यवाही होगी जिस प्रकार आय-व्ययक के सम्बन्ध में, अनुदानों की मांगों पर होती है और इस विषय से सम्बद्व नियम ऐसे रूप भेदों सहित जो अध्यक्ष आवश्यक समझें, ऐसी मांगों पर लागू होंगे।

१९३- लेखानुदान- (१) लेखानुदान के प्रस्तावों में सम्पूर्ण, अपेक्षित राशि व्यक्त की जायेगी और विभिन्न धनराशियां जो प्रत्येक विभाग अथवा सेवा अथवा व्यय की मद के लिये आवश्यक हों, जिससे वह राशि बनती हो, प्रस्ताव से संलग्न अनुसूची में व्यक्त की जायेगी।

(२) सम्पूर्ण अनुदान को कम करने के लिये अथवा जिन मदों से मिलकर अनुदान बना हो उनके कम करने या विलुप्त करने के लिये संशोधन प्रस्तुत किये जा सकेंगे।

(३) प्रस्ताव पर या उसमें प्रस्तुत किये गये संशोधनों पर साधारण चर्चा की अनुज्ञा होगी, तथा अनुदानों के विवरणों पर सविस्तार विवाद न होकर केवल इतना उल्लेख किया जा सकेगा जो साधारण चर्चा के हेतु आवश्यक हो ।

(४) अन्य प्रकरणों में लेखानुदान के प्रस्ताव पर उसी प्रकार कार्यवाही की जायेगी जैसे कि वह अनुदान की मांग हो।

१९४- अनुपूरक अथवा अपर अनुदान अथवा अतिरिक्त व्यय के लिये अनुदान- (१) राज्यपाल, अनुच्छेद २०५ के अन्तर्गत अनुपूरक अथवा अपर अथवा अतिरिक्त व्यय के सम्बन्ध में अनुदानों के लिये मांगों का विवरण प्रस्तुत करने के लिये दिन नियत कर सकेंगे।

(२) अध्यक्ष, सदन नेता से परामर्श करके ऐसी मांगों पर चर्चा एवं मतदान के लिये एक या अधिक दिन नियत करेंगे। इन प्रकरणों में उसी प्रक्रिया का जो नियम १८५, १८६, १८७, १८८, १८९, १९० तथा १९१ में निर्धारित की गयी है ऐसे रूप भेदों सहित जो अध्यक्ष आवश्यक समझें, अनुसरण किया जायेगा।

१९५- अनुपूरक अनुदानों पर चर्चा की व्याप्ति- अनुपूरक अनुदानों पर वाद-विवाद केवल उसकी मदों तक ही सीमित रहेगा जब तक चर्चाधीन मदों की व्याख्या करने या उन्हें स्पष्ट करने के लिये आवश्यक न हो, मूल अनुदानों पर या उनमें अन्तर्निहित नीति पर कोई चर्चा नहीं होगी ।

१९६- प्रतीकानुदान- जब किसी नयी सेवा पर प्रस्थापित व्यय के लिये पुनर्विनियोग द्वारा धन उपलब्ध किया जा सकता हो, तो कोई प्रतीक राशि के अनुदान की मांग सदन के मतदान के लिये रखी जा सकेगी और यदि सदन मांग की अनुमति दे दे तो धन इस तरह उपलब्ध किया जा सकेगा।

(ख) विनियोग विधेयक

१९७- विनियोग विधेयक- (१) संविधान के उपबन्धों के अधीन रहते हुए विनियोग विधेयक के बारे में प्रक्रिया, ऐसे रूप भेदों के साथ जैसे अध्यक्ष आवश्यक समझें, वही होगी जो सामान्यतया, विधेयकों के लिये होती है:
परन्तु किसी विनियोग विधेयक पर कोई ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जायगा जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद २०३ के अन्तर्गत दिये गये अनुदान की धनराशि में या उसके लक्ष्य में परिवर्तन हो जाय

(२) अध्यक्ष ऐसे विधेयकों को समय के भीतर पारित करने के लिये किसी नियम की प्रक्रिया का निलम्बन कर सकेंगे।

१९८- वित्तीय कार्य के निस्तारण के लिये समय सीमा- इन नियमों के अन्तर्गत अध्यक्ष, अपनी प्रयोज्य शक्तियों के अतिरिक्त उन समस्त अधिकारों या शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे जो समस्त वित्तीय कार्य को समय के भीतर पूरा करने के लिये आवश्यक हों और विशेष रूप से ऐसे विभिन्न प्रकार के कार्यों की पूर्ति के लिये समय नियत कर सकेंगे और जब समय इस प्रकार नियत कर दिया जाय तो वे नियत समय पर ऐसे प्रक्रम या प्रक्रमों के सम्बन्ध में जिनके लिये समय नियत किया गया हो समस्त अवशिष्ट विषयों के निस्तारण के लिये प्रत्येक आवश्यक प्रश्न प्रस्तुत करेंगे।

व्याख्या-वित्तीय कार्य में ऐसे कार्य का भी समावेश है जिसे अध्यक्ष समझते हैं कि वह संविधान के अन्तर्गत इस श्रेणी में आता है।

१९९- विनियोग तथा वित्त लेखों और लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों का प्रकाशन- विनियोग और वित्त लेखों तथा उन पर लेखा-परीक्षा प्रतिवेदनों के विधान मण्डल के पटलों पर रखे जाने के उपरान्त यथासम्भव शीध्र प्रमुख सचिव सर्वसाधारण की सूचनार्थ उनको प्रकाशित हुआ घोषित करने की अधिसूचना जारी करेंगे।

१८७- साधारण चर्चा- (१) आय-व्ययक प्रस्तुत किये जाने के कम से कम दो दिन बाद अध्यक्ष द्वारा नियत दिनों पर आय-व्ययक पर या उसमें अन्तर्ग्रस्त सिद्वान्तों के किसी प्रश्न पर साधारण चर्चा सामान्यतया ५ दिन होगी, किन्तु इस प्रक्रम पर कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा और न ही आय-व्ययक सदन में मतदान के लिये रखा जायेगा।

(२) वित्त मंत्री को चर्चा के अन्त में उत्तर देने का सामान्य अधिकार होगा ।

(३) यदि अध्यक्ष उपयुक्त समझें तो वे भाषणों की समय-सीमा विहित कर सकेंगे।

१८८- मांगों पर मतदान- (१) अध्यक्ष, सदन-नेता के परामर्श से अनुदान की मांगों पर विचार और मतदान के लिये २४ दिनों से अनधिक के दिन नियत करेंगे।

(२) उप नियम (१) के अधीन रहते हुए अनुदान की मांग ऐसे क्रम में उपस्थित की जायेगी जैसा कि सदन-नेता विरोधी दल के नेता से परामर्श करके निश्चित करें।

(३) उप नियम (१) के अन्तर्गत नियत दिनों में प्रश्नों के अतिरिक्त अध्यक्ष की सम्मति के बिना कोई कार्य नहीं किया जायेगा।

(४) इस प्रक्रम में किसी अनुदान की मांग को कम करने या उसकी किसी मद को निकाल देने के प्रस्ताव किये जा सकेंगे, किन्तु अनुदान की मांग में वृद्वि या उसके लक्ष्य में परिवर्तन करने के प्रस्ताव नहीं किये जा सकेंगे ।

(५) किसी अनुदान की मांग को कम करने के प्रस्ताव पर संशोधन करने की अनुज्ञा न होगी ।

(६) जब एक ही मांग से सम्बद्व अनेक प्रस्ताव प्रस्तुत किये जायं तो जिस क्रम में उनसे सम्बद्व शीषर्क आय-व्ययक में दिये हों उसी क्रम में उन पर चर्चा की जायगी ।

(७) उप नियम (१) के अन्तर्गत नियत दिनों के अन्तिम दिन उपवेशन की साधारण समाप्ति के लगभग आधा घंटा पूर्व अध्यक्ष, अनुदानों के लिये मांगों के सम्बन्ध में अवशिष्ट विषयों के निस्तारण के निमित्त प्रत्येक आवश्यक प्रश्न तुरन्त रखेंगे, और इस प्रक्रिया में कार्यवाही को स्थगित करने का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जायेगा, न किसी प्रकार की बाधा डाली जायेगी और न उसके सम्बन्ध में कोई विलम्बकारी प्रस्ताव ही किया जायगा ।

१८९- कटौती प्रस्ताव- किसी मांग की राशि कम करने के लिये निम्नलिखित में से किसी भी ढंग से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकेगा-

(क) "कि मांग की राशि घटाकर एक रूपया कर दी जाय"-मांग में अन्तर्निहित नीति से अननुमोदन प्रकट करने के लिये ऐसा प्रस्ताव "नीति अननुमोदन कटौती" कहा जायगा, ऐसे प्रस्ताव की सूचना देने वाले सदस्य उस नीति का ब्यौरा सुतथ्यतया दर्शाय़ेंगे जिस पर वे चर्चा करना चाहते हों। चर्चा सूचना में उल्लिखित विशिष्ट बात या बातों तक सीमित रहेगी और सदस्य वैकल्पिक नीति का सुझाव दे सकेंगे;

(ख) "कि मांग की राशि में उल्लिखित राशि की कमी की जाय"-जो की जा सकने वाली "मितव्ययता" को प्रदर्शित करे। ऐसी उल्लिखित राशि या तो मांग में से एकमुश्त घटाई जाने वाली राशि हो सकेगी या मांग की किसी मद का विलोपन अथवा उसमें घटाई जाने वाली राशि हो सकेगी। ऐसा प्रस्ताव "मितव्ययता कटौती" कहा जायेगा। सूचना में संक्षेप में और सुतथ्यतया वह विशेष विषय दर्शाय़ा जायेगा, जिस पर चर्चा के उठानी हो और भाषण, और इस बात की चर्चा के लिये ही सीमित होंगे कि मितव्ययता कैसे की जा सकती है;

(ग) "कि मांग की राशि में १०० रू० की कमी की जाय"-ऐसी विशिष्ट शिकायत को प्रकट करने के लिये जो शासन के उत्तरदायित्व के क्षेत्र में हो। ऐसा प्रस्ताव "प्रतीक कटौती" कहा जायगा और उस पर चर्चा प्रस्ताव में उल्लिखित विशिष्ट शिकायत तक ही सीमित होगी।

१९०- कटौती प्रस्तावों की ग्राह्यता की शतें- (१) मांग की राशि कम करने की सूचना ग्राह्य हो सके, इसके लिये वह निम्नलिखित शर्ते पूरी करेगी, अर्थात्:-

(क) उसका सम्बन्ध केवल एक मांग से होगा;

(ख) वह स्पष्टतया व्यक्त की जायेगी और उसमें प्रतर्क, अनुमान, व्यंग्यात्मक पद, अभ्यारोप, विशेषण या मानहानिकारक कथन नहीं होंगे।

(ग) वह एक ही विशिष्ट विषय तक सीमित रखी जायगी़, जिसका वर्णन सुतथ्य शब्दों में किया जायगा;

(घ) उसमें किसी ऐसी व्यक्ति के चरित्र या आचरण पर अभ्युक्ति नहीं की जायेगी, जिसके आचरण पर मूल प्रस्ताव के द्वारा ही आपत्ति की जा सकती हों;

(ङ) उसमें वर्तमान विधियों का संशोधन या निरसन करने के लिये सुझाव नहीं दिये जायेंगे;

(च) वह उस विषय का निर्देश नहीं करेगी जो मुख्यतया शासन का विषय न हो;

(छ) उसका किसी ऐसे व्यय से सम्बन्ध नहीं होगा जो कि उत्तर प्रदेश राज्य की संचित निधि पर भारित हो;

(ज) उसका भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के न्याय-निर्णयन के अन्तर्गत किसी विषय से सम्बन्ध नहीं होगा;

(झ) उसमें विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं उठाया जायगा;

(ञ) उसमें ऐसा विषय नहीं उठाया जायेगा जिस पर उसी सत्र में चर्चा की जा चुकी हो और जिस पर विनिश्चय किया जा चुका हो;

(ट) उसमें उस विषय की पूर्वाशा नहीं की जायेगी, जो उसी सत्र में विचार के लिये पहले ही नियत किया जा चुका हो;

(ठ) उसमें ऐसा विषय नहीं उठाया जायगा जो कोई न्यायिक या अर्धन्य़ायिक कृत्य करने वाले किसी न्यायाधिकरण या संविहित प्राधिकारी के, किसी विषय की जाँच या अनुसंधान करने के लिये नियुक्त किसी आयोग या जाँच न्यायालय के सामने विचाराधीन हो:
परन्तु अध्यक्ष स्वविवेक से ऐसे विषय को सदन मे उठाने की अनुमति दे सकेंगे, जो जाँच की प्रक्रिया अथवा व्याप्ति या प्रक्रम से सम्बन्धित हो, यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाये कि इससे न्यायाधिकरण, संविहित प्राधिकारी, आयोग या जाँच न्यायालय द्वारा उस विषय के विचार किये जाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना नहीं है; और

(ड) उसका सम्बन्ध तुच्छ विषय से नहीं होगा।

(२) अध्यक्ष ऐसे कटौती के प्रस्ताव को अस्वीकृत कर सकेंगे जिसके द्वारा उनकी राय में प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अधिकार का दुरूपयोग या जिसके द्वारा इन नियमों का उल्लंघन होता हो।

१९१- कटौती के प्रस्ताव की सूचना- कटौती के प्रस्ताव की सूचना,उस अनुदान पर विचार करने के नियत दिन से कम से कम २ दिन पूर्व दी जायेगी जब तक कि अध्यक्ष अन्यथा निर्देश न दें।

१९२- प्रत्यानुदान तथा अपवादानुदान- (१) पूवर्गामी नियमों में किसी बात के होते हुए भी अनुच्छेद २०६ के अन्तर्गत अप्रत्याशित एवं अपवाद अनुदानों के लिये प्राक्कलित व्यय के सम्बन्ध में अग्रिम अनुदानों के प्रस्ताव उपस्थित किये जा सकेंगे।

(२) ऐसी मांगों पर सभा में उसी प्रकार कार्यवाही होगी जिस प्रकार आय-व्ययक के सम्बन्ध में, अनुदानों की मांगों पर होती है और इस विषय से सम्बद्व नियम ऐसे रूप भेदों सहित जो अध्यक्ष आवश्यक समझें, ऐसी मांगों पर लागू होंगे

१९३- लेखानुदान- (१) लेखानुदान के प्रस्तावों में सम्पूर्ण, अपेक्षित राशि व्यक्त की जायेगी और विभिन्न धनराशियां जो प्रत्येक विभाग अथवा सेवा अथवा व्यय की मद के लिये आवश्यक हों, जिससे वह राशि बनती हो, प्रस्ताव से संलग्न अनुसूची में व्यक्त की जायेगी।

(२) सम्पूर्ण अनुदान को कम करने के लिये अथवा जिन मदों से मिलकर अनुदान बना हो उनके कम करने या विलुप्त करने के लिये संशोधन प्रस्तुत किये जा सकेंगे।

(३) प्रस्ताव पर या उसमें प्रस्तुत किये गये संशोधनों पर साधारण चर्चा की अनुज्ञा होगी, तथा अनुदानों के विवरणों पर सविस्तार विवाद न होकर केवल इतना उल्लेख किया जा सकेगा जो साधारण चर्चा के हेतु आवश्यक हो ।

(४) अन्य प्रकरणों में लेखानुदान के प्रस्ताव पर उसी प्रकार कार्यवाही की जायेगी जैसे कि वह अनुदान की मांग हो।

१९४- अनुपूरक अथवा अपर अनुदान अथवा अतिरिक्त व्यय के लिये अनुदान- (१) राज्यपाल, अनुच्छेद २०५ के अन्तर्गत अनुपूरक अथवा अपर अथवा अतिरिक्त व्यय के सम्बन्ध में अनुदानों के लिये मांगों का विवरण प्रस्तुत करने के लिये दिन नियत कर सकेंगे।

(२) अध्यक्ष, सदन नेता से परामर्श करके ऐसी मांगों पर चर्चा एवं मतदान के लिये एक या अधिक दिन नियत करेंगे। इन प्रकरणों में उसी प्रक्रिया का जो नियम १८५, १८६, १८७, १८८, १८९, १९० तथा १९१ में निर्धारित की गयी है ऐसे रूप भेदों सहित जो अध्यक्ष आवश्यक समझें, अनुसरण किया जायेगा।

१९५- अनुपूरक अनुदानों पर चर्चा की व्याप्ति- अनुपूरक अनुदानों पर वाद-विवाद केवल उसकी मदों तक ही सीमित रहेगा जब तक चर्चाधीन मदों की व्याख्या करने या उन्हें स्पष्ट करने के लिये आवश्यक न हो, मूल अनुदानों पर या उनमें अन्तर्निहित नीति पर कोई चर्चा नहीं होगी ।

१९६- प्रतीकानुदान- जब किसी नयी सेवा पर प्रस्थापित व्यय के लिये पुनर्विनियोग द्वारा धन उपलब्ध किया जा सकता हो, तो कोई प्रतीक राशि के अनुदान की मांग सदन के मतदान के लिये रखी जा सकेगी और यदि सदन मांग की अनुमति दे दे तो धन इस तरह उपलब्ध किया जा सकेगा।

(ख) विनियोग विधेयक

१९७- विनियोग विधेयक- (१) संविधान के उपबन्धों के अधीन रहते हुए विनियोग विधेयक के बारे में प्रक्रिया, ऐसे रूप भेदों के साथ जैसे अध्यक्ष आवश्यक समझें, वही होगी जो सामान्यतया, विधेयकों के लिये होती है:
परन्तु किसी विनियोग विधेयक पर कोई ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जायगा जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद २०३ के अन्तर्गत दिये गये अनुदान की धनराशि में या उसके लक्ष्य में परिवर्तन हो जाय।

(२) अध्यक्ष ऐसे विधेयकों को समय के भीतर पारित करने के लिये किसी नियम की प्रक्रिया का निलम्बन कर सकेंगे।

१९८- वित्तीय कार्य के निस्तारण के लिये समय सीमा- इन नियमों के अन्तर्गत अध्यक्ष, अपनी प्रयोज्य शक्तियों के अतिरिक्त उन समस्त अधिकारों या शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे जो समस्त वित्तीय कार्य को समय के भीतर पूरा करने के लिये आवश्यक हों और विशेष रूप से ऐसे विभिन्न प्रकार के कार्यों की पूर्ति के लिये समय नियत कर सकेंगे और जब समय इस प्रकार नियत कर दिया जाय तो वे नियत समय पर ऐसे प्रक्रम या प्रक्रमों के सम्बन्ध में जिनके लिये समय नियत किया गया हो समस्त अवशिष्ट विषयों के निस्तारण के लिये प्रत्येक आवश्यक प्रश्न प्रस्तुत करेंगे।
व्याख्या-वित्तीय कार्य में ऐसे कार्य का भी समावेश है जिसे अध्यक्ष समझते हैं कि वह संविधान के अन्तर्गत इस श्रेणी में आता है।

 

१९९- विनियोग तथा वित्त लेखों और लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों का प्रकाशन- विनियोग और वित्त लेखों तथा उन पर लेखा-परीक्षा प्रतिवेदनों के विधान मण्डल के पटलों पर रखे जाने के उपरान्त यथासम्भव शीध्र प्रमुख सचिव सर्वसाधारण की सूचनार्थ उनको प्रकाशित हुआ घोषित करने की अधिसूचना जारी करेंगे

अध्याय XVI – समितियों की प्रक्रिया

(क) सामान्य

२००- सदन की समितियों की नियुक्ति- (१) प्रत्येक साधारण निर्वाचन के उपरान्त प्रथम सत्र के प्रारम्भ होने पर और तदुपरान्त प्रत्येक वित्तीय वर्ष के पूर्व या समय-समय पर जब कभी अन्यथा अवसर उत्पन्न हो, विभिन्न समितियां विशिष्ट या सामान्य प्रयोजनों के लिये सदन द्वारा निर्वाचित या निर्मित की जायेंगी या अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित होंगी:
परन्तु कोई सदस्य किसी समिति में तब तक नियुक्त नहीं किये जायेंगे जब तक कि वे उस समिति में कार्य करने के लिये सहमत न हों।

(२) समिति में आकस्मिक रिक्तिताओं की पूर्ति, यथास्थिति, सदन द्वारा निर्वाचन या नियुक्ति अथवा अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशन करके की जायेगी और जो सदस्य ऐसी रिक्तिताओं की पूर्ति के लिये निर्वाचित, नियुक्त और नाम-निर्देशित हों उस कालावधि के असमाप्त भाग तक पद धारण करेंगे जिसके लिये वह सदस्य जिसके स्थान पर वे निर्वाचित, नियुक्त अथवा नाम-निर्देशित किये गये हैं, पद धारण करते:
परन्तु समिति की कार्यवाही इस आधार पर न अनियमित होगी और न रूकेगी कि आकस्मिक रिक्तिताओं की पूर्ति नहीं की गयी है।

२००-क-समिति की सदस्यता पर आपत्ति- जब किसी सदस्य के किसी समिति में सम्मिलित किये जाने पर, इस आधार पर आपत्ति की जाय कि उस सदस्य का ऐसे घनिष्ट प्रकार का वैयक्तिक, आर्थिक या प्रत्यक्ष हित है कि उससे समिति विचारणीय विषयों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, तो प्रक्रिया निम्नलिखित होगी:-

(क) जिस सदस्य ने आपत्ति की हो वह अपनी आपत्ति का आधार तथा समिति के सामने आने वाले विषयों में प्रस्थापित सदस्य के आरोपित हित के स्वरूप का, चाहे वह वैयक्तिक, आर्थिक या प्रत्यक्ष हो, सुतथ्यतया कथन करेगा,

(ख) आपत्ति का कथन किये जाने के बाद, अध्यक्ष समिति के लिये प्रस्थापित सदस्य को जिसके विरूद्व आपत्ति की गयी हो, स्थिति बताने के लिये अवसर देगा,

(ग) यदि तथ्यों के सम्बन्ध में विवाद हो तो अध्यक्ष आपत्ति करने वाले सदस्य तथा उस सदस्य से जिसकी समिति में नियुक्ति के विरूद्व आपत्ति की गयी हो, अपने-अपने मामले को समर्थन में लिखित या अन्य साक्ष्य पेश करने के लिये कह सकेगा,

(घ) जब अध्यक्ष ने अपने समक्ष इस तरह दिये गये साक्ष्य पर विचार कर लिया हो, तो उसके बाद वह अपना विनिश्चिय देगा जो अन्तिम होगा,

(ङ) जब तक अध्यक्ष ने अपना विनिश्चय न दिया हो, वह सदस्य जिसकी समिति में नियुक्ति के विरूद्व आपत्ति की गयी हो समिति का सदस्य बना रहेगा, यदि वह निर्वाचित या नाम-निर्देशित हो गया हो, और चर्चा में भाग लेगा किन्तु उसे मत देने का हक नहीं होगा, और

(च) यदि अध्यक्ष यह विनिश्चय करें कि जिस सदस्य की नियुक्ति के विरूद्व आपत्ति की गयी है उसका समिति के समक्ष विचाराधीन विषय में कोई वैयक्तिक, आर्थिक या प्रत्यक्ष हित है, तो उसकी समिति की सदस्यता तुरन्त समाप्त हो जायगी: परन्तु समिति की जिन बैठकों में ऐसा सदस्य उपस्थित था उनकी कार्यवाही अध्यक्ष के विनिश्चय द्वारा किसी तरह प्रभावित नहीं होगी ।

व्याख्या- इस नियम के प्रयोजनों के लिये सदस्य का हित प्रत्यक्ष, वैयक्तिक या आर्थिक होना चाहिए और वह हित जन साधारण या उसके किसी वर्ग या भाग के साथ सम्मिलित रूप में या राज्य की नीति को किसी विषय में न होकर उस व्यक्ति का, जिसके मत पर आपत्ति की जाय, पृथक रूप से होना चाहिये।

२०१- समिति का सभापति- (१) प्रत्येक समिति का सभापति अध्यक्ष द्वारा समिति के सदस्यों में से नियुक्त किया जायेगा:
परन्तु यदि उपाध्यक्ष समिति के सदस्य हों तो वे समिति के पदेन सभापति होंगे ।

(२) यदि सभापति किसी कारण से कार्य करने में असमर्थ हों अथवा उनका पद रिक्त हो तो अध्यक्ष उनके स्थान में अन्य सभापति नियुक्त कर सकेंगे ।

(३) यदि समिति के सभापति समिति के किसी उपवेशन से अनुपस्थित हों तो समिति किसी अन्य सदस्य को उस बैठक के सभापति का कार्य करने के लिये निर्वाचित करेगी ।

(४) उत्‍तर प्रदेश विधान सभा के उपाध्‍यक्ष का पद रिक्‍त होने की दशा में जिन समितियों में उपाध्‍यक्ष , विधान सभा सभापति होते है, उन समितियों को अध्‍यक्ष, विधान सभा द्वारा अपने अथवा अन्‍य समितियों के सभापतियों के सभापतित्‍व में सम्‍बद्ध किया जा सकता है।

२०२- गणपूर्ति- (१) किसी समिति का उपवेशन गठित करने के लिये गणपूर्ति समिति के कुल सदस्यों की संख्या से तृतीयांश से अन्यून होगी जब तक कि इन नियमों में अन्यथा उपबन्धित न हो ।

(२) समिति के उपवेशन के लिये निर्धारित किसी समय पर या उपवेशन के दौरान किसी समय पर यदि गणपूर्ति न हो तो सभापति उपवेशन को आधे घण्टे के लिए स्थगित कर देंगे और पुनः समवेत होने पर उपवेशन के लिये गणपूर्ति कुल सदस्यों की संख्या की पंचमांश से अन्यून होगी। यदि पुनः समवेत उपवेशन में उपस्थित सदस्यों की संख्या समिति की कुल सदस्य संख्या के पंचमांश से भी न्यून रहे तो उपवेशन को किसी भावी तिथि के लिये स्थगित कर दिया जायेगा।

(३) जब समिति उप नियम (२) के अन्तर्गत समिति के उपवेशन के लिये निर्धारित दो लगातार दिनांकों पर स्थगित हो चुकी हो तो सभापति इस तथ्य को सदन को प्रतिवेदित करेंगे:
परन्तु जब समिति अध्यक्ष द्वारा नियुक्त की गई हो तो सभापति स्थगन के तथ्य को अध्यक्ष को प्रतिवेदित करेंगे ।

(४) ऐसा प्रतिवेदन किये जाने पर, यथास्थिति, सदन या अध्यक्ष यह विनिश्चित करेंगे कि आगे क्या कार्यवाही की जाय।

२०३- समिति के उपवेशनों से अनुपस्थित सदस्यों को हटाया जाना तथा उनके स्थान की पूर्ति- (१) यदि कोई सदस्य किसी समिति के लगातार ३ उपवेशनों से सभापति की अनुज्ञा के बिना अनुपस्थित रहे तो ऐसे सदस्य को स्पष्टीकरण देने का अवसर देने के उपरान्त उस समिति से उनकी सदस्यता अध्यक्ष की आज्ञा से समाप्त की जा सकेंगी, और समिति में उनका स्थान अध्यक्ष की ऐसी आज्ञा के दिनांक से रिक्त घोषित किया जा सकेगा ।

(२) नियम २०० के उप नियम (२) में किसी बात के होते हुए भी उप नियम (१) के अन्तर्गत रिक्त स्थान की पूर्ति, अध्यक्ष द्वारा किसी अन्य सदस्य को नाम-निर्देशित करके की जा सकेगी ।
प्रथम-स्पष्टीकरण- इस नियम के अधीन उपवेशनों की गणना हेतु लखनऊ से बाहर आयोजित उपवेशनों को सम्मिलित नहीं किया जायेगा ।
द्वितीय-स्पष्टीकरण- यदि कोई सदस्य समिति के उपवेशन में भाग लेने हेतु लखनऊ आये हों, किन्तु उपवेशन में भाग न ले सके हों और लखनऊ आने की लिखित सूचना वह प्रमुख सचिव को उपवेशन की तिथि को ही उपलब्ध करा दें, तो इस नियम के प्रयोजन के लिये उन्हें उक्त तिथि को अनुपस्थित नहीं समझा जायेगा ।

२०४- सदस्य का त्याग- पत्र- कोई सदस्य समिति में अपने स्थान को स्वहस्तलिखित पत्र द्वारा जो अध्यक्ष को सम्बोधित होगा, त्याग सकेंगे ।

२०५- समिति की पदावधि- इनमें से प्रत्येक समिति के सदस्यों की पदावधि एक वित्तीय वर्ष होगी:
परन्तु इन नियमों के अन्तर्गत निर्वाचित या नाम-निर्देशित समितियां, जब तक विशेष रूप से अन्यथा निर्दिष्ट न किया जाय, उस समय तक पद धारण करेंगी जब तक कि नई समिति नियुक्त न हो जाय ।

२०६- समिति में मतदान- समिति के किसी उपवेशन में समस्त प्रश्नों का निर्धारण उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के मताधिक्य से होगा। किसी विषय में मत साम्य होने की दशा में सभापति का दूसरा या निर्णायक मत होगा।

२०७- उप- समितियां नियुक्त करने की शक्ति- (१) इन नियमों के अन्तर्गत इनमें से कोई भी समिति किन्हीं ऐसे विषयों की जो उसे निर्दिष्ट किये जायं, जांच करने के लिये एक या अधिक उप समितियां नियुक्त कर सकेगी जिनमें से प्रत्येक को अविभक्त समिति की शक्तियां प्राप्त होंगी और ऐसी उप-समितियों के प्रतिवेदन सम्पूर्ण समिति के प्रतिवेदन समझे जायेंगे, यदि वे सम्पूर्ण समिति के किसी उपवेशन में अनुमोदित हो जायं।

(२) उप-समिति के निर्देश-पत्र में अनुसंधान के लिये विषय या विषयों का स्पष्टतया उल्लेख होगा। उप-समिति के प्रतिवेदन पर सम्पूर्ण समिति द्वारा विचार किया जायेगा।

२०८- समिति के उपवेशन- समिति के उपवेशन ऐसे समय और दिन में होंगे जो समिति के सभापति द्वारा निर्धारित किया जाय: परन्तु यदि समिति का सभापति सुगमतया उपलब्ध न हो अथवा उनका पद रिक्त हो हो तो प्रमुख सचिव उपवेशन का दिन और समय निर्धारित कर सकेंगे।

२०९- समिति के उपवेशन उस समय हो सकेंगे जब सदन का उपवेशन हो रहा हो-
समिति के उपवेशन उस समय हो सकेंगे जब सदन का उपवेशन हो रहा हो:
परन्तु सदन में विभाजन की मांग होने पर समिति के सभापति समिति की कायर्वाहियों को ऐसे समय तक के लिये निलम्बित कर सकेंगे जो उनकी राय में सदस्यों को विभाजन में मतदान करने का अवसर दे सकें।

२१०- उपवेशनों का स्थान- समिति के उपवेशन, विधान भवन, लखनऊ में किये जायेंगे और यदि यह आवश्यक हो जाय कि उपवेशन का स्थान विधान भवन के बाहर परिवर्तित किया जाय तो यह मामला अध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जायगा जिनका विनिश्चय अन्तिम होगा।

२११- साक्ष्य लेने व पत्र-अभिलेख अथवा दस्तावेज मांगने की शक्ति-

(१) किसी साक्षी को प्रमुख सचिव के हस्ताक्षरित आदेश द्वारा आहूत किया जा सकेगा और वह ऐसे दस्तावेजों को पेश करेगा जो समिति के उपयोग के लिये आवश्यक हों।

(२) यह समिति के स्वविवेक में होगा कि वह अपने समक्ष दिये गये किसी साक्ष्य को गुप्त या गोपनीय समझे।

(३) समिति के समक्ष रखा गया कोई दस्तावेज समिति के ज्ञान और अनुमोदन के बिना न तो वापस लिया जायेगा और न उसमें रूपान्तर किया जायेगा।

(४) समिति को शपथ पर साक्ष्य लेने और व्यक्तियों को उपस्थित कराने, पत्रों या अभिलेखों के उपस्थापन की अपेक्षा करने की शक्ति होगी, यदि उसके कतर्व्यों का पालन करने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझा जायः परन्तु शासन किसी दस्तावेज को पेश करने से इस आधार पर इन्कार कर सकेगा कि उसका प्रकट किया जाना राज्य के हित तथा सुरक्षा के प्रतिकूल होगा।

(५) समिति के समक्ष दिया गया समस्त साक्ष्य तब तक गुप्त एवं गोपनीय समझा जायेगा जब तक समिति का प्रतिवेदन सदन में उपस्थित न कर दिया जाय: परन्तु यह समिति के स्वविवेक में होगा कि वह किसी साक्ष्य को गुप्त एवं गोपनीय समझे, जिस दशा में वह प्रतिवेदन का अंश नहीं बनेगा।

२१२- पक्ष या साक्षी समिति के समक्ष उपस्थित होने के लिये अधिवक्ता नियुक्त कर सकता है- समिति किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व उसके द्वारा नियुक्त तथा समिति द्वारा अनुमोदित अधिवक्ता से कराये जाने की अनुमति दे सकेगी। इसी प्रकार कोई साक्षी समिति के समक्ष अपने द्वारा नियुक्त तथा समिति द्वारा अनुमोदित अधिवक्ता के साथ उपस्थित हो सकेगा।

२१३- साक्षियों की जांच की प्रक्रिया- समिति के सामने साक्षियों की जाँच निम्न प्रकार से की जायेगी :

(१) समिति किसी साक्षी को जाँच के लिये बुलाये जाने से पूर्व उस प्रक्रिया की रीति को तथा ऐसे प्रश्नों के स्वरूप को विनिश्चित करेगी जो साक्षी से पूछे जा सकें ।

(२) समिति के सभापति, इस नियम के उप नियम (१) में उल्लिखित प्रक्रिया के अनुसार साक्षी से पहले ऐसा प्रश्न या ऐसे प्रश्न पूछ सकेंगे जो वह विषय या तत्संबंधी किसी विषय के संबंध में आवश्यक समझें।

(३) सभापति समिति के अन्य सदस्यों को एक-एक करके कोई अन्य प्रश्न पूछने के लिये कह सकेंगे।

(४) साक्षी को समिति के सामने कोई ऐसी अन्य संगत बात रखने को कहा जा सकेगा जो पहले न आ चुका हो और जिन्हें साक्षी समिति के सामने रखना आवश्यक समझता हो।

(५) जब किसी साक्षी को साक्ष्य देने के लिये आहूत किया जाय तो समिति की कार्यवाही का शब्दशः अभिलेख रखा जायेगा।

(६) समिति के सामने दिया गया साक्ष्य समिति के सभी सदस्यों को उपलब्ध किया जा सकेगा।

२१४- समिति के प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर- समिति के प्रतिवेदन पर समिति की ओर से सभापति द्वारा हस्ताक्षर किये जायेंगे:
परन्तु यदि सभापति अनुपस्थित हों या सुगमतया न मिल सकते हों तो समिति की ओर से प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करने के लिये समिति कोई अन्य सदस्य चुनेगी।

२१५- उपस्थापन के पूर्व प्रतिवेदन का शासन को उपलब्ध किया जाना समिति, यदि वह ठीक समझे, तो वह अपने प्रतिवेदन की प्रतिलिपि को या उसके पूरे किये गये किसी भाग को सदन में उपस्थापित करने से पूर्व शासन को उपलब्ध कर सकेगी। ऐसे प्रतिवेदन जब तक सदन में उपस्थापित नहीं कर दिये जायेंगे तब तक गोपनीय समझे जायेंगे।

२१६- प्रतिवेदन का उपस्थापन- (१) समिति का प्रतिवेदन समिति के सभापति द्वारा या उस व्यक्ति द्वारा जिसने प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर किये हों या समिति के किसी सदस्य द्वारा जो सभापति द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत किये गये हों, या सभापति की अनुपस्थिति में या जब वह प्रतिवेदन उपस्थित करने में असमर्थ हों तो समिति द्वारा प्राधिकृत किसी सदस्य द्वारा उपस्थापित किया जायेगा और सदन के पटल पर रख दिया जायेगा ।

(२) प्रतिवेदन उपस्थित करने में सभापति या उसकी अनुपस्थिति में प्रतिवेदन उपस्थित करने वाले सदस्य यदि कोई अभ्युक्ति करे तो अपने आपको तथ्य के संक्षिप्त कथन तक सीमित रखेंगे या समिति द्वारा की गयी सिफारिशों की ओर सदन का ध्यान आकृष्ट करेंगे।

(३) संबंधित मंत्री या कोई मंत्री उसी दिन या किसी भावी दिनांक को जब तक के लिये वह विषय स्थगित किया गया है, सरकारी दृष्टिकोण और शासन द्वारा किये जाने वाले प्रस्तावित कार्य की व्याख्या करते हुए संक्षिप्त उत्तर दे सकेंगे।

(४) प्रतिवेदन उपस्थित किये जाने के उपरान्त किन्तु उपस्थिति की तिथि से १५ दिन के भीतर मांग किये जाने पर, अध्यक्ष यदि उचित समझें तो उस प्रतिवेदन पर विचार के लिये समय नियत करेंगे। सदन के समक्ष न कोई औपचारिक प्रस्ताव होगा और न मत लिये जायेंगे।

२१७- सदन में उपस्थापन से पूर्व प्रतिवेदन का प्रकाशन या परिचालन- अध्यक्ष, उनसे प्रार्थना किये जाने पर और जब सदन सत्र में न हो समिति के प्रतिवेदन के प्रकाशन या परिचालन का आदेश दे सकेंगे यद्यपि वह सदन में उपस्थापित न किया गया हो। ऐसी अवस्था में प्रतिवेदन आगामी सत्र में प्रथम सुविधाजनक अवसर पर उपस्थापित किया जायगा।

२१८- प्रक्रिया के संबंध में सुझाव देने की शक्ति- (१) समिति की अध्यक्ष के विचारार्थ उस समिति से संबंधित प्रक्रिया के विषयों पर संकल्प पारित करने की शक्ति होगी जो प्रक्रिया में ऐसे परिवर्तन कर सकेंगे जिन्हें वे आवश्यक समझें।

(२) इन समितियों में से कोई अध्यक्ष के अनुमोदन से इन नियमों में सन्निहित उपबन्धों को क्रियान्वित करने के लिये प्रक्रिया के विस्तृत नियम बना सकेंगी।

२१९- प्रक्रिया के विषय में या अन्य विषय में निर्देश देने की अध्यक्ष की शक्ति- (१) अध्यक्ष समय-समय पर समिति के सभापति को ऐसे निर्देश दे सकेंगे जिन्हें वे उसकी प्रक्रिया और कार्य के संगठन के विनियमन के लिये आवश्यक समझें।

(२) यदि प्रक्रिया के विषय में या अन्य किसी विषय में कोई संदेह उत्पन्न हो तो सभापति यदि ठीक समझें तो उस विषय को अध्यक्ष को निर्दिष्ट कर देंगे जिनका विनिश्चय अन्तिम होगा।

२२०-समिति का समाप्त कार्य- कोई समिति जो सदन के विघटन से पूर्व अपना कार्य समाप्त करने में असमर्थ हो तो वह सदन को प्रतिवेदन देगी कि समिति अपना कार्य समाप्त करने में समर्थ नहीं हो सकी है। कोई प्रारम्भिक प्रतिवेदन, ज्ञापन या टिप्पणी जो समिति ने तैयार की हो या कोई साक्ष्य जो समिति ने लिया हो वह नयी समिति को उपलब्ध कर दिया जायगा।

२२१-प्रमुख सचिव, समितियों का पदेन प्रमुख सचिव होगा- प्रमुख सचिव इन नियमों के अन्तर्गत नियुक्त समस्त समितियों के पदेन प्रमुख सचिव होंगे।

२२२-समितियों के सामान्य नियमों की प्रवृत्ति- किसी विशेष समिति के लिये जब तक अन्यथा विशेष रूप से उपबन्धित न हो इस अध्याय के सामान्य नियम के उपबन्ध सब समितियों पर प्रवृत्त होंगे।

(ख) कार्य-मंत्रणा समिति

२२३- समिति का गठन- (१) अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित एक समिति होगी जिसे कार्य-मंत्रणा समिति कहा जायगा। जिसमें अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को सम्मिलित करके १५ से अनधिक सदस्य होंगे। अध्यक्ष इस समिति के पदेन सभापति होंगे।

(२) यदि किसी कारण से अध्यक्ष समिति के उपवेशन में पीठासीन होने में असमर्थ हों तो उपाध्यक्ष उस बैठक के सभापति होंगे। यदि किसी कारणवश ये दोनों ही पीठासीन होने में असमर्थ हों तो अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से उस उपवेशन के लिये सभापति नाम-निर्देशित करेंगे।

२२४- समिति के कृत्य- (१) समिति का यह कृत्य होगा कि वह ऐसे विधेयकों तथा अन्य सरकारी कार्य के प्रक्रम या प्रक्रमों पर चर्चा के लिये समय नियत करने के सम्वन्ध में सिफारिश करें, जिन्हें अध्यक्ष सदन-नेता के परामर्श से समिति को निर्दिष्ट करने के लिये निर्देश दें।

(२) समिति को प्रस्थापित समय-सूची में यह दर्शाने की शक्ति होगी कि विधेयक या अन्य सरकारी कार्य के विभिन्न प्रक्रम किस समय पूरे होंगे।

(३) समिति के लिये सदन के कार्य से सम्बन्धित ऐसे अन्य कृत्य भी निर्दिष्ट किये जा सकेंगे जिन्हें अध्यक्ष समय-समय पर विनिश्चित करें।

२२५- समिति के प्रतिवेदन- किसी विधेयक या विधेयक समूह या अन्य कार्य के संबंध में समिति द्वारा सिफारिश की गयी समय-सारिंणी की सूचना साधारणतया सदस्यों को पत्र द्वारा, सदन को अध्यक्ष द्वारा प्रतिवेदन किये जाने से कम से कम एक दिन पूर्व दी जायेगी।

२२६- समय का बंटवारा- (१) सदन को सूचित किये जाने के बाद यथासम्भव शीध्र अध्यक्ष द्वारा, नाम-निर्दिष्ट समिति के किसी भी सदस्य द्वारा यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकेगा:
"कि यह सदन समिति द्वारा प्रस्थापित समय के बंटवारे को स्वीकार करता है"।

(२) जब ऐसा प्रस्ताव सदन द्वारा स्वीकृत हो जाय तो वह उसी प्रकार प्रभावी होगा जैसे कि वह सदन का आदेश हो:
परन्तु यह संशोधन प्रस्तुत किया जा सकेगा कि प्रतिवेदन या तो बिना परिसीमा के या किसी विशेष विषय के संबंध में समिति को पुर्निर्दिष्ट कर दिया जाय:
किन्तु प्रस्ताव पर चर्चा के लिये आधे घंटे से अधिक समय नियत नहीं किया जायेगा और कोई सदस्य ऐसे प्रस्ताव पर पांच मिनट से अधिक नहीं बोलेंगे ।

२२७- निश्चित समय पर अवशिष्ट विषयों का निस्तारण- सदन के संकल्प के अनुसार निश्चित समय पर किसी विधेयक के किसी विशेष प्रक्रम अथवा अन्य कार्य को पूरा करने के लिये अध्यक्ष विधेयक के उस प्रक्रम अथवा अन्य कार्य से सम्बन्धित समस्त अवशिष्ट विषयों को निपटाने के लिये प्रत्येक आवश्यक प्रश्न तुरन्त रखेंगे ।

२२८- समय के बंटबारे में परिवर्तन- सदन द्वारा विनिश्चित समय-सूची में कोई परिवर्तन नहीं किया जायगा जब तक कि सदन नेता द्वारा प्रार्थना न की जाय और उस दशा में वह मैखिक रूप से सदन को अभिसूचित करेंगे कि ऐसे परिवर्तन के लिये सामान्य सहमति है और अध्यक्ष सदन का अभिप्राय जानकर उस परिवर्तन को प्रवर्तित करेंगे।

(ग) लोक लेखा समिति

२२९- समिति का गठन- (१) राज्य के विनियोग-लेखे और उन पर भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन, राज्य के वार्षिक वित्तीय विवरण या ऐसे अन्य लेखों या वित्तीय विषयों की जो उसके सामने रखे जायं या उसको निर्दिष्ट किये जायं या समिति जिनकी जांच करना आवश्यक समझे, जांच करने के लिये एक लोक लेखा समिति होगी।

(२) लोक लेखा समिति में २१ से अनधिक सदस्य होंगे जो प्रत्येक वर्ष सदन द्वारा उसके सदस्यों में से अनुपाती प्रतिनिधित्व सिद्धान्त के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित किये जायंगे : परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किए जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

(३) सभापति समिति के सदस्यों में से निर्वाचित किया जायगा।

२३०- समिति के कृत्य- (१) राज्य के विनियोग लेखे और उन पर भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन का निरीक्षण करते समय लोक- लेखा समिति का यह कर्त्तव्य़ होगा कि वह अपना समाधान कर ले कि-

(क) जो धन लेखे में व्यय के रूप में प्रदर्शित किया गया है वह उस सेवा या प्रयोजन के लिये विधिवत उपलब्ध और लगाये जाने योग्य था जिसमें वह लगाया या भारित किया गया है,

(ख) व्यय प्राधिकार के अनुरूप है, जिसके वह अधीन है, और

(ग) प्रत्येक पुनर्विनियोग ऐसे नियमों के अनुसार किया गया है जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा विहित किये गये हों।

(२) लोक लेखा समिति का यह भी कर्त्तव्य़ होगा- (क) राज्य व्यापार तथा निर्मांण योजनाओं की आय तथा व्यय दिखाने वाले लेखा विवरणों को तथा संतुलन-पत्रों और लाभ तथा हानि के लेखों के ऐसे विवरणों की जाँच करना जिन्हें तैयार करने की राज्यपाल ने अपेक्षा की हो, जो किसी विशेष राज्य व्यापार संस्था या परियोजना के लिये वित्तीय व्यवस्था विनियमित करने वाले संविहित नियमों के उपबन्धों के अन्तर्गत तैयार किये गये हों, और उन पर नियंत्रक महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन की जांच करना,

(ख) स्वायत्तशासी तथा अर्धस्वायत्तशासी निकायों की आय तथा व्यय दिखाने वाले लेखा विवरण की जांच करना, जिसकी लेखा परीक्षा भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक द्वारा राज्यपाल के निर्देशों के अन्तर्गत या किसी संविधि के अनुसार कही जा सके, और

(ग) उन मामलों में नियंत्रक महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन पर विचार करना जिनके संबंध में राज्यपाल ने उससे किन्हीं प्राप्तियों की लेखा परीक्षा करने की या भण्डार के और स्कन्धों के लेखों की परीक्षा करने की अपेक्षा की हो।

(३) ऐसे समस्त कृत्य जो राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों निगमों से संबंधित हों, लोक-लेखा समिति के अधिकार क्षेत्र व कृत्यों के बाहर होंगे।

(घ) प्राक्कलन समिति

२३१- समिति का गठन- (१) ऐसे प्राक्कलनों की परीक्षा के लिये जो समिति को ठीक प्रतीत हों या उसे सदन द्वारा विशेष रूप से निर्दिष्ट किये जायें, एक प्राक्कलन समिति होगी।

(२) समिति में २५ से अनधिक सदस्य होंगे, जो सदन द्वारा प्रत्येक वर्ष उसके सदस्यों में से अनुपाती प्रतिनधित्व सिद्वान्त के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे:
परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त जायें तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे ।

२३२- समिति के कृत्य- (१) समिति के कृत्य ये होंगे:- (क) प्राक्कलनों में अन्तर्निहित नीति से संगत क्या मितव्ययितायें, संगठन में सुधार, कार्यपटुता या प्रशासनिक सुधार किये जा सकते हैं; इस संबंध में प्रतिवेदित करना;

(ख) प्रशासन में कार्यपटुता और मितव्ययिता लाने के लिये वैकल्पिक नीतियों का सुझाव देना;

(ग) प्राक्कलनों मे अन्तर्निहित नीति की सीमा में रहते हुए धन ठीक ढंग से लगाया गया है या नहीं, इसकी जांच करना, तथा

(घ) प्राक्कलन किस रूप में सभा में उपस्थित किये जायेंगे, इसका सुझाव देना।

(२) समिति प्राक्कलनों की जांच वित्तीय वर्ष के भीतर समय-समय पर जारी रख सकेगी और जैसे-जैसे वह जांच करती जाय, सदन को प्रतिवेदित कर सकेगी। समिति के लिये यह अनिवार्य न होगा कि किसी एक वर्ष के समस्त प्राक्कलनों की जांच करे। इस बात के होते हुए भी कि समिति ने कोई प्रतिवेदन नहीं दिया है अनुदानों की मांगों पर अन्तिम रूप से मतदान हो सकेगा।

(घ) सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति

२३२-क-समिति के कृत्य- राज्य के सभी सार्वजनिक उपक्रमों तथा निगमों के कार्य-संचालन की जांच करने के उत्तर प्रदेश विधान मण्डल की सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति होगी।
इस समिति के निम्नांकित कृत्य होंगे:-

(क) उपरोक्त सार्वजनिक उपक्रमों तथा निगमों की आय तथा व्यय दिखाने वाले लेखा विवरणों की तथा संतुलन-पत्रों और लाभ एवं हानि के लेखों के ऐसे विवरणों की जांच करना जिन्हें तैयार करने की राज्यपाल ने अपेक्षा की हो या जो किसी विशेष सार्वजनिक उपक्रमों या निगम के लिये वित्तीय व्यवस्था विनियमित करने वाले संविहित नियमों के उपबन्धों के अन्तर्गत तैयार किये गये हों और उन पर महालेखाकार, उत्तर प्रदेश द्वारा दिये गये प्रतिवेदनों की, यदि कोई हों, जांच करना।

(ख) उपरोक्त उपक्रमों एवं निगमों की स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए उनकी दक्षता की जांच ऐसे दृष्टिकोण से करना कि क्या उनका प्रबन्ध ठोस व्यावसायिक सिद्धान्तों तथा व्यापारिक कार्य प्रणाली के अनुसार किया जा रहा है ।

(ग) उपरोक्त उपक्रमों एवं निगमों के सम्बन्ध में ऐसे अन्य कर्त्तव्य़ जो अन्यथा लोक लेखा समिति और प्राक्कलन समिति के कार्य क्षेत्र में आते हों और जिन्हें विधान सभा के अध्यक्ष इस समिति को समय-समय पर निर्दिष्ट करें: किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि समिति निम्नलिखित मामलों की जांच नहीं करेगी:

(१) शासन की नीति के प्रमुख मामले जो सार्वजनिक उपक्रमों के व्यावसायिक कार्यों से भिन्न हों,

(२) दिन-प्रतिदिन के प्रशासनिक मामले,

(३) ऐसे मामले जो सम्बन्धित सार्वजनिक उपक्रम/ निगम की स्थापना करने वाले अधिनियम द्वारा किसी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निस्तारित किये जाने हों।

२३२-ख-समिति का गठन- समिति में सभापति को शामिल करते हुए ३५ सदस्य होंगे, जिनमें से २५ सदस्य विधान सभा के और १० सदस्य विधान परिषद् के होंगे, जो प्रत्येक सदन के सदस्यों में से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्वान्त के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे: परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नहीं होंगे, और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायें तो ऐसी नियुक्ति की तिथि से उनकी समिति की सदस्यता समाप्त हो जायेगी।

२३२-ग-समिति के सभापति की नियुक्ति- समिति के सभापति की नियुक्ति विधान सभा के अध्यक्ष द्वारा की जायगी। समिति की बैठक करने के लिये गणपूरक संख्या समिति के सदस्यों की कुल संख्या की एक तिहाई होगी।

२३२-घ-समिति का प्रतिवेदन- समिति विधान मण्डल के दोनों सदनों को समय-समय पर पूर्वोक्त सभी या किसी विषय के सम्बन्ध में प्रतिवेदन देगी ।

२३२-ङ-सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति के अधिकार क्षेत्र का विनिश्चय- यदि यह प्रश्न उत्पन्न हो कि कोई विषय सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है अथवा नहीं, तो यह मामला अध्यक्ष, विधान सभा को निर्दिष्ट किया जायेगा और उनका विनिश्चय अन्तिम होगा।

(ङ) सरकारी आश्वासन सम्बन्धी समिति

२३३- समिति का गठन और उसके कृत्य- मंत्रियों द्वारा समय-समय पर सदन के अन्दर दिये गये आश्वासनों, प्रतिज्ञाओं, वचनों आदि की छानबीन करने के लिये और निम्न बातों पर प्रतिवेदन करने के लिये सरकारी आश्वासनों सम्बन्धी एक समिति होगी, जिसमें अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित १५ से अनधिक सदस्य होंगे-

(क) ऐसे आश्वासनों, प्रतिज्ञाओं, वचनों आदि का कहां तक परिपालन किया गया है, तथा

(ख) जहां परिपालन किया गया है, तो ऐसा परिपालन उस प्रयोजन के लिए आवश्यक न्यूनतम समय के भीतर हुआ है, या नही :
परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

(च) याचिका समिति

२३४-समिति का गठन- अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित १५ से अनधिक सदस्यों की एक याचिका समिति होगी:-
परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

२३५- याचिका किसको सम्बोधित की जाय और कैसे समाप्त की जाय- प्रत्येक याचिका सदन को सम्बोधित की जायेगी और जिस विषय से उसका सम्बन्ध हो उसके बारे में याचिका देने वाले के निश्चित उद्देश्य का वर्णन करने वाली प्रार्थना के साथ समाप्त होगी ।

२३६- याचिकाओं की व्याप्ति- अध्यक्ष की सम्मति से निम्न पर याचिकायें उपस्थित या प्रस्तुत की जा सकेंगी-

(१) ऐसा विधेयक जो नियम ११४ के अन्तर्गत प्रकाशित हो चुका हो या जो सदन में पुरःस्थापित हो चुका हो,

(२) सदन के सामने लम्बित कार्य से सम्बन्धित कोई विषय, और

(३) सामान्य लोक हित का कोई विषय परन्तु वह ऐसा न होः-

(क) जो भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय या किसी जांच न्यायालय या किसी संविहित न्यायाधिकरण या प्राधिकारी या किसी अर्ध-न्यायिक निकाय या आयोग के संज्ञान में हो,

(ख) जिसके लिए विधि के अन्तर्गत उपचार उपलब्ध है और विधि में नियम, विनियम, उप विधि सम्मिलित हैं जो संघ या राज्य शासन या किसी ऐसे प्राधिकारी द्वारा बनाया गया हो जिसे ऐसे नियम, विनियम आदि बनाने की शक्ति प्रत्यायोजित हो।

२३७- याचिका का सामान्य प्रपत्र- (१) प्रत्येक याचिका सम्मानपूर्ण, शिष्ट और संयत भाषा में लिखी जायेगी।

(२) प्रत्येक याचिका हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में होगी और उस पर याचिका देने वाले के हस्ताक्षर होंगे।

२३८- याचिका के हस्ताक्षरकर्ताओं का प्रमाणीकरण- याचिका के प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता का पूरा नाम और पता उसमें दिया जायेगा और वह विधिवत प्रमाणीकृत होगा।

२३९- किसी याचिका के साथ दस्तावेज नहीं लगाये जायेंगे- किसी याचिका के साथ कोई पत्र¸ शपथ-पत्र या अन्य दस्तावेज नहीं लगाये जायेंगे।

२४०- प्रतिहस्ताक्षर- (१) प्रत्येक याचिका किसी सदस्य द्वारा उपस्थापित एवं प्रतिहस्ताक्षरित होगी।

२४१- उपस्थापन की सूचना- सदस्य प्रमुख सचिव को याचिका उपस्थित करने के अपने मन्तव्य की कम से कम दो दिन की पूर्व सूचना देंगे।

२४२- याचिका का प्रपत्र- याचिका उपस्थित करने वाले सदस्य अपने को निम्न रूप के कथन तक ही सीमित रखेंगे:- "मैं ...........................................के संबंध में याचिका देने वाले (लोगों) द्वारा हस्ताक्षरित याचिका उपस्थित करता हूं। " और इस कथन पर किसी वाद-विवाद की अनुज्ञा नहीं होगी।

२४३- याचिका के उपस्थापन के बाद प्रक्रिया- (१) प्रत्येक याचिका इन नियमों के अधीन उपस्थित किये जाने के उपरान्त समिति को जांच के लिये निर्दिष्ट की जायेगी।

(२) जांच के उपरान्त समिति, यदि आवश्यक हो, तो यह निर्देश दे सकेगी कि याचिका सविस्तार अथवा संक्षिप्त रूप में परिचालित की जाय।

(३) परिचालन और साक्ष्य, यदि कोई हों, के उपरान्त समिति के सभापति या समिति के कोई सदस्य याचिका में की गयी विशिष्ट शिकायत और इस विशिष्ट मामले में प्रतिकारक उपायों या भविष्य में ऐसे मामले रोकने के लिये सुझाव सदन को प्रतिवेदित करेंगे।

(छ) प्रतिनिहित विधायन समिति

२४४- समिति का गठन और कृत्य- अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित पन्द्रह से अनधिक सदस्यों की एक प्रतिनिहित विधायन समिति इस बात की छानबीन करने और सदन को प्रतिवेदन करने के लिये होगी कि क्या संविधान द्वारा प्रदत्त या अन्य वैध प्राधिकारी द्वारा प्रत्यायोजित विनियम, नियम, उप नियम उप विधि आदि बनाने की शक्ति का प्रयोग ऐसे प्रत्यावेदन के अन्तर्गत उचित रूप से किया जा रहा है:
परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायें तो वे ऐसी नियुक्ति के दिनांक से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

२४५- समिति के कर्तव्य- समिति विशेष रूप से इस बात पर विचार करेगी-

(१) कि प्रतिनिहित विधान, संविधान अथवा उस अधिनियम के सामान्य उददेश्यों के अनुकूल है या नहीं जिसके अनुसरण में वह बनाया गया है;

(२) उसमें ऐसा विषय अन्तर्विष्ट है या नहीं जिसको समुचित ढंग से निबटाने के लिये समिति की राय में से विधान मण्डल का अधिनियम होना चाहिये ;

(३) उसमें कोई करारोपण अन्तर्विष्ट है या नहीं ;

(४) उसमें न्यायालय के क्षेत्राधिकार में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रुकावट होती है या नहीं ;

(५) वह उन उपबन्धों में से किसी को गतापेक्षक प्रभाव देता है या नहीं जिनके संबंध में संविधान या अधिनियम स्पष्ट रूप से ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है ;

(६) उसमें राज्य की संचित निधि या लोक राजस्व में से व्यय अन्तर्विष्ट है या नहीं ;

(७) उसमें संविधान या उस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों का असामान्य अथवा अप्रत्याशित उपयोग किया गया प्रतीत होता है या नहीं, जिसके अनुसरण में वह बनाया गया है ;

(८) उसके प्रकाशन में या विधान मण्डल के समक्ष रखे जाने में अनुचित विलम्ब हुआ प्रतीत होता है या नहीं ;

(९) किसी कारण से उसके रूप या अभिप्राय के लिये किसी विशुद्धीकरण की आवश्यकता है या नही।

२४६- समिति का प्रतिवेदन- यदि समिति की राय हो कि ऐसा कोई विधान पूर्णतः या अंशतः रदद कर दिया जाना चाहिये या उसमें किसी प्रकार का संशोधन किया जाना चाहिये तो वह उक्त राय तथा उसका कारण सदन को प्रतिवेदित करेगी। यदि समिति की राय हो कि किसी प्रतिनिहित विधान से संबंधित कोई अन्य विषय सदन की सूचना में लाया जाना चाहिये तो वह उक्त राय तथा विषय सदन को प्रतिवेदित कर सकेगी।

(ज) नियम समिति

२४७- समिति का गठन- उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमावली के संबंध में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को सम्मिलित करके १५ से अनधिक सदस्यों की एक समिति होगी, शेष सदस्य अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित किये जायेंगे।

२४८- समिति के कृत्य- समिति के कृत्य यह होंगे कि वह सदन की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन के विषय पर विचार करे और उसके नियमों में ऐसे संशोधनों तथा वृद्धियों की सिफारिश करे जो आवश्यक समझे जायें।

 

२४९- नियमों में संशोधन की सूचना- कोई सदस्य इस नियमावली के नियमों में संशोधनों की सूचना दे सकेंगे, किन्तु ऐसी सूचना के साथ संशोधन के उददेश्य और कारणों का विवरण संलग्न होगा। अध्यक्ष ऐसी सूचना के प्राप्त होने पर यदि वह अनियमित न हो, उसे नियम समिति के विचारार्थ निर्दिष्ट करेंगे।

२५०- समिति का सभापति- अध्यक्ष इस समिति के पदेन सभापति होंगे। यदि अध्यक्ष किसी कारण से समिति के सभापति के रूप में कार्य करने में असमर्थ हों तो उपाध्यक्ष उस उपवेशन के सभापति होंगे। यदि वे दोनों ही किसी कारण से पीठासीन होने में असमर्थ हों तो अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से किसी को उस बैठक का सभापति नाम-निर्देशित करेंगे।

२५१- नियमावली में संशोधन की प्रक्रिया- (क) समिति की सिफारिश सदन के पटल पर रखी जायेगी और इस प्रकार पटल पर रखे जाने के दिन से आरम्भ होकर १४ दिन की कालावधि के भीतर कोई सदस्य ऐसी सिफारिशों में किसी संशोधन, जिसमें समिति की सभी या किसी सिफारिश को समिति के पुनर्विचारार्थ निर्दिष्ट किये जाने का प्रस्ताव भी सम्मिलित है, की सूचना संशोधन करने के उद्देश्य और कारणों सहित दे सकेंगे।

(ख) यदि उप नियम (क) में उल्लिखित कालावधि के भीतर समिति की सिफारिशों में संशोधन की सूचना न दी जाय तो उस अवधि की समाप्ति पर समिति की सिफारिशें सदन द्वारा स्वीकृत समझी जायेंगी और नियमों में सम्मिलित कर ली जायेंगी।

(ग) यदि उप नियम (क) में विहित कालावधि के भीतर किसी संशोधन की सूचना प्राप्त हो तो अध्यक्ष ऐसे संशोधनों को जो ग्राह्य हों, समिति को निर्दिष्ट कर देंगे और समिति ऐसे संशोधनों पर विचार करके अपनी सिफारिशों में ऐसा परिवर्तन कर सकेगी जो वह उचित समझें।

(घ) उप नियम (ग) में उल्लिखित संशोधनों पर विचार करने के उपरान्त समिति का अंतिम प्रतिवेदन सदन के पटल पर १० दिन तक रखा जायगा और यदि इस कालावधि के भीतर समिति द्वारा पुनर्विचारोपरान्त किये गये निर्णयों में किसी संशोधन की सूचना कारण और उद्देश्य सहित प्राप्त हो तो अध्यक्ष ऐसे संशोधन को, जो ग्राह्य हो, सदन के विचारार्थ रखेंगे, अन्यथा समिति का प्रतिवेदन सदन, द्वारा स्वीकृत समझा जायगा और प्रतिवेदन में की गयी सिफारिशें नियमावली में सम्मिलित कर ली जायेंगी।

(झ) प्रवर समिति

२५२- प्रवर समिति का गठन- (१) किसी विधेयक पर प्रवर समिति के सदस्य, सदन द्वारा तब नियुक्त किये जायेंगे जब किसी विधेयक को प्रवर समिति को निर्दिष्ट करने का प्रस्ताव किये जाने के उपरान्त स्वीकृत हो जाये।

(२) प्रवर समिति में निम्न प्रकार १९ सदस्य होंगे- १- विधेयक भार साधक मंत्री,

२- विधेयक भार साधक सदस्य, यदि कोई हो,

३- वह सदस्य जिसके प्रस्ताव पर विधेयक प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया गया हो,

४- यथास्थिति सभा के १६, १७ या १८ सदस्य होंगे जो कि अनुपाती प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे।

२५३- प्रवर समिति में प्रक्रिया- प्रवर समिति में प्रक्रिया ऐसे अनुकूलनों के साथ जो चाहे रूप-भेद के हों अथवा अंश जोड़कर या निकाल कर किये गये हों जैसा अध्यक्ष आवश्यक या सुविधाजनक समझें, यथासाध्य वही होगी, जिसका सदन में विधेयक के विचार प्रक्रम के दौरान अनुसरण किया जाता है।

 

२५४- प्रवर समिति के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य सदस्यों द्वारा संशोधनों की सूचना- जब कोई विधेयक प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया जा चुका हो, तो उसके किसी खण्ड में संशोधन की, किसी सदस्य द्वारा दी गयी सूचना स्वतः प्रवर समिति को निर्दिष्ट हुई समझी जायगी :
परन्तु यदि संशोधन की सूचना किसी ऐसे सदस्य से प्राप्त हुई हो जो प्रवरसमिति के सदस्य न हों, तो ऐसे संशोधन समिति द्वारा तब तक नहीं लिये जायेंगे जब तक कि वे समिति के किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत न किये गये हों।

२५५- समिति की साक्ष्य लेने की शक्ति- प्रवर समिति विशेष साक्ष्य को उन विशेष हितों के प्रतिनिधियों के बयान सुन सकेगी जिन पर उसके समक्ष विधान का प्रभाव पड़ता हो।

२५६- प्रवर समिति के समक्ष दिये गये साक्ष्य का मुद्रण तथा प्रकाशन- (१) प्रवर समिति की चर्चायें उसके उपवेशन में उपस्थित किसी व्यक्ति द्वारा प्रकट नहीं की जायेंगी और ऐसी चर्चाओं का कोई निर्देश सदन में नहीं किया जायेगा।

(२) प्रवर समिति के समक्ष दिया गया साक्ष्य प्रवर समिति के सब सदस्यों को उपलब्ध किया जा सकेगा।

(३) समिति निर्देश दे सकेगी कि सम्पूर्ण साक्ष्य या उसका कोई अंश या उसका सारांश पटल पर रख दिया जाय।

(४) प्रवर समिति के सामने दिया गया साक्ष्य प्रवर समिति के किसी सदस्य या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तब तक प्रकाशित नहीं किया जायेगा जब तक वह पटल पर न रख दिया गया हो: परन्तु अध्यक्ष, स्वविवेक से निर्देश दे सकेंगे कि ऐसा साक्ष्य पटल पर औपचारिक रूप से रखे जाने से पहले सदस्यों को गुप्त रूप से उपलब्ध कर दिया जाय।

२५७- समिति के विनिश्चयों का अभिलेख- प्रवर समिति के विनिश्चयों का अभिलेख रखा जायगा और सभापति के निर्देश के अधीन समिति के सदस्यों में परिचालित किया जायगा।

२५८- प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदन- (१) विधेयक के प्रवर समिति को निर्दिष्ट किये जाने के बाद शीध्र ही प्रवर समिति विधेयक पर विचार करने के लिये समय-समय पर समवेत होगी और सदन द्वारा निश्चित समय के भीतर उस पर प्रतिवेदन देगी: परन्तु जब सदन ने प्रतिवेदन उपस्थापन के लिये समय निश्चित न किया हो तो प्रतिवेदन उस तिथि से तीन मास समाप्त होने से पहले उपस्थित कर दिया जायेगा, जिस तिथि को सदन ने प्रवर समिति को विधेयक निर्दिष्ट किये जाने का प्रस्ताव स्वीकार किया था:

 

किन्तु सदन किसी भी समय, प्रस्ताव किये जाने पर निर्देश दे सकेगा कि प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदन के उपस्थापन के लिये समय प्रस्ताव में उल्लिखित तिथि तक बढ़ा दिया जाय।

 

(२) प्रतिवेदन प्रारम्भिक या अन्तिम हो सकेंगे।

(३) प्रवर समिति अपने प्रतिवेदन में यह बतायेगी कि इन नियमों के निर्देशों के अनुसार विधेयक का प्रकाशन हो चुका है या नहीं और प्रकाशन किस तिथि को हुआ है।

(४) जब विधेयक में रूपान्तर किया गया हो, तो प्रवर समिति, यदि वह ठीक समझे, अपने प्रतिवेदन में विधेयक के भार साधक सदस्य के लिये यह सिफारिश सम्मिलित कर सकेगी कि उनका अगला प्रस्ताव परिचालन का प्रस्ताव होना चाहिए या जब विधेयक पहले ही परिचालित किया जा चुका हो, तो पुनः परिचालन का।

२५९- सदस्य द्वारा अभिलिखित विमति टिप्पणी- (१) प्रवर समिति के कोई सदस्य विधेयक से सम्बन्धित या प्रतिवेदन में दिये गये किसी विषय या विषयों पर विमति टिप्पणी अभिलिखित कर सकेंगे।

(२) विमति टिप्पणी संयत और शिष्ट भाषा में लिखी जायगी और न उसमें प्रवर समिति में की गयी चर्चा का निर्देश किया जायगा और न समिति पर आक्षेप किया जायगा।

(३) यदि अध्यक्ष की राय में किसी विमति टिप्पणी में ऐसे शब्द, वाक्यांश या पदावलियां हों जो असंसदीय या अन्यथा अनुपयुक्त हों तो वे ऐसे शब्दों, वाक्यांशों या पदावलियों को विमति टिप्पणियों में से निकाल दिये जाने का आदेश दे सकेंगे।

(४) विमति टिप्पणी यदि कोई हो, प्रतिवेदन का अंश बनेगी।

२६०- प्रतिवेदन का मुद्रण तथा प्रकाशन- प्रमुख सचिव प्रवर समिति के प्रत्येक प्रतिवेदन को मुद्रित करायेंगे और प्रतिवेदन की एक प्रति सदन के प्रत्येक सदस्य के उपयोग के लिये उपलब्ध की जायेगी। प्रतिवेदन तथा विधेयक यदि संशोधित किया गया हो, प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में, गजट में प्रकाशित किया जायगा और संशोधित विधेयक की एक प्रति प्रत्येक सदस्य को दी जायगी।

(ञ) संयुक्त प्रवर समिति

२६१- संयुक्त प्रवर समिति का गठन- जब तक कि दोनों सदन परस्पर करार द्वारा अन्यथा कोई विनिश्चय न कर ले, संयुक्त प्रवर समिति में सदस्यों की संख्या निम्न प्रकार से २५ होगी-

(क) विधेयक भार साधक मंत्री;

(ख) विधेयक भार साधक सदस्य, यदि कोई हो;

(ग) वह सदस्य जिसके प्रस्ताव पर विधेयक संयुक्त प्रवर समिति को निर्दिष्ट किया गया हो ;

(घ) परिषद् के आठ सदस्य;

(ङ) यथास्थिति सभा के १४, १५ या १६ सदस्य जिनका निर्वाचन अनुपाती प्रतिनिधित्व के सिद्वान्त के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जायेगा।

२६२- संयुक्त प्रवर समिति की प्रक्रिया- संयुक्त प्रवर समिति में उसी प्रक्रिया का अनुसरण किया जायगा जो प्रवर समिति के लिये निर्धारित है और सदस्यों के निर्वाचन और समिति के सभापति की नियुक्ति और प्रतिवेदन का प्रस्तुत करना तथा उस पर विचार करने के विषय में प्रवर समिति के समस्त नियम यथोचित परिवर्तनों सहित संयुक्त प्रवर समिति पर भी प्रवृत होंगे।

(ट) विशेषाधिकार समिति

२६३- समिति का गठन- अध्यक्ष एक विशेषाधिकार समिति नाम-निर्देशित करेंगे, जिसमें उपाध्यक्ष को सम्मिलित करके कुल १० सदस्य होंगे। उपाध्यक्ष इस समिति के सभापति होंगे।

२६४- गणपूर्ति - समिति का उपवेशन गठित करने के लिये गणपूर्ति पांच होगी।
परन्तु साक्ष्य लेने के प्रयोजनार्थ उपवेशन गठित करने के लिये गणपूर्ति की आवश्यकता नहीं होगी।

२६५- विशेषाधिकार समिति द्वारा प्रश्नों की जांच तथा उसकी प्रक्रिया - (१) विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट होने पर उस व्यक्ति को जिसके विरूद्व शिकायत की गयी है प्रमुख सचिव द्वारा शिकायत की एक प्रति इस अनुरोध के साथ भेज दी जायेगी कि एक निश्चित तिथि तक, यदि वह चाहें तो, शिकायत के संबंध में अपना लिखित वक्तव्य प्रमुख सचिव को भेज दें। लिखित वक्तव्य प्रस्तुत करने की तिथि व्यतीत होने के उपरान्त समिति यदि आवश्यक समझे, तो जांच के हेतु शिकायत करने वाले व्यक्ति तथा उस व्यक्ति को, जिसके विरूद्व शिकायत की गयी हो, एक निश्चित तिथि, समय और स्थान पर अपने समक्ष उपस्थित होने के लिये बुला सकेगी।

(२) ऐसा व्यक्ति, यदि वह चाहे तो अधिवक्ता द्वारा भी अपना पक्ष समिति के समक्ष उपस्थित करा सकेगा।

(३) यदि उपस्थित होने के लिये अदिष्ट-पक्ष नियत तिथि पर उपस्थित होने में असमर्थ है तो वह समिति को उन कारणों की सूचना देगा। समिति दिये गये कारणों को देखते हुए उस विषय पर विचार स्थगित कर सकेगी जिससे कि वह पक्ष उपस्थित हो सके । किन्तु यदि समिति यह समझे कि अनुपस्थिति के समुचित कारण नहीं हैं या पक्ष जान-बूझकर अनुपस्थित रहा है तो समिति उस पक्ष के विरूद्व उसकी अनुपस्थिति में ही विषय पर विचार करके अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकेगी तथा उसके विरूद्व आदेश भंग की सूचना सदन के समक्ष उचित कार्यार्थ रख सकेगी।

२६६- समिति द्वारा प्रश्न की जांच- साक्ष्य के प्रकाश में और उस मामले की परिस्थितियों के अनुसार समिति उस समय प्रश्न की जांच करेगी और इस बात का निर्णय करेगी कि क्या किसी विशेषाधिकार की अवहेलना हुई है अथवा अवमान हुआ है तथा यह देखेगी कि किस प्रकार की अवहेलना हुई है और किन परिस्थितियों के कारण हुई है और ऐसी सिफारिशें करेगी जिन्हें वह ठीक समझें।

२६७- समिति के सदस्यों की निर्योग्तायें- शिकायत करने वाले सदस्य अथवा वह सदस्य जिनके विरूद्व शिकायत की गयी हो, यदि समिति के सदस्य हों तब तक समिति में नहीं बैठेंगे जब तक कि उनके द्वारा अथवा उनके विरूद्व यथास्थिति की गयी शिकायत का विषय समिति के समक्ष विचाराधीन हो।

२६८- विशेषाधिकार समिति का उपवेशन- विशेषाधिकार समिति विशेषाधिकार अथवा अवमान के प्रश्न के निर्दिष्ट किये जाने के उपरान्त यथाशीध्र और उसके बाद समय-समय पर जब तक कि यथास्थिति सदन अथवा अध्यक्ष द्वारा नियत समय के भीतर प्रतिवेदन प्रस्तुत न कर दिया जाय, समवेत होगी:
परन्तु जब प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के लिये कोई समय नियत न किया गया हो तो प्रतिवेदन निर्देशन के दिनांक से एक मास के भीतर प्रस्तुत किया जायेगा:
किन्तु अध्यक्ष अथवा सदन, यथास्थिति, समिति द्वारा प्रतिवेदन प्रस्तुत किये जाने की तिथि को समय-समय पर बढ़ा सकेंगे ।

२६९- समिति का प्रतिवेदन- समिति के प्रतिवेदन में यह दर्शाया जायगा कि क्या विशेषाधिकार की अवहेलना हुई है अथवा अवमान हुआ है और उसकी राय में क्या दण्ड दिया जाना चाहिए। यदि क्षमा मांगी गयी हो तो समिति यह भी सिफारिश कर सकेगी कि क्षमा याचना स्वीकार की जाये।

(ठ) प्रश्न एवं सन्दर्भ समिति

२६९-क-समिति का गठन- (१) अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित १५ से अनधिक सदस्यों की एक ‘प्रश्न एवं सन्दर्भ समिति’ होगी और उपाध्यक्ष इस समिति के पदेन सभापति होंगे।

(२) कोई मंत्री उप नियम (१) में उल्लिखित समिति के सदस्य नहीं होंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायें तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

(३) समिति का उपवेशन गठित करने के लिये न्यूनतम तीन सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक होगी।

२६९-ख-समिति के कृत्य- समिति का कार्य निम्नवत होगा:-

(क) यदि किसी प्रश्न का उत्तर शासन से समय से प्राप्त न हो अथवा प्राप्त उत्तर संतोषजनक न हो और अध्यक्ष ऐसा करना समीचीन समझें, तो वह उस मामले को प्रश्न एवं संदर्भ समिति को सन्दर्भित कर सकेंगे।

(ख) प्रश्नों के अतिरिक्त सदन से सम्बन्धित अन्य कोई मामला, जो नियमों के अन्तर्गत किसी अन्य समिति के क्षेत्राधिकार में न आता हो, अध्यक्ष द्वारा उक्त समिति को विचार हेतु सन्दर्भित किया जा सकेगा।

"(ड)" "अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा विमुक्त जातियों सम्बन्धी संयुक्त समिति"

२६९-ग-समिति का गठन- राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति गठित की जायेगी, जो "अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा विमुक्त जातियों सम्बन्धी संयुक्त समिति" कहलायेगी और उसमें २५ सदस्य होंगे जिनमें से २१ सदस्य, विधान सभा के तथा ४ सदस्य विधान परिषद् के होंगे। यह सदस्य प्रत्येक सदन के सदस्यों में से एकल संक्रमणीय मत (सिंगिल ट्रान्सफरेबिल वोट) द्वारा अनुपाती प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के अनुसार निर्वाचित होंगे।
’’परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।’’

२६९-घ-समिति के कृत्य- उक्त समिति के निम्नलिखित कृत्य होंगे:- (१) संविधान, विधियों तथा नियमावलियों एवं विभिन्न शासनादेशों द्वारा उक्त जातियों के हेतु प्रदत्त सेवाओं में आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं के कार्यान्वयन की प्रगति की जांच करना।

 

(२) इन वर्गों की दशा को कम से कम समय में सुधारने के लिये तथा शासन द्वारा निर्धारित नीतियों के उद्देश्यों को पूर्ण कराने हेतु सुझाव देना एवं उपाय बताना।

 

२६९-ङ-समिति का प्रतिवेदन- समिति विधान मण्डल के दोनों सदनों को समय-समय पर पूर्वोक्त सभी या किसी विषय के सम्बन्ध में प्रतिवेदन देगी।

"(ढ)" प्रदेश के स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों की जांच सम्बन्धी समिति

२६९-च-समिति का गठन- (१) राज्य के स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों की जांच हेतु इन संस्थाओं के वार्षिक वित्तीय विवरण या ऐसे अन्य लेखों या वित्तीय विषयों की जो उसके सामने रखे जायं या उसको निर्दिष्ट किये जायं या समिति जिनकी जांच करना आवश्यक समझे, जांच करने के लिये प्रदेश के स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों की जांच सम्बन्धी एक समिति होगी।

(२) स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों की जांच सम्बन्धी समिति में ११ से अनधिक सदस्य होंगे जो प्रत्येक वर्ष सदन द्वारा उसके सदस्यों में से अनुपाती प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे:
परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

२६९-छ-समिति के कृत्य - समिति के निम्नलिखित कृत्य होंगे:-

(१) परीक्षक, स्थानीय निधि लेखा, उत्तर प्रदेश के वार्षिक लेखा परीक्षा प्रतिवेदन के वार्षिक प्रतिवेदन विधान मण्डल के समक्ष विधिवत प्रस्तुत किये जा रहे हैं अथवा नहीं एवं तत्सम्बन्धी प्रतिवेदनों की जांच करना।

(२) शासकीय विभागों द्वारा स्थानीय निकायों को अनुदान एवं ऋण के रूप में जो धनराशियां दी जाती हैं और जिनकी लेखा परीक्षा परीक्षक, स्थानीय निधि लेखा, उत्तर प्रदेश द्वारा की जाती है, उनके सम्बन्ध में यह जांच करना कि प्राप्त किये गये सरकारी अनुदान एवं ऋण की राशियां सम्बन्धित संस्थाओं द्वारा उन्हीं कार्यों पर व्यय की गयी हैं जिनके लिये वे स्वीकृत की गयी थी तथा उनके उपयोग में कोई वित्तीय अनियमिततायें तो नहीं बरती गयी हैं।

२६९-ज-समिति के अधिकार क्षेत्र का विनिश्चय - यदि यह प्रश्न उत्पन्न हो कि कोई विषय इस समिति के क्षेत्र में आता है अथवा नहीं, तो यह मामला अध्यक्ष, विधान सभा को निर्दिष्ट किया जायेगा और उनका विनिश्चय अन्तिम होगा।

(ण) आचार समिति (एथिक्स कमेटी)

२६९-झ-समिति का गठन- उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्यों के सदन के भीतर तथा सदन के बाहर विधायक के रूप में किये गये आचरण की जांच हेतु अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित एक संसदीय "आचार समिति" होगी जिसमें अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को सम्मिलित करते हुए कुल ११ से अनधिक सदस्य होंगे। अध्यक्ष इस समिति के पदेन सभापति होंगे।

२६९-ञ-समिति के कृत्य - समिति के निम्नलिखित कृत्य होंगे:-

(१) समिति सदस्यों के नैतिक तथा सदाचारी व्यवहार पर दृष्टि रखेगी तथा सदस्यों के आचार सम्बन्धी और अन्य दुर्व्यवहार सम्बन्धी उसे निर्दिष्ट मामलों की जांच करेगी।

(२) समिति सदस्यों के कदाचार सम्बन्धी व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में सदन की प्रक्रिया नियमावली में यथा आवश्यक संशोधन पर विचार करेगी।

(३) समिति विधान सभा के सदस्यों के सदन के अन्दर तथा सदन के बाहर के कृत्यों के बारे में प्राप्त शिकायतों पर गुणावगुण के आधार पर विचार एवं जांच करेगी।

(४) समिति आचार संहिता के उल्लंघन एवं अतिक्रमण के सभी मामलों में दोषी पाये गये सदस्य की, कम गम्भीर प्रकृति के अपराधों के लिये भर्त्सना, फटकार, निन्दा या सदन से निष्कासन और गम्भीर कदाचार के मामलों में सदन की सेवा से उन्हें एक विशिष्ट अवधि के लिये निलम्बित करने पर विचार कर अपनी संस्तुति कर सकेगी।

२६९-ट-समिति का प्रतिवेदन- समिति उपरोक्त सभी या किसी विषय के सम्बन्ध में अपना प्रतिवेदन सदन में प्रस्तुत कर सकेगी। ’’त’’ महिला एवं बाल विकास सम्बन्धी संयुक्त समिति

२६९-(ठ) समिति का गठन- राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति गठित की जायेगी, जो ’’महिला एवं बाल विकास सम्बन्धी संयुक्त समिति’’ कहलायेगी। समिति में सभापति को सम्मिलित करते हुए 19 सदस्य होंगे जिनमें 15 सदस्य विधान सभा के तथा 4 सदस्य विधान परिषद् के होंगे। विधान सभा के 15 सदस्य अध्यक्ष, विधान सभा द्वारा तथा विधान परिषद् के 4 सदस्य सभापति, विधान परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किये जायेंगे: परन्तु कोई मंत्री समिति के सदस्य नियुक्त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्य मंत्री नियुक्त किये जायं तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्य नहीं रहेंगे।

२६९-(ड) समिति के कृत्य- (1) महिला एवं बाल विकास के सिद्घान्त एवं योजना के कार्यान्वयन हेतु राज्य सरकार द्वारा बनाये गये अधिनियम, नियम, परिनियम, परिपत्र एवं आदेश की समीक्षा करना,

(2) महिलाओं एवं बच्चों के शैक्षिक एवं आर्थिक विकास हेतु अपने प्रतिवेदन में संस्तुतियां करना,

(3) महिलाओं एवं बच्चों की विधिक सहायता की समीक्षा करना,

(4) समिति राज्य में स्थापित संस्थानों के कृत्यों एवं अभिलेखों की जांच कर सकेगी जो राज्य सरकार से महिलाओं एवं बच्चों के विकास के लिए किसी भी रूप में अनुदान प्राप्त करती हो,

(5) समिति महिला एवं बाल विकास से सम्बन्धित ऐसे अन्य विषयों की भी जांच कर सकेगी जो समय-समय पर उसे अध्यक्ष द्वारा निर्दिष्ट किये जायें,

(6) यदि यह प्रश्न उत्पन्न हो कि कोई विषय इस समिति के क्षेत्र में आता है अथवा नहीं, तो यह मामला अध्यक्ष, विधान सभा को निर्दिष्ट किया जायेगा और उनका विनिश्चय अन्तिम होगा।

269-(ढ) समिति का प्रतिवेदन- समिति विधान मण्डल के दोनों सदनों को उपर्युक्त विषयों या अध्यक्ष द्वारा समय-समय पर उसे निर्दिष्ट किये गये विषयों के सम्बन्ध में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी।

(थ) संसदीय शोध, संदर्भ एवं अध्ययन समिति

२६९-(ण) समिति का गठन- सदन के समक्ष उठने वाले विभिन्न विषयों पर अध्ययन करने के लिए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को सम्मिलित करके 15 से अनधिक सदस्यों की एक समिति होगी जिसके शेष सदस्य अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित किये जायेंगे।

२६९-(त) समिति के सभापति- अध्यक्ष इस समिति के पदेन सभापति होंगे। यदि अध्यक्ष किसी कारण से समिति के सभापति के रूप में कार्य करने में असमर्थ हों तो उपाध्यक्ष उस उपवेशन के सभापति होंगे। यदि वे दोनों ही किसी कारण से पीठासीन होने में असमर्थ हों तो अध्यक्ष समिति के सदस्यों में से किसी को उस बैठक का सभापति नाम-निर्देशित करेंगे।

२६९-(थ) समिति के कृत्य- समिति सदन के समक्ष समय-समय पर उठने वाले विभिन्न संसदीय विषयों का अध्ययन करेगी और विचारोपरान्त सदन में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी।

(द)पंचायती राज समिति

269-(द)समिति का गठन- (1) ग्राम पंचायतों तथा जिला पंचायतों एवं क्षेत्र पंचायतों के सम्‍बन्‍ध में ‘भारत सरकार के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की वार्षिक तकनीकी रिपोर्ट’ और ‘मुख्‍य लेखा-परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितियां एवं पंचायतें, उत्‍तर प्रदेश सरकार की वार्षिक रिपोर्ट’, जो राज्‍य सरकार द्वारा राज्‍य विधान मण्‍डल के समक्ष रखी जायें या उसको निर्दिष्‍ट की जायें या समिति जिनकी जांच करना आवश्‍यक समझे, जांच करने के लिए एक पंचायती राज समिति होगी।

(2) पंचायती राज समिति में विधान सभा के आठ से अनधिक सदस्‍य होंगे जो प्रत्‍येक वर्ष सदन द्वारा उसके सदस्‍यों में से अनुपातिक प्रतिनिधित्‍व के सिद्धांत के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे तथा दो सहयुक्‍त सदस्‍य विधान परिषद् के होंगे:
परंतु कोई मंत्री समिति के सदस्‍य नियुक्‍त नहीं किये जायेंगे और यदि समिति के कोई सदस्‍य मंत्री नियुक्ति किये जायें तो वे ऐसी नियुक्ति की तिथि से समिति के सदस्‍य नहीं रहेंगे।

269-(ध) समिति के कृत्‍य- समिति के निम्‍नांकित कृत्‍य होंगे:-

(1) ग्राम पंचायतों तथा जिला पंचायतों एवं क्षेत्र पंचायतों के संबंध में ‘भारत सरकार के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की वार्षिक तकनीकी रिपोर्ट’ और ‘मुख्‍य लेखा-परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितियां एवं पंचायतें, उत्‍तर प्रदेश सरकार की वार्षिक रिपोर्ट’ विधान मण्‍डल के समक्ष विधिवत् प्रस्तुत किये जा रहे हैं अथवा नहीं एवं तत्‍सम्‍बन्‍धी प्रतिवेदनों की जांच करना।

(2) शासकीय विभागों द्वारा ग्राम पंचायतों तथा जिला पंचायतों एवं क्षेत्र पंचायतों को अनुदान एवं ऋण के रूप में जो धनराशियां दी जाती हैं उनके संबंध में भारत सरकार के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की वार्षिक तकनी‍की रिपोर्ट’ और ‘मुख्‍य लेखा-परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितियां एवं पंचायतें, उत्‍तर प्रदेश सरकार की वार्षिक रिपोर्ट’ के संबंध में यह जांच करना कि प्राप्‍त किये गये सरकारी अनुदान एवं ऋण की राशियां सम्‍बन्धित संस्‍थाओं द्वारा उन्‍हीं कार्यों पर व्‍यय की गई हैं जिनके लिये वे स्‍वीकृत की गई थी तथा उनके उपयोग में कोई वित्‍तीय अनियमिततायें तो नहीं बरती गई हैं।

269(न)-समिति के अधिकार क्षेत्र का विनिश्चय यदि यह प्रश्‍न उत्‍पन्‍न हो कि कोई विषय इस समिति के क्षेत्र में आता है अथवा नहीं, तो यह मामला अध्‍यक्ष, विधान सभा को निर्दिष्‍ट किया जायेगा और उनका विनिश्‍चय अन्तिम होगा।

अध्याय XVII – अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को हटाने का संकल्प तथा मंत्रियों के विरुद्ध अविश्वास के प्रस्ताव

२७०-अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को हटाने का संकल्प- कोई सदस्य जो अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को उनके पद से हटाने के लिये अनुच्छेद १७९ (ग) के अन्तर्गत किसी संकल्प को प्रस्तावित करने के अभिप्राय की सूचना देना चाहें तो वे उसे लिखित रूप में देंगे परन्तु पूर्वोक्त प्रयोजन के लिये कोई संकल्प अनुज्ञा के लिये तब तक प्रस्तुत नहीं किया जायेगा जब तक कि प्रमुख सचिव को चौदह दिन के पूर्व ऐसी सूचना न दी गयी हो। अनु0 179

२७१-संकल्प लिये जाने के लिये सदन की अनुज्ञा- (१) जिस सदस्य के नाम में संकल्प हो वे संकल्प वापस ले सकेंगे, परन्तु यदि वे ऐसा न करें तो वे संकल्प उपस्थित करने के लिये सदन की अनुज्ञा मांगेंगे। इस प्रक्रम पर किसी भाषण की अनुज्ञा नहीं होगी, किन्तु प्रस्तावक संकल्प लाने के कारणों का संक्षेप में उल्लेख कर सकेंगे।

(२) अध्यक्ष या पीठासीन अधिकारी उन सदस्यों से जो अनुज्ञा दिये जाने के पक्ष में हों, अपने- अपने स्थानों में खडे होने के लिये कहेंगे। यदि तत्समय सदन के सदस्यों के पंचमांस से न्यून सदस्य खड़े हों तो अध्यक्ष या पीठासीन अधिकारी प्रस्तावक को सूचित करेंगे कि उसे संकल्प प्रस्तुत करने के लिये सदन की अनुज्ञा नहीं है।

२७२-नियत दिन को कायर्सूची में संकल्प का सम्मिलित किया जाना- (क) यदि पूर्वगामी नियम के उपबन्धों के अनुसार प्रस्तावक संकल्प को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा सदन से प्राप्त कर लें, तो संकल्प उसी दिन अथवा किसी नियत दिन पर विचार के लिये लिया जा सकेगा।

(ख) ऐसा संकल्प प्रश्न के घंटे के बाद और अन्य कोई कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व लिया जायगा।

२७३-संकल्प पर विचार के समय पीठासीन व्यक्ति- अनुच्छेद १८१ (१) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए जब पूर्वगामी नियमों के अन्तर्गत कोई हटाने का संकल्प विचारार्थ लिया जाय तो अध्यक्ष या उपाध्यक्ष या अनुच्छेद १८० (२) में निर्दिष्ट कोई अन्य व्यक्ति पीठासीन होंगे। अनु0 180 तथा 181

२७४-भाषणों के लिये समय सीमा- किसी संकल्प पर भाषण की अवधि १५ मिनट से अधिक नहीं होगी, परन्तु संकल्प के प्रस्तावक इतने अधिक समय तक भाषण दे सकेंगे, जितने की पीठासीन व्यक्ति अनुज्ञा दें।

२७५-मंत्रियों में अविश्वास का प्रस्ताव- (१) मंत्रि-परिषद् में विश्वास का अभाव प्रकट करने का प्रस्ताव अध्यक्ष की सम्मति से निम्नलिखित निर्बन्धनों के साथ किया जा सकेगा, अर्थात्

(क) प्रस्ताव करने की अनुज्ञा प्रश्नों के अनन्तर तथा दिन की कार्यवाही प्रारम्भ होने से पूर्व मांगी जायेगी;

(ख) अनुज्ञा मांगने वाले सदस्य को उस दिन का उपवेशन आरम्भ होने से पूर्व प्रमुख सचिव को उस प्रस्ताव की, जिसे वह प्रस्तुत करना चाहता है, एक लिखित सूचना देनी होगी।

(२) यदि अध्यक्ष की राय हो कि प्रस्ताव नियमानुकूल है तो वे प्रस्ताव को सदन को पढ़कर सुनायेंगे तो उन सदस्यों से जो अनुज्ञा दिये जाने के पक्ष में हों, अपने स्थानों पर खडे होने की प्रार्थना करेंगे और यदि समस्त सदस्यों के पंचमांश से अन्यून इस प्रकार खडे़ हो जायें, तो अध्यक्ष सूचित करेंगे कि अनुज्ञा दी जाती है और प्रस्ताव अनुज्ञा दिये जाने के दिन से अधिक से अधिक १० दिन के भीतर किसी ऐसे दिन जो अध्यक्ष नियत करें, लिया जायगा। यदि अपेक्षित संख्या से कम सदस्य खडे हों तो अध्यक्ष, सदस्य को सूचित करेंगे कि उन्हें सदन की अनुज्ञा प्राप्त नहीं है।

(३) यदि उप नियम (२) के अन्तर्गत अनुज्ञा दे दी जाये तो अध्यक्ष सदन के कार्य की स्थिति पर विचार करने के बाद प्रस्ताव पर चर्चा के लिये कोई एक दिन या अधिक दिन या किसी दिन का भाग नियत कर सकेंगे।

(४) अध्यक्ष, नियत दिन या अन्तिम दिन निश्चित समय पर प्रस्ताव पर सदन का विनिश्चय निर्धारित करने के लिये प्रत्येक आवश्यक प्रश्न तुरन्त रखेंगे।

(५) अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें, भाषणों के लिये समय-सीमा विहित कर सकेंगे।

२७६-मंत्री का वक्तव्य जिन्होंने पद त्याग किया है- (१) किसी सदस्य को जिन्होंने मंत्री पद का त्याग किया हो, अध्यक्ष की सम्मति से अपने त्याग-पत्र के स्पष्टीकरण में एक व्यक्तिगत वक्तव्य देने का अधिकार होगा। जिस दिन वक्तव्य दिया जाये उससे एक दिन पहले उसकी एक प्रति अध्यक्ष और सदन नेता को भेजी जायेगी, परन्तु लिखित वक्तव्य की अनुपस्थिति में ऐसे वक्तव्य की मुख्य बातें या उसका सार अध्यक्ष और सदन नेता को, जिस दिन वक्तव्य दिया जाय उससे एक दिन पहले भेजा जायेगा।

(२) ऐसा वक्तव्य प्रश्नों के अनन्तर और दिन की कार्यवाही प्रारम्भ होने से पूर्व दिया जायेगा।

(३) ऐसे वक्तव्य पर कोई वाद-विवाद नहीं होगा़, परन्तु कोई मंत्री तत्संगत वक्तव्य दे सकेगा।

अध्याय XVIII – राज्यपाल और सभा के बीच संचार

२७७- राज्यपाल का सभा को संचार- राज्यपाल सभा को अपना संचार-

(१) एक लिखित संदेश द्वारा अध्यक्ष के पास, जो उनके द्वारा सदन को पढ़कर सुनाया जायेगा, तथा

(२) मंत्री द्वारा, भेज सकेंगे।

२७८- सभा का राज्यपाल को संचार- सभा, राज्यपाल को अपना संचार-

(१) सदन में प्रस्ताव किये जाने तथा स्वीकृत होने के पश्चात् औपचारिक समावेदन द्वारा, और

(२) अध्यक्ष द्वारा भेज सकेगी।

अध्याय XIX – सदन के स्थानों का त्याग और उनकी रिक्तता तथा अनुपस्थित सदस्य

२७९- सदन के स्थानों का त्याग- (१) जो सदस्य सदन में अपने स्थान का त्याग करना चाहें, वे निम्नलिखित प्रपत्र में ऐसी सूचना देंगे-

सेवा में
अध्यक्ष,
विधान सभा,
उत्तर प्रदेश।
श्रीमान्,
मैं एतद्द्वारा सदन से अपने स्थान से .............................................(दिनांक) पूर्वाहन/अपराहन से पद त्याग करता हूं।
आपका विश्वासपात्र,
(विधान सभा के सदस्य के हस्ताक्षर)
स्थान.....................................तिथि..........................................

टिप्पणी-(१) पत्र में दिये हुए पद त्याग के दिनांक और समय उस समय से पूर्व के नहीं होंगे जबकि वह पत्र लिखा गया है।

 

(२) यदि कोई सदस्य अपना त्याग-पत्र अध्यक्ष को स्वयं व्यक्तिगत रूप से देते हैं और उनको सूचित करते हैं कि त्याग-पत्र स्वेच्छा से दिया गया है और जैन्य है और अध्यक्ष के पास कोई विपरीत सूचना या जानकारी नहीं है तो अध्यक्ष त्याग-पत्र को तत्काल स्वीकार कर सकेंगे।

(३) यदि अध्यक्ष को त्याग-पत्र डाक द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से मिले तो अध्यक्ष, त्याग-पत्र की स्वेच्छात्मक प्रकृति तथा जैन्यता के बारे में अपना समाधान करने के लिए ऐसी जांच कर सकेंगे जिसे वे उचित समझें। यदि अध्यक्ष द्वारा या तो स्वयं या विधान सभा सचिवालय के माध्यम से या ऐसे अन्य माध्यम से जिसे वे उचित समझें, संक्षिप्त जांच के उपरान्त अध्यक्ष का यह समाधान हो जाय कि त्याग-पत्र स्वेच्छा से नहीं दिया गया है या जैन्य नहीं है तो वे उसे स्वीकार नहीं करेंगे।

(४) कोई सदस्य अपने त्याग-पत्र को अध्यक्ष द्वारा स्वीकृत किये जाने से पूर्व वापस ले सकेंगे।

(५) किसी सदस्य का त्याग-पत्र स्वीकार करने के उपरान्त अध्यक्ष शीध्र सदन को सूचना देंगे कि अमुक-अमुक सदस्य ने सदन के अपने स्थान का त्याग कर दिया है और उन्होंने त्याग-पत्र स्वीकार कर लिया है। स्पष्टीकरण- जब सदन सत्र में न हो तो अध्यक्ष सदन के पुनः समवेत होने के बाद तुरन्त सदन को सूचना देंगे।

(६) प्रमुख सचिव, अध्यक्ष द्वारा किसी सदस्य के त्याग-पत्र को स्वीकार कर लिए जाने के उपरान्त यथाशीध्र यह जानकारी बुलेटिन तथा गजट में प्रकाशित करायेंगे और अधिसूचना की एक प्रति निर्वाचन आयोग को इस प्रकार हुई रिक्तता की पूर्ति हेतु कार्यवाही करने के लिए भेजेंगे। परन्तु यदि त्याग-पत्र किसी आगामी तिथि से प्रभावी होने वाला हो तो उसकी जानकारी बुलेटिन तथा गजट में उस दिनांक से पूर्व प्रकाशित नहीं की जायेगी जिस दिनांक से उसे प्रभावी होना है।

(७) त्याग-पत्र में निर्दिष्ट दिनांक एवं समय से पद त्याग प्रभावी होगा।

(८) यदि त्याग-पत्र की जैन्यता अथवा स्वेच्छात्मक प्रकृति के विषय में कोई विवाद उत्पन्न हो तो उप नियम (५) अथवा उप नियम (६) के अन्तर्गत कार्यवाही करने से पूर्व उसका निर्णय अध्यक्ष द्वारा किया जायगा।

(९) यदि कोई त्याग-पत्र विहित प्रपत्र में न हो तो वह सम्बद्ध सदस्य को विहित प्रपत्र में प्रस्तुत करने हेतु वापस कर दिया जायेगा।

२८०- सदन के उपवेशनों से अनुपस्थित रहने के लिए अनुज्ञा- (१) जो सदस्य अनुच्छेद १९० के खण्ड (४) के अन्तर्गत सदन के उपवेशनों में अनुपस्थिति की अनुज्ञा प्राप्त करना चाहें, वह अध्यक्ष को लिखित रूप में आवेदन-पत्र देंगे, जिसमें उस कालावधि का उल्लेख करेंगे जिसके लिए उन्हें सदन के उपवेशनों से अनुपस्थित रहने की अनुज्ञा दी जाय।

(२) ऐसा आवेदन-पत्र प्राप्त होने के पश्चात् शीध्र ही जैसा कि अध्यक्ष आदेश दें, सदन के विचारार्थ रखा जायेगा और इस प्रकार नियत दिवस में प्रश्नों के अनन्तर तत्काल तथा उस दिन का अन्य कार्य आरम्भ होने के पूर्व उस पर विचार किया जायगा।

(३) अध्यक्ष, उस ढंग को निश्चित करेंगे, जिसके अनुसार ऐसे आवेदन-पत्रों पर, सभा का विनिश्चय लिया जायेगा।

(४) प्रमुख सचिव, सदस्य को उनके आवेदन-पत्र पर सभा के विनिश्चय की यथाशीध्र सूचना देंगे।

(५) यदि कोई सदस्य जिन्हें उप नियम (२) के अन्तर्गत अनुपस्थिति की अनुमति प्रदान की गयी हो अवकाश की कालावधि के दौरान में सदन के सत्र में उपस्थित हो जायं तो उनकी पुनः उपस्थिति की तिथि से अवकाश का असमाप्त भाग व्यपगत हो जायेगा।

(६) यदि कोई सदस्य ६० दिन की कालावधि या उससे अधिक समय तक सदन की अनुज्ञा के बिना उसके सब उपवेशनों से, जिसकी संगणना अनुच्छेद १९०(४) के परन्तुक में उपबद्ध रीति से की जायेगी, अनुपस्थिति रहे तो सदन-नेता या कोई भी अन्य सदस्य प्रस्ताव कर सकेंगे कि ऐसे सदस्य का स्थान रिक्त घोषित कर दिया जाय।

(७) सदस्य ऐसे प्रस्ताव की तीन दिन की सूचना देंगे और अपनी सूचना के साथ उन तिथियों का एक पूर्ण विवरण भेजेंगे जिसमें वह सदस्य अनुपस्थित थे।

(८) उप नियम (६) के अन्तर्गत प्रस्ताव स्वीकार हो जाने के बाद प्रमुख सचिव यह जानकारी गजट में प्रकाशित करायेंगे और अधिसूचना की एक प्रति निर्वाचन आयोग को इस प्रकार हुई रिक्तता की पूर्ति हेतु कार्यवाही करने के लिए भेजेंगे।

२८१- उपस्थिति पंजी- प्रमुख सचिव, सभा के उपवेशनों में सदस्यों की उपस्थिति का अभिलेख रखेंगे और इस प्रयोजन के लिए एक उपस्थिति पंजी रखी जायेगी। यह उपवेशन के प्रारम्भ से एक घंटे पूर्व सभा कक्षों में रखी जायेगी और अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री, नेता विरोधी दल, राज्य मंत्री, उप मंत्री तथा सभा सचिवों के अतिरिक्त अन्य सदस्य उसमें उपवेशन के दिन के लिए स्थगित होने के पूर्व हस्ताक्षर करेंगे। जो सदस्य पंजी में हस्ताक्षर नहीं करेंगे अनुपस्थित समझे जायेंगे : परन्तु जो सदस्य इस प्रकार अनुपस्थित समझे जायं वह सदस्य उपवेशन के १५ दिन के भीतर जिसमें वे उपस्थित थे, किन्तु हस्ताक्षर नहीं कर सके थे, अध्यक्ष को अपनी उपस्थिति का समाधान कर सकेंगे और यदि अध्यक्ष का समाधान हो जाय तो वे आदेश दे सकेंगे कि उनकी उपस्थित अंकित किया जाय।

अध्याय XX – प्रक्रिया के साधारण नियम

(क) सभा की भाषा

२८२- सभा की भाषा- संविधान के उपबन्धों के अधीन सभा का कार्य हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में होगा।

(ख) सूचना

२८३- सूचनाओं का दिया जाना - (१) प्रत्येक सूचना जिसकी नियमों के अन्तर्गत आवश्यकता हो प्रमुख सचिव को सम्बोधित करके लिखित रूप में दी जायेगी और वह पटल पर या उसके कार्यालय में कार्यकाल के भीतर छोड़ दी जायेगी।

(२) जब तक नियमों में अन्यथा उपबन्ध न हो, सूचना जो कार्यालय में उपर्युक्त उप नियम में दिये हुए समय के उपरान्त अन्य समयों में प्राप्त हो, वह अगले खुलने वाले दिन प्राप्त हुई समझी जायगी।

 

(३) जब सदन का उपवेशन हो रहा हो तो कटौती प्रस्तावों के अतिरिक्त जो सूचनायें उप नियम (१) के अन्तर्गत सायंकाल चार बजे तक प्राप्त हों, उनकी प्रतिलिपि प्रमुख सचिव, सदस्यों में अगले दिन १० बजे तक परिचालित करेंगे।

 

(ग) संशोधन

२८४- ग्राह्य़ संशोधन - (१) इन नियमों के अधीन प्रत्येक संशोधन उस प्रस्ताव के विषय से सुसंगत होना चाहिए,जिस पर वह प्रस्थापित किया जाय।

(२) ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जा सकेगा जो स्वीकृत हो जाने पर केवल नकारात्मक मत का बोधक हो।

(३) जब प्रस्ताव के किसी भाग के संशोधन पर विनिश्चय हो चुका हो तो पूर्व का भाग संशोधित नहीं किया जायेगा।

(४) कोई ऐसा संशोधन प्रस्थापित नहीं किया जा सकेगा जो उसी विषय पर दिये गये पूर्व विनिश्चय से असंगत हो।

(५) अध्यक्ष को अभिसूचित संशोधनों के प्रवरण की शक्ति होगी तथा वे किसी प्रक्रम में किसी संशोधन को जो उसकी राय में निरर्थक या अनियमित हो, अनुज्ञापित कर सकेंगे या उस पर मत लेना अस्वीकार कर सकेंगे।

२८५-संशोधन पर मत लेने की रीति - (१) जब किसी प्रस्ताव पर एक या एक से अधिक संशोधन प्रस्तुत किये जायं तब अध्यक्ष उन पर प्रश्न उपस्थित करने से पूर्व मूल प्रस्ताव को सदन को बतायेंगे या पढ़कर सुनायेंगे।

(२) यह अध्यक्ष के स्वविवेक पर निर्भर होगा कि वे पहले मूल प्रस्ताव को या किसी संशोधन को मत के लिए रखें।

(घ) सदस्यों द्वारा पालनीय नियम

२८६-सभा में उपस्थिति के समय सदस्यों द्वारा पालनीय नियम - जब सदन का उपवेशन हो रहा हो, तो सदस्य-

(१) ऐसी पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नहीं पढ़ेंगे और न उस कार्य के अतिरिक्त ऐसा कोई कार्य करेंगे, जिसका सदन की कार्यवाही से सम्बन्ध न हो,

(२) किसी सदस्य के भाषण करते समय उसमें अव्यवस्थित बात या शोर या किसी अन्य अव्यवस्थित रीति से बाधा नहीं डालेंगे,

(३) सदन में प्रवेश करते समय या सदन के बाहर जाते समय और अपने स्थान पर बैठते समय या वहां से उठते समय भी अध्यक्ष-पीठ के प्रति नमन करेंगे,

(४) अध्यक्ष-पीठ और ऐसे सदस्य के बीच में से जो भाषण दे रहा हो, नहीं गुजरेंगे,

(५) जब अध्यक्ष सदन को सम्बोधित कर रहे हों, तो न सदन के बाहर जायेंगे और न एक ओर से दूसरी ओर जायेंगे,

(६) सदैव अध्यक्ष-पीठ को ही सम्बोधित करेंगे,

(७) सदन को सम्बोधित करते समय अपने सामान्य स्थान पर ही रहेंगे,

(८) जब सदन में नहीं बोल रहे हों तो शान्त रहेंगे,

(९) कार्यवाही में रुकावट नहीं डालेंगे, चीत्कार नहीं करेंगे या बाधा नहीं डालेंगे और जब सदन में भाषण दिये जा रहे हों तो साथ-साथ उनकी टीका नहीं करेंगे,

(१०) भाषण करते समय दीर्घा में किसी अजनबी की ओर संकेत नहीं करेंगे।

२८७-अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर सदस्य का बोलना - जब कोई सदस्य, बोलने के लिए खडे हों तो अध्यक्ष उनका नाम पुकारेंगे यदि एक ही समय पर एक से अधिक सदस्य खडे हो जायें तो जिस सदस्य का नाम पुकारा जायेगा उन्हीं को बोलने का अधिकार होगा।

२८८-सदन को सम्बोधित करने का ढंग - कोई सदस्य, जो सदन के समक्ष किसी विषय पर कुछ कहना चाहते हों, बोलते समय खडे़ होंगे और अध्यक्ष को सम्बोधित करेंगे:
परन्तु अध्यक्ष रोग या दुबर्लता के कारण किसी असमर्थ सदस्य को बैठ कर बोलने की अनुज्ञा दे सकेंगे।

२८९-बोलने तथा प्रश्नों का उत्तर देते समय पालनीय नियम - १) प्रत्येक भाषण का विषय चर्चाधीन विषय से सर्वथा सुसंगत होना चाहिए।

(२) बोलने तथा प्रश्न का उत्तर देते समय कोई सदस्य- (क) किसी प्रश्न का वंचनात्मक उत्तर नहीं देंगे,

(ख) किसी ऐसे वास्तविक तथ्य पर, जो न्यायालय के विचाराधीन हो, कोई विचार प्रकट न करेंगे और न कोई आलोचना करेंगे,

(ग) किसी सदस्य पर व्यक्तिगत आरोप तथा लांछन नहीं लगायेंगे,

(घ) संसद या किसी राज्य के विधान मण्डल के व्यवहार या कार्य के विषय में अशिष्ट भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे,

(ङ) सदन के विनिश्चय की, ऐसे अवसर को छोड़कर, जब उसके निरसन का प्रस्ताव विचाराधीन हो, आलोचना नहीं करेंगे,

(च) राष्ट्रपति, किसी राज्यपाल अथवा किसी न्यायालय के आचरण पर आक्षेप नहीं करेंगे,

(छ) राज्य-द्रोहात्मक या मानहानिकारक शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे, किन्तु वह अध्यक्ष की अनुज्ञा से अपने तर्क के प्रयोजन के लिए उनको उदधृत कर सकेंगे,

(ज) कोई ऐसी बात नहीं कहेंगे जो अध्यक्षासन अथवा सदन के लिए अनादर सूचक हो।

२८९-क- किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप लगाने के सम्बन्ध में प्रक्रिया- किसी सदस्य द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध मानहानिकारक या अपराधारोपक स्वरूप का आरोप नहीं लगाया जायेगा, जब तक कि सदस्य ने अध्यक्ष को तथा सम्बन्धित मंत्री को पूर्व सूचना न दे दी हो जिसमें मंत्री उत्तर के प्रयोजन के लिए विषय की जांच कर सकें:
परन्तु अध्यक्ष किसी भी समय सदस्य को ऐसा आरोप लगाने से प्रतिषिद्ध कर सकेंगे यदि उनकी राय हो कि ऐसा आरोप सदन की गरिमा के विरुद्ध है या ऐसा आरोप लगाने से कोई लोकहित सिद्ध नहीं होता।

२९०-प्रश्न अध्यक्ष के माध्यम से पूछे जायेंगे- जब चर्चा के बीच स्पष्टीकरण के लिए या किसी अन्य पर्याप्त कारण से, किसी सदस्य को सभा के विचाराधीन किसी विषय पर किसी अन्य सदस्य से कोई प्रश्न पूछना हो तो वह अध्यक्ष के माध्यम से प्रश्न पूछेंगे।

२९१-असंगति या पुनरावृत्ति- अध्यक्ष ऐसे सदस्य के जो बार-बार असंगत बातें करें या स्वयं अपनी या अन्य सदस्यों द्वारा वाद-विवाद में प्रयुक्त युक्तियों की अरुचिकर पुनरावृत्ति करें, व्यवहार की ओर सभा का ध्यान दिलाने के उपरान्त उस सदस्य का भाषण बन्द करने का निर्देश दे सकेंगे।

२९१-क-वैयक्तिक स्पष्टीकरण - कोई सदस्य अध्यक्ष की अनुज्ञा से वैयक्तिक स्पष्टीकरण कर सकेंगे यद्यपि सदन के सामने कोई प्रश्न न हो, किन्तु उस अवस्था में कोई विवादास्पद प्रश्न नहीं उठाया जायगा और कोई वाद-विवाद नहीं होगा।

(ङ) भाषणों का क्रम तथा उत्तर देने का अधिकार

२९२-भाषणों का क्रम तथा उत्तर देने का अधिकार- (१) प्रस्तावक सदस्य के भाषण के उपरान्त अन्य सदस्य प्रस्ताव पर अध्यक्ष द्वारा निश्चित क्रमानुसार भाषण कर सकेंगे। यदि कोई सदस्य अध्यक्ष द्वारा पुकारे जाने पर भाषण न करे तो फिर उन्हें अध्यक्ष की अनुज्ञा के बिना वाद-विवाद के किसी आगे के प्रक्रम में प्रस्ताव पर भाषण देने का अधिकार नहीं होगा।

(२) अन्यथा उपबन्ध होने के अतिरिक्त कोई सदस्य किसी प्रस्ताव पर एक से अधिक बार भाषण नहीं देंगे।

(३) कोई सदस्य जिन्होंने कोई मूल प्रस्ताव या उस पर कोई संशोधन प्रस्तुत किया हो या आय-व्ययक की मांगों के लिए किसी मद को कम करने या हटा देने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो, उत्तर के रूप में पुनः भाषण कर सकेंगे, और यदि प्रस्ताव या संशोधन किसी असरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया गया हो तो उस मंत्री को, जिसके विभाग से चर्चाधीन विषय का सम्बन्ध हो, प्रस्तावक के पश्चात् भाषण करने का अधिकार होगा, चाहे उन्होंने विवाद में पहले भाषण किया हो या न किया हो।

२९३-अध्यक्ष द्वारा संशोधन- अध्यक्ष स्वयं ही, या किसी सदस्य द्वारा प्रश्न उठाये जाने पर या प्रार्थना किये जाने पर किसी भी समय सदन में विचाराधीन विषय पर सदस्यों को उनके पर्यालोचन में सहायता करने की दृष्टि से सदन को सम्बोधित कर सकेंगे और इस प्रकार व्यक्त किये गये मत को किसी प्रकार के विनिश्चय के रूप में नहीं समझा जायेगा।

(च) अध्यक्ष के खडे़ होने पर प्रक्रिया

२९४-अध्यक्ष के भाषण का मौनपूर्वक श्रवण -

(१) जब कभी अध्यक्ष बोलें (सम्बोधन करें) तो उनका भाषण मौनपूर्वक सुना जायेगा और कोई सदस्य जो उस समय बोल रहे हों या बोलने के लिए खड़े हुए हों तत्काल बैठ जायेंगे।

(२) जब अध्यक्ष सदन को सम्बोधित कर रहे हों तब कोई सदस्य अपने स्थान से नहीं उठेंगे।

(छ) विनिश्चय

२९५-सदन का विनिश्चय प्राप्त करने की प्रक्रिया - जिस विषय पर सदन का विनिश्चय अपेक्षित हो वह अध्यक्ष द्वारा रखे गये प्रश्न के द्वारा विनिश्चित किया जायेगा।

२९६-प्रस्थापन तथा प्रश्न का रखा जाना - जब कोई प्रस्ताव किया गया हो तो अध्यक्ष प्रश्न को विचार के लिए प्रस्थापित करेंगे और उसे सदन के विनिश्चय के लिए रखेंगे। यदि किसी प्रस्ताव में दो या अधिक अलग-अलग प्रस्थापनायें शामिल हों तो वे प्रस्थापनायें अध्यक्ष द्वारा अलग-अलग प्रश्नों के रूप में प्रस्थापित की जा सकेंगी।

२९७-आवाजें संग्रहीत होने के बाद किसी भाषण न होना - किसी प्रश्न पर अध्यक्ष "हां" वालों और "नहीं" वालों, दोनों की आवाजें संग्रहीत कर लें तो उसके बाद कोई सदस्य उस प्रश्न पर नहीं बोलेंगे।

२९८-विनिश्चय - (१) मत आवाजों द्वारा या विभाजन द्वारा लिये जा सकेंगे और यदि कोई सदस्य ऐसा चाहेंगे तो विभाजन द्वारा लिये जायेंगे:
परन्तु अध्यक्ष, यदि समझें कि विभाजन की मांग अनावश्यक रूप से की गयी है तो वे हाथ उठाकर मत ले सकेंगे और विभाजन कर परिहार कर सकेंगे।

(२) विभाजन का परिणाम अध्यक्ष द्वारा तत्काल घोषित किया जायेगा और उस पर कोई आपत्ति न की जा सकेगी।
(ज) किसी सदस्य को बाहर चले जाने की आज्ञा देने की या सदन को स्थगित करने या उपवेशन का निलम्बन करने की अध्यक्ष की शक्ति

२९९-सदन में शान्ति और व्यवस्था - (१) अध्यक्ष व्यवस्था स्थापित रखेंगे और किसी सदस्य को जिनका व्यवहार उनकी राय में अव्यवस्था पूर्ण हो, अथवा अध्यक्ष के प्रति अवज्ञापूर्ण हो, सदन से तुरन्त बाहर चले जाने का निर्देश दे सकेंगे और जिस सदस्य को इस प्रकार बाहर चले जाने का निर्देश दिया जाय वह तत्काल सभा मण्डप से बाहर चले जायेंगे और उस दिन के उपवेशन के अवशिष्ट समय में अनुपस्थित रहेंगे।

(२) अध्यक्ष, निम्नलिखित दशाओं में किसी सदस्य को इंगित कर सकेंगे।

(क) यदि उप नियम (१) के अन्तर्गत बाहर चले जाने का आदेश दिये जाने पर सदस्य उसका पालन न करें, या

(ख) यदि अध्यक्ष उप नियम (१) में प्रदत्त शक्ति का प्रयोग अपर्याप्त समझें, या

(ग) यदि सदस्य जान-बूझकर सदन की कार्यवाही में बार-बार अव्यवस्थित रीति से बाधा डालें, या

(घ) यदि उनके विरुद्ध इस नियम के अधीन एक ही सत्र में, अनुवर्ती अवसरों पर कार्यवाही करना आवश्यक हो जाये।

(३) (क) जैसे ही किसी सदस्य को इंगित किया जायेगा, सदन-नेता या संसदीय कार्य मंत्री अथवा उनकी अनुपस्थिति में कोई सदस्य तत्काल इस आशय का प्रस्ताव करेंगे कि इंगित सदस्य को सदन की सेवा से निलम्बित किया जाय और ऐसे प्रस्ताव पर प्रश्न बिना किसी संशोधन या विवाद या स्थगन प्रक्रिया के सदन के समक्ष उपस्थि कर दिया जायेगा।

(ख) इस प्रकार किसी सदस्य के निलम्बित किये जाने पर पहली बार निलम्बन की अवधि ३ उपवेशनों के लिए होगी, दूसरी बार ७ उपवेशनों के लिए और अनुवर्ती अवसरों पर, यदि सदन अन्यथा विनिश्चय न करे, सत्र की अवशिष्ट कालावधि के लिए होगी:
परन्तु निलम्बन की कोई कालावधि किसी अवस्था में भी सत्र की अवशिष्ट कालावधि से अधिक न होगी।

(ग) सदन द्वारा निलम्बित सदस्य बाध्य होंगे कि वे सदन के परिसर का तुरन्त परित्याग करें। किन्तु ऐसा न करने पर और अध्यक्ष द्वारा सदन का ध्यान इस ओर आकृष्ट किये जाने पर कि बल का प्रयोग अनिवार्य हो गया है, निलम्बित सदस्य, बिना किसी अग्रेतर प्रस्ताव के सत्र की अवशिष्ट कालावधि के लिए निलम्बित हो जायेंगे।

(घ) सदन की सेवा से निलम्बित सदस्य, सदन के परिसर में प्रवेश करने से और सदन और समितियों की कार्यवाहियों में भाग लेने से वर्जित रहेंगे:
परन्तु अध्यक्ष किसी निलम्बित सदस्य को तदर्थ प्रार्थना किये जाने पर सदन के परिसर में किसी विशेष प्रयोजन के लिए आने की अनुमति दे सकेंगे।

(४) सदन किसी समय प्रस्ताव किये जाने पर यह आदेश दे सकेगा कि उपर्युक्त उप नियम (३) के अधीन दिया गया निलम्बन का कोई दण्ड या उसका असमाप्त भाग निरस्त किया जाय।

(५) अध्यक्ष को अपने आदेश या सदन के विनिश्चयों को कार्यान्वित करने की पूरी शक्ति होगी और वे कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर आवश्यक बल का प्रयोग कर सकेंगे या करने का अधिकार दे सकेंगे।

(६) सदन में घोर अव्यवस्था होने की दशा में अध्यक्ष, किसी उपवेशन को ऐसे समय के लिए जिसे वह निर्धारित करें, निलम्बित कर सकेंगे।

२९९-क-कतिपय परिस्थितियों में सदस्य को निलम्बित समझा जाना - यदि कोई सदस्य सदन के किसी उपवेशन में सभा मण्डप के मध्य रिक्त स्थान में आकर सदन के सेवकों की मेज पर रखे पत्रादि को छीनता है या छीनने का प्रयास करता है अथवा उन्हें फाड़ता है या फाड़ने का प्रयास करता है अथवा कोई कागज, पत्रावली आदि अध्यक्ष पीठ की ओर फेंकता है या फेंकने का प्रयास करता है अथवा अध्यक्ष पीठ पर चढ़ता है या चढ़ने का प्रयास करता है तो अध्यक्ष या पीठासीन सदस्य द्वारा ऐसे सदस्य का नाम पुकारे जाने पर, ऐसा सदस्य उक्त उपवेशन के लिए सदन की सेवा से निलम्बित समझा जायेगा।

(झ) औचित्य प्रश्न

३००-औचित्य प्रश्न और उन पर विनिश्चय - (१) औचित्य प्रश्न इन नियमों के या संविधान के ऐसे अनुच्छेदों के, जिनसे सदन का कार्य विनियमित होता है निर्वचन या प्रवर्तन के सम्बन्ध में होगा और उसमें ऐसा प्रश्न उठाया जायेगा जो अध्यक्ष के संज्ञान में हो।

(२) औचित्य प्रश्न तत्समय सदन के समक्ष कार्य के सम्बन्ध में उठाया जा सकेगा:
परन्तु अध्यक्ष किसी सदस्य को कार्य की एक मद समाप्त होने और दूसरी के प्रारम्भ होने के बीच की अन्तरावधि में औचित्य प्रश्न उठाने की अनुमति दे सकेंगे, यदि वह सदन में व्यवस्था बनाये रखने या सदन के समक्ष कार्य विन्यास के सम्बन्ध में हो।

(३) उप नियम (१) तथा (२) में निर्दिष्ट शर्तों के अधीन रहते हुए कोई सदस्य औचित्य प्रश्न उठा सकेंगे और अध्यक्ष यह विनिश्चय करेंगे कि उठाया गया प्रश्न औचित्य प्रश्न है या नहीं और यदि हो तो उस पर अपना विनिश्चय देंगे जो अन्तिम होगा।

(४) किसी औचित्य प्रश्न पर वाद-विवाद की अनुज्ञा नहीं होगी, किन्तु अध्यक्ष यदि वे ठीक समझें, अपना विनिश्चय देने से पहले सदस्यों की बातें सुन सकेंगे।

(५) औचित्य प्रश्न विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं है।

(६) कोई सदस्य-

(क) जानकारी मांगने के लिए, या

(ख) अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए, या

(ग) जब प्रस्ताव पर कोई प्रश्न सदन के सामने रखा जा रहा हो, या

(घ) काल्पनिक, या

(ङ) विभाजन की घण्टियां नहीं बजीं या सुनाई नहीं पड़ीं ऐसा औचित्य प्रश्न नहीं उठायेंगे।

३०१-ऐसा विषय उठाना जो औचित्य प्रश्न न हो - जो सदस्य सदन की जानकारी में कोई ऐसा विषय लाना चाहें, जो औचित्य प्रश्न न हो तो वह प्रमुख सचिव को लिखित रूप में सूचना देंगे, जिसमें संक्षेप में उस विषय को बतायेंगे जिसे वे सदन में उठाना चाहते हों तथा साथ में कारण भी बतायेंगे कि वे उसे क्यों उठाना चाहते हैं और उन्हें ऐसा प्रश्न उठाने की अनुज्ञा अध्यक्ष द्वारा सम्मति दिये जाने के बाद ही तथा ऐसे समय और तिथि के लिए दी जायेगी जो अध्यक्ष निश्चित करें।

(ञ) कार्यवाही का अभिलेख तथा प्रतिवेदन

३०२- सभा की कायर्वाहियों का अभिलेख - (१) प्रमुख सचिव सभा की कार्यवाही का एक वृत्त-पत्र, जिसमें सभा के प्रत्येक दिन के विनिश्चयों का संक्षिप्त अभिलेख लिखा जायेगा, रखेंगे।

(२) सदन के प्रत्येक उपवेशन के उपरान्त अध्यक्ष वृत्त-पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे और इस प्रकार हस्ताक्षर हो जाने पर यह वृत्त-पत्र सदन के विनिश्चयों का प्रमाणिक अभिलेख बन जायेगा।

(३) वृत्त-पत्र को छापा जायेगा और उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को चार दिन के भीतर उपलब्ध करा दी जायेंगी।

३०३- सभा की कार्यवाहियों का प्रतिवेदन - (१) प्रमुख सचिव, सभा के प्रत्येक उपवेशन की कार्यवाही का सम्पूर्ण और शुद्ध प्रतिवेदन भी तैयार करायेंगे तथा उनको ऐसे रूप में और ऐसे ढंग से जैसा कि अध्यक्ष समय-समय पर निर्देश दें, प्रकाशित करायेंगे।

(२) ऐसे प्रतिवेदन की एक प्रतिलिपि तीन मास के भीतर प्रमुख सचिव द्वारा सभा के प्रत्येक सदस्य तथा राज्यपाल को भेजी जायेगी।

 

३०४- सदन की कार्यवाही से शब्दों का निकाला जाना - (१) यदि अध्यक्ष की राय हो कि सदन में कोई ऐसा शब्द या ऐसे शब्द प्रयुक्त किये गये हैं जो मानहानिकारक या अशिष्ट या असंसदीय या अभद्र हैं, तो वे स्वविवेक से आदेश दे सकेंगे कि ऐसा शब्द या ऐसे शब्द सदन की कार्यवाही में से निकाल दिये जायं।

(२) सदन की कार्यवाही में से इस प्रकार निकाले गये अंश छापे नहीं जायेंगे अपितु उसके स्थान पर तारांक लगाया जायगा और कार्यवाही में निम्नलिखित व्याख्यात्मक टिप्पणी समाविष्ट की जायेगी: "अध्यक्ष पीठ से दिये गये आदेशानुसार अमुक-अमुक तिथि को निकाला गया।"

(ट) अजनबियों का प्रवेश

३०५-अध्यक्ष द्वारा अजनबियों के प्रवेश का विनियमन - सदन के परिसर के उन भागों में, जो केवल, सदस्यों के उपयोग के लिए सुरिक्षत नहीं हैं, अजनबियों का प्रवेश अध्यक्ष के आदेश या उनके द्वारा निर्मित नियमों द्वारा विनियमित किया जायेगा।

३०६-अजनबियों को हटाने की शक्ति - अध्यक्ष किसी समय अजनबियों को सदन के किसी परिसर से हटाने का आदेश दे सकेंगे।

३०७-अजनबियों के निष्कासन के लिए कार्य - सदन के परिसरों के किसी भाग से किसी अजनबी के निष्कासन के लिए अध्यक्ष ऐसा आवश्यक कार्य या ऐसी कार्यवाही, जो प्रकरण की परिस्थति को देखते हुए उनके स्वविवेक में आवश्यक हो, कर सकेंगे।

(ठ) एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन एवं शलाका के लिए विनियम बनाने की अध्यक्ष की शक्ति
३०८-अध्यक्ष का एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन एवं शलाका के लिए विनियम बनाना - अध्यक्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचन की पद्धति के विषय में या किसी अन्य प्रयोजनार्थ शलाका करने के लिए जिसका इन नियमों में कोई उपबन्ध नहीं है, विनियम बनायेंगे।

 

(ड) सभा द्वारा निर्वाचन

३०९-सभा द्वारा निर्वाचन - जब किसी अधिनियम के अनुसार अथवा अन्यथा सभा के सदस्यगण अथवा उनके एक भाग को किसी सार्वजनिक संस्था के लिए अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करना हो तो प्रमुख सचिव इस संबंध में प्रार्थना किये जाने पर अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार या अध्यक्ष के निदेशानुसार तथा उनके द्वारा निर्मित विनियमों के अनुसार, यदि कोई हों, निर्वाचन करने का प्रबन्ध करेंगे।

(ढ) सदन के पटल पर किसी पत्र या लेख्य का रखा जाना

३१०-सदन के पटल पर किसी पत्र या लेख्य का रखा जाना - सदन के पटल पर कोई पत्र या लेख्य अध्यक्ष के आदेश या प्राधिकार के बिना नहीं रखा जायगा।

(ण) प्रकीर्ण

३११-नियमों का निलम्बन- कोई सदस्य अध्यक्ष की सम्मति से प्रस्ताव कर सकेंगे कि किसी नियम का सदन के समक्ष किसी विशेष प्रस्ताव पर लागू होना निलम्बित कर दिया जाय और यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाय तो वह नियम उस समय के लिए निलम्बित कर दिया जायेगा। ऐसी अवस्था में जिस प्रक्रिया का अनुसरण किया जायगा, वह अध्यक्ष द्वारा विनिश्चित की जायेगी।

३१२-निर्वचन एवं कठिनाइयों का निराकरण - यदि इन नियमों के उपबन्धों में से किसी उपबन्ध के निर्वचन के संबंध में कोई संदेह उत्पन्न हो तो अध्यक्ष का विनिश्चय अन्तिम होगा।

३१३-अवशिष्ट शक्तियां - ऐसे समस्त प्रश्नों का जिनकी इन नियमों में विशेष रूप से व्यवस्था नहीं की गयी है और इन नियमों के सविस्तार कार्यान्वित करने से सम्बद्व समस्त प्रश्नों का ऐसे ढंग से विनियमन किया जायगा, जैसा कि अध्यक्ष समय-समय पर निर्देश करें।

३१४-अध्यक्ष के विनिश्चय पर आपत्ति नहीं की जायेगी - किसी संकल्प या प्रश्न की अनुज्ञा के बारे में या किसी अन्य विषय में अध्यक्ष का जो विनिश्चय हो, उस पर कोई आपत्ति नहीं की जायेगी।

३१४-क- किसी सदस्य के मत पर आपत्ति - यदि सभा के किसी विभाजन में किसी सदस्य के मत का विनिश्चय किये जाने वाले विषय में उस सदस्य के वैयक्तिक आर्थिक या प्रत्यक्ष हित होने के आधार पर आपत्ति की जाय तो अध्यक्ष, यदि वे आवश्यक समझें, आपत्ति करने वाले सदस्य से अपनी आपत्ति के आधारों को सुतथ्यतः कहने के लिए और जिस सदस्य के मत पर आपत्ति की गयी हो उससे अपना मामला बताने के लिए कह सकेंगे और यह विनिश्चय करेंगे कि उस सदस्य का मत अस्वीकृत किया जाना चाहिये या नहीं और उनका विनिश्चय अन्तिम होगा:
परन्तु किसी सदस्य या सदस्यों के मत पर आपत्ति मत विभाजन समाप्त होने के तुरन्त बाद और अध्यक्ष द्वारा परिणाम घोषित किये जाने के पहले की जाये।
व्याख्या- इस नियम के प्रयोजनों के लिए सदस्य का हित प्रत्यक्ष वैयक्तिक या आर्थिक होना चाहिए और वह हित जन साधारण या उसके किसी वर्ग या भाग के साथ सम्मिलित रूप या राज्य की नीति के किसी विषय में न होकर उस व्यक्ति का जिसके मत पर आपत्ति की जाय पृथक रूप से होना चाहिए।

(त) सापेक्ष अग्रेता

३१५- सदन के समक्ष विभिन्न वर्गों के कार्य की सापेक्ष अग्रेता- इन नियमों में किसी बात के होते हुए भी तथा अध्यक्ष के अन्यथा निर्देश के अधीन रहते हुए सदन के समक्ष विभिन्न वर्गों के कार्यों की, जो नीचे निर्दिष्ट किये गये हैं सापेक्ष अग्रेता निम्नलिखित क्रमानुसार होगी:

(१)शपथ अथवा प्रतिज्ञान,

(२)प्रश्न (अल्पसूचित प्रश्न भी सम्मिलित हैं),

(३)निधन के निर्देश,

(४)पटल पर रखे जाने वाले पत्र,

(५)राज्यपाल के सन्देशों की संसूचना,

(६)परिषद् से सन्देशों की संसूचना,

(७)विधेयकों पर राष्ट्रपति/ राज्यपाल की अनुमति कि संबंध में सूचना,

(८)दंडाधिकारी अथवा अन्य प्राधिकारियों से सदन के सदस्यों की गिरफ्तारी या निरोध या रिहाई के संबंध में सूचनायें,

(९)समितियों के प्रतिवेदनों का उपस्थापन,

(१०)विधेयकों के संबंध में प्रवर समिति, संयुक्त प्रवर समिति के सामने आये साक्ष्य का रखा जाना,

(११)याचिकाओं का उपस्थापन,

(१२)प्रश्न जिनमें विशेषाधिकार की अवहेलना अन्तर्ग्रस्त हो,

(१३)सदन के उपवेशनों से सदस्यों की अनुपस्थिति की अनुज्ञा के सम्बन्ध में अध्यक्ष द्वारा घोषणा,

(१४)विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में अध्यक्ष द्वारा घोषणा, उदाहरणार्थ सदन के सदस्यों के त्याग-पत्र, अधिष्ठाता मण्डल, समिति आदि के लिए नाम-निर्देशन,

(१५)अध्यक्ष की व्यवस्थायें अथवा घोषणायें,

(१६)मंत्रियों द्वारा विविध वक्तव्य,

(१७)भूतपूर्व मंत्री द्वारा अपने त्याग-पत्र की व्याख्या के सम्बन्ध में व्यक्तिगत वक्तव्य,

(१८)समिति के निर्वाचन के लिए प्रस्ताव,

(१९)किसी विधेयक पर प्रवर समिति या संयुक्त प्रवर समिति का प्रतिवेदन उपस्थित करने के समय को बढ़ाने का प्रस्ताव,

(२०)विधेयक जो वापस लिया जाय,

(२१)विधेयक जो पुरःस्थापित किया जाय,

(२२)अध्यादेशों द्वारा तुरन्त विधान निर्माण के कारणों के व्याख्यात्मक वक्तव्य का रखा जाना,

(२३)कार्य-मंत्रणा समिति के प्रतिवेदन को स्वीकार करने का प्रस्ताव,

(२४)अध्यक्ष, उपाध्यक्ष को हटाने के संकल्प को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा का प्रस्ताव,

(२५)मंत्रि-परिषद् में अविश्वास का प्रस्ताव करने की अनुज्ञा का प्रस्ताव,

(२६)विशेषाधिकार समिति के प्रतिवेदन पर विचार,

(२७)सदन के कार्य स्थगित करने के प्रस्तावों को प्रस्तुत करने की अनुज्ञा,

(२८)उस दिन के अन्य सामान्य कार्य ,

(२९)ध्यान आकृष्ट करने की सूचनायें।

दल परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता नियमावली, 1987